यह आम धारणा है कि विश्व में सर्वप्रथम राजतंत्र का जन्म हुआ है और उसका विकसित रूप लोकतंत्र है। किन्तु भारतीय साहित्य और राजनीति में इसके विपरीत प्रमाण मिलते हैं, जिसके अनुसार भारत में सर्वप्रथम लोकतंत्र का जन्म हुआ और राजतंत्र उसका विकृत रूप है। भारत में राजनीतिक विचारधारा देशकाल से प्रभावित होकर पाश्चात्य विचारधारा से बहुत कुछ भिन्न रही है। यद्यपि भारतीय साहित्य में लोकतंत्र में रूचि नहीं रखते थे। वास्तव में उनकी दृष्टि से लोकतंत्र और धर्म मर्यादित राजतंत्र में अधिक अन्तर नहीं था। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब लोकतंत्र पर बहस होती है तो उत्तरदायी लोकतंत्र अर्थात संसदीय लोकतंत्र उभर कर हमारे सामने आता है। जिसे यदि सीमित बहुसंख्यक जनता का शासन भी कहा जाय तो अनुचित नहीं होगा । बहुदलीय प्रणाली, राजनीतिक दल-बदलद्व स्पष्ट बहुमत का आभाव आदि अनेक दोषों से ग्रसित संसदीय लोकतंत्र की सफलता पर विद्वानों में पर्याप्त बहस होने लगी है। भारत के संदर्भ में हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी लोकतन्त्र के पक्षधर होते हुए भी संसदीय लोकतन्त्र के प्रति अपनी आपत्तियां रखते है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि गांधीजी के राजनीतिक विचारों में लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा सर्वत्र विद्यमान है। किन्तु उन्होंने लोकतंत्र के सामाजिक उत्थान के पक्ष को महत्व दिया है। वे अभिजातीय लोकतंत्र तथा पंचवर्षीय मतदान की प्रणाली वाले औपचारिक लोकतंत्र के पक्ष मे नहीं है। उनके लोकतंत्र में एक ओर समाज के दलित वर्गो द्वारा कुलीन तथा पूंजीपति वर्गो के नियन्त्रण के विरूद्व राजनीतिक आन्दोलन की प्रेरणा मिलती है तो दूसरी ओर ऐसे आर्दश समाज की मांग, जिसमें व्यक्ति को स्वशासन का पूर्ण अवसर प्राप्त हो सके । गाँधीजी के सर्वोदयी उदारवादी लोकतंत्र में दलविहीन राजनीति के दर्शन होते हैं। गाँधीजी सर्वोदय तथा अंत्योदय की दृष्टि से ऐसे समतावादी समाज के समर्थक हैं जिसमें नेता तथा जनता एक ही धरातल पर सादगी एवं संयम से जनसेवा का कार्य करते रहें। वे लोकतंत्र को ’’मिलावटविहिन अहिंसा का शासन‘‘ मानते हैं। लोकतंत्र अर्थात् अहिंसा, व्यक्ति की आत्मशुद्वि या नैतिक उत्थान को लिए हुए हैं। राजनीतिक स्वशासन जिसमें अनेक पुरूषों तथा स्त्रियों का स्वाशासन अन्तर्निहित है। व्यक्तिगत स्वशासन से बढकर नहीं हो सकता। ऐसा प्रतीत होता है कि गाँधीजी को इस बात पर पूर्ण विश्वास है कि व्यक्तिगत स्वशासन वह शासन है, जो न केवल सामाजिक मूल्यों वरन् व्यक्ति की गरिमा को भी बनाये रखने में सहायक है। गाँधीजी पाश्चात्य देशों के लोकतान्त्रिक उदाहरणों से सन्तुष्ट नहीं है, क्योंकि वहां शस्त्रास्त्र की होड, साम्रज्यबाद, शोषण, पूंजीवाद, राजनीतिक अस्थिरता, राजनीतिक भ्रष्टाचार तथा नेतृत्व के अभाव ने सच्चे लोकतान्त्रिक मूल्यों को भुला दिया है। राज्य का आर्थिक कार्यों में हस्तक्षेप, राज्य शक्ति के बढते हुए दायरे का प्रतीक बन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निगलने के लिये मुँह बाएँ खडा है। ऐसे भयावह राज्य से मुक्ति प्राप्त करने के लिये उचित नियंत्रण तथा सन्तुलन ढूंढने की आवश्यकता हैं। गाँधीजी के विचारों से स्पष्ट होता है कि उनकी नजर में लोकतंत्र समाज के सभी वर्गो के समस्त भौतिक और आध्यात्मिक साधनों को सबकी भलाई के लिये संगठित करने की कला और विज्ञान हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र वह है जिसमें दुर्बल और सभी लोगों को समान अवसर प्राप्त हों लेकिन वे यह भी मानते है कि विश्व में ऐसा कोई भी देश नहीं हैं। गाँधीजी के चिन्तन में लोकतंत्र के प्रति स्वाभाविक निष्ठा प्रकट होती है क्योंकि उनकी विचारधारा में व्यक्ति को जो सम्मान प्राप्त है, वही लोकतंत्र का भी आधार है। सार यह है कि व्यक्ति का सर्वोच्च एवं सर्वागींण विकास गाँधीजी के चिन्तन में प्रमुख स्थान रखता है। यदि लोकतंत्र, शासन अथवा जीवन की वह पद्वति है जो समाज के सभी व्यक्तियों को समानता के धरातल पर संगठित कर उन्हें उनकी सर्वोच्च मंजिल तक पहुँचाती है तो गाँधीजी को यह अत्यन्त प्रिय है लेकिन पश्चिमी प्रजातंत्र अथव संसदीय प्रणाली ऐसा करने में सर्वथा असमर्थ है इसलिए गाँधीजी इसके समर्थक नहीं है। गाँधीजी ने पाश्चात्य राज्य पद्धतियों की आलोचना की । अन्य राज्य पद्धतियां तो दोषपूर्ण पहले से ही मानी जाती थी, परन्तु संसदीय लोकतन्त्र जो सभी राज्य पद्धतियों में निर्दोष माना जाता है तथा मानव-कल्याण और हित का दावा करता है। उनके मत में वह भी दोषपूर्ण है और हिंसा पर आधारित है, इससे मानव का सच्चा कल्याण नहीं हो सकता। इसलिए उन्होनें प्रचलित संसदीय लोकतंत्र में अविश्वास व्यक्त किया। लोकतंत्र जिस रूप में पश्चिम में स्वीकृत है उससे वे सहमत नहीं थे। संसदीय लोकतंत्र की उनकी आलोचना का मुख्य आधार यह था कि उसमें ईमानदारी और जन-कल्याण की भावना से बहुत कम काम होता है और ढग तथा प्रदर्शन का अधिक। गाँधीजी का कहना था कि अहिंसा और नैतिक शुद्धता में विश्वास न होने के कारण पश्चिम के राज्यों में नाममात्र का लोकतंत्र है, उनमें लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धान्तों के प्रति वास्तविक लगाव नहीं पाया जाता है। गाँधीजी प्रेम को लोकतंत्र का सच्चा आधार मानते है, उनके विचार में प्रेम लोकतंत्र के विकास में निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके अलावा स्वयं व्यक्ति का अच्छा होना, अहिंसा व नैतिकता के नियमों का पालन आदि को भी वे लोकतंत्र के विकास में सहायक मानते हैं। गाँधीजी के इन विचारों से उन लोगों को छोडकर जिन्हें लोकतन्त्रिय शासन में विश्वास नहीं है, शायद ही कोई इन्कार कर सकता है। गाँधीजी के विचारों से यह भी स्पष्ट होता है कि पश्चिम में लोकतत्र के सफल न हो सकने का कारण संस्थाओं की पूर्णता उतनी ही है, जितनी सिद्धान्तों की अपूर्णता है। विशेष रूप से हिंसा और असत्य की उपयोगिता म विश्वास । लोकतंत्र उन गलत विचारों और आदर्शो से विकृत होता हैं। जो मनुष्यों का संचालन करते हैं यदि जनता ने शुद्ध अहिंसा के मार्ग को अपनाया तो लोकतंत्रवादी राज्य के ये दोष बहुत कम हो जायेंगे। गाँधीजी ने विश्वास प्रकट किया कि लोकतंत्र का विकास, बल प्रयोग से नहीं हो सकता । लोकतंत्र की सच्ची भावना बहार से नहीं अपितु भीतर से उत्पन्न होती है। कानून पास करने से बुराइयां दूर नहीं की जा सकती, मूल बात तो यह है कि हृदय को बदला जाये । यदि हृदय बदले बिना व्यवस्थापन कर दिया जाये तो महत्वहीन होगा । कानून सदैव आत्मरक्षा के लिये बनाये जाने चाहिए यदि वे उन्नति और विकास को रोकते हैं तो वे बेकार हैं, कोई भी मानवीय कानून स्थायी रूप से व्यक्ति के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते। गाँधीजी की पुस्तक ’’हिन्द-स्वराज्य‘‘ के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वे संसदीय लोकतंत्र के पक्ष में नही थें । उनके मत में - ’’जिसे आप पार्लियामेंट की मॉ‘‘ कहते है, वह तो बांझ और वैश्या है। ये दोनों शब्द कठोर हैं पर उस पर पूरी तरह चरिर्ताथ होते है। उसे बांझ मैं इसलिए कहता हूं कि अब तक उसने एक भी अच्छा काम अपने आप नहीं किया। उसकी स्वाभाविक रूप से ऐसी स्थिति है कि उसके ऊपर दबाव देने वाला कोई न कोई हो तो वह कुछ भी न करे और वैश्या वह इसलिए है कि जो मन्त्रीमण्डल वह बनाती है उसके वश में रहती है।‘‘ इसके अलावा उसका कोई एक मालिक मुख्तार भी नहीं है। उसका मुखिया कोई एक आदमी हो ही नहीं सकता। उसका मुखिया जब कोई बनता है जैसे कि प्रधानमंत्री, तब भी उसकी चाल एक सी नही रहती। जो दुर्गति वैश्या की होती है वही सदा उसकी रहती है। प्रधानमन्त्री को संसद की चिन्ता अधिक नहीं होती, वह तो अपनी शक्ति के मद में चूर रहता है, उसका पक्ष कैसे जीते इसी की चिन्ता उसे रहती है। संसद ठीक काम कैसे करे इसकी फिक्र उसे ज्यादा नहीं होती। अपने पक्ष का बल बढाने के लिए वह संसद से कैसे कैसे काम करवाता है। गाँाधीजी के से विचार आज के सन्दर्भ में पूर्णतया सत्य प्रतीत होते हैं। प्रायः देखा गया है कि संसदीय प्रजातंत्र में दलगत राजनीति कार्य करती है, जिसमें जनता के प्रतिनिधि होते हैं परन्तु वास्तव में उसकी कर्त्तव्यनिष्ठा अपने परिवार या अपनी पार्टी तक ही सीमित रहती है। जनता के कल्याण के लिए वे कुछ भी नहीं कर पाते । जो जिस दल का सदस्य होता है उसी को आँख मूंद कर वोट कर देता है, अथवा देने को मजबूर है। कोई इस नियम का अपवाद बन जाए तो समझ लीजिए कि उसकी सदस्यता के दिन पूरे हो गए। जितना समय और पैसा संसद बरबाद करती है उतना समय और पैसा थोडे से भले आदमियों को सौंप दिया जाय तो उद्वार हो जाय । एक ब्रिटिस संसद सदस्य ने तो यहां तक कह दिया कि संसद इस लायक नहीं रही कि कोई सच्चा ईसाई उसका सदस्य हो सके। एक अन्य सदस्य का कहना था कि संसद तो अभी दूध पीती बच्ची हैं । इस पर बच्चा सदा बच्चा ही बना रहे ये बात क्या आपने देखी है। सात सौ साल हो जाने पर भी संसद बच्ची ही बनी है तो सयानी कब होगी? इसी कारण संसद में बहुत अधिक अस्थिरता पाई जाती है और यही करण है कि उसके फैसलों में कोई पक्कापन नहीं होता । आज का फैसला कल रद्द कर दिया जाता है। सम्भवतः एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि संसद ने कोई काम करके उसे अन्त तक पहुंचाया हो । यही नहीं संसद क सदस्य महत्वपूण्र्ा और बडे मसलों पर विवाद के समय बैठे-बैठे ऊंधा करते है, कभी संसद में वे इतना शोर मचाते हैं कि सुनने वालों की हिम्मत टूट जाती है। भारत की संसद में तो अनेक बार संसद सदस्यों द्वारा गाली-गलौंच छीना-झपटी, एक दूसरे के कपडे फाड देना, माईक व पेपरवेट फेंकना, टेबल उलट देना जैसी घटनाएं देखी गई हैं। जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। क्या यही वे सदस्य हैं जो सरकार में हमारे प्रतिनिधी हैं? संक्षेप में संसद न तो किसी के प्रति वफादार होती है और न उसमें सृजन की क्षमता ही होती है। इसने कभी कोई अच्छा काम नहीं किया । गांधीजी के मत में ब्रिटिश प्रजातंत्र में समस्त जनता के कल्याण का भार कुछ चुने हुए प्रतिनिधि ले लेते हैं। इसमें जनता प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी हाथ नहीं बंटा पाती है। सम्पूर्ण जनता वास्तव में अपने कल्याण के लिए राज्य के प्रतिनिधियों की गुलाम हो जाती है, उनका शोषण होता है। अतः गाँधीजी की राय में यह पद्वति हिंसा से पूर्ण है। उसमें नाजीवाद और फांसीवाद उपनिवेशवादी नीति को ढकने का एक बडा आवरण है। इसकी सभी संस्थाएं अलोकतांत्रिक तथा हिंसा से पूर्ण है। अतः ब्रिटिश लोकतंत्र उपयोगी पद्वति नहीं है। गांधीजी का यह मत कुछ अंशो में सत्य माना जा सकता है। यह सत्य है कि संसद के सदस्य कठोर दलीय अनुशासन में बन्धें होते हैं और उनका सम्पूर्ण व्यहवार अपने अपने दल के नेता के इशारे द्वारा निर्धारित होता है किन्तु गाँधीजी की इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि संसद ने भी कोई अच्छा काम नहीं किया । भले ही संसद के सदस्य ने जनभावनाओं को अभिव्यक्त कर उसकी स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा की है। यह कहना भी सत्य नहीं है कि संसद के सदस्य दलगत राजनीति से प्रेरित और सदैव दलीय नेता के इशारे पर कार्य करते रहे है। ब्रिटेन और भारत में ऐसे अनेक अवसर आये हैं जब संसद के सदस्यों ने दलीय राजनीति से प्रेरित होकर नहीं बल्कि अपने विवेक और अन्तरात्मा की आवाज के आधार पर कार्य किया है। १९७५ में प्रधानमन्त्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा लगाये गए आपातकाल के अवसर पर जब देश के विभिन्न भागों में जनता के साथ ज्यादतियां हुई तो स्व. श्रीमती गांधी के दल (कांग्रेस आई) के ही कुछ सदस्यों ने असन्तोष प्रकट करते हुए श्रीमती गाँधी के इस कदम की न केवल आलोचना ही कि बल्कि अपने अपने पदों से त्यागतत्र भी दे दिये । १९८९ से लेकर वर्तमान तक ऐसे अनेक अवसर आये जब संसद सदस्यों ने अपने विवेक और अन्तरात्मा के अनुसार कार्य किया है, न कि दलीय नेता के इशारे पर । किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि गाँधीजी संसदीय लोकतंत्र के विरोधी हैं। वे लाकतंत्र के जिस रूप का सर्मथन करते हैं वह आदर्श लोकतंत्र है। ऐसा आर्दश लोकतंत्र जो सभी आभावों व हिंसा से पूर्ण मुक्त हो, अपने आर्दश लोकतंत्र में वे राजनीतिक अधिकारों, आथ्र्ाक समानता तथा सुरक्षा को अत्यधिक महत्व देते हैं किन्तु इस पर भी वे इनको लोकतंत्र का मूल तत्त्व स्वीकार नहीं करते थे। वे इनको लोकतंत्र का केवल बाह्य ढांचा प्रतीक ही समझते थे। उनके मतानुसार कोई भी समाज लोकतंत्र का सुखभोग केवल उसी सीमा तक कर सकता है जहां तक कि उसके सदस्यों को आन्तरिक स्वतंत्रता अथवा अपनी इच्छाओं तथा भावनाओं को विवेक के अनुसार नियन्त्रित करने की क्षमता प्राप्त होती है। यह आन्तरिक स्वतंत्रता भीतर से विकसित होती है, इसे बाहर से थोपा नहीं जा सकता। इसलिये लोकतंत्र की भावना भी भीतर से विकसित होती है, इसे वयस्क मताधिकार, चुनाव तथा संसद जैसे बाह्य संस्थाओं द्वारा उत्पन्न नहीं किया जा सकता । उनके अनुसार पश्चिम में लोकतन्त्र की विफलता का कारण वहां पूंजी वाद व उसक यन्त्रों में कुछ दोषों का होना नही ंथा बल्कि उसका वास्तविक कारण यह भी था कि जनगण अपने भीतर आन्तरिक स्वतंत्रता को विकसित नहीं कर पाये। उनका विश्वास था कि जिस समाज के सदस्यों में आन्तरिक स्वराज्य की भावना उत्पन्न नहीं हो जाती वे एक सच्चे लोकतंत्र की स्थापना नहीं कर सकते । आज के सन्दर्भ मे गाँधी के उपर्युक्त विचार सत्य प्रतीत होते हैं। निःसन्देह थोपा गया लोकतंत्र कभी भी स्थायी और सफल नहीं हो सकता । जब तक जनता स्वयं लोकतान्त्रिक भावना की आत्मानुभूति नहीं कर लेती, लेाकतंत्र केा प्रबल समर्थन नहीं मिल सकता। केवल निर्वाचन में खडा होने या मत देने के अधिकार से ही लोकतंत्र की सफलता को मापा नहीं जा सकता। अक्सर निर्वाचन के समय मतदाताओं की उदासीनता देखी गई है, जो मतद&
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