Home > Article >> Editorial | महारानी की मुश्किलें
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06 Oct 2006 Add comment Mail
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भाजपा सरकार तीन वर्ष पूरे करने जा रही है। जैसे-जैसे सरकार का कार्यकाल बढ् रहा है। वैसे-वैसे समस्यों की सूची में बढोतरी हो रही है। वैसे शासन के सामने चुनौतियॉ आनी तय है और प्रशासन उनसे सुलटना भी बखूबी जानता है पर प्रदेश का सरकारी तन्त्र पिछले तीन वर्षों में समस्याओं को अपने ही बनाए भटकावों के माध्यम से सुलटाने की बजाय उलझाता ही जा रहा है। हमारी मुख्यमन्त्री थोपी हुई है। बाहर की है। ऐसा संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मानना है। अत: संगठन के गले से आज तक वे उतर ही नही पा रही है। अत: सत्ता और संगठन आए दिन किसी न किसी मुद्दे को लेकर आमने-सामने होते रहते हैं। समान सैद्घान्तिक आचरण के बावजूद आपस में एक-दूसरे की कार्यप्रणाली को लेकर खींचातानी लगी रहती है। हज-हाऊस इसका ताजा उदाहरण है। इसे लेकर सत्ता और संगठन एक बार फिर दो हाथ की मुद्रा में आए हे हैं। इधर शिक्षामन्त्री संगठन के प्रमुख पैरोकार के रुप में सामने आ रहे हैं। उनका प्रभाव भी मुख्यमन्त्री के लिए सिरदर्द हैं। श्री घनश्यम तिवाडी पिछले तीन वर्षों से मुख्यमन्त्री के बाद सर्वाधिक कद्दावर मन्त्री के रुप में उभरकर सामने आ रहे हैं। यह तो वसुंधराराजे के दिल्ली समीकरण ठीक है अन्यथा कोई दूसरा होता तो अब तक सत्ता का सुख जा चुका होता। कर्मचारी वर्ग सरकार की ओर आस लगाए बेठे हैं। उन्हें सरकार का कर्मचारी हितों सम्बन्धी ढुलमुल रवैया बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। एक अन्य मुसीबत अल्पसंख्यकों की और आरक्षण की है। आए दिन कोई न कोई जाति अपने को अल्पसंख्यक घोषित करवाकर आरक्षण का फायदा लेने को आतुर है।
अभी गुर्जर और् मीणा की मांग पर पूरी तरह विचार ही हुआ नहीं कि राजपूत ताल ठोंक कर मैदान में आ गए हैं।सामाजिक न्याय मंच आरक्षण के मुद्दे को लेकर आर-पार की लडाई लडने का एलान पहले से ही कर चुका हैं। सिवाय शिक्षकों की भर्ती के सरकार युवा वर्ग के हितों की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर पाने में अक्षम हैं। उच्चशिक्षा के हालात तो अत्यन्त ही बुरे हैं। पानी को लेकर हो रहे आन्दोलन राजस्थान के इतिहास में अपनी तरह की अकेली घटना हैं। इतिहास गवाह है कि राजस्थान में पानी की बून्द से किसी भी मायने में रजत बून्द कम नहीं है। अकाल यहाँ का साथी रहा उसकी विभीषिका जीवन सहयात्री पर पानी के लिए लडाई झगडा कहानी किस्से में भी सुनने में नहीं आया। आये दिन पानी की मांग लेकर हिंसक वारदातें हो रही है। सरकार के पास समस्या का कोई स्थाई निदान नही हैं। सेज का मुद्दा राजस्थान के औद्योगिक विकास नीति का नया रुप सामने रखता है। सरकार इन सबको लेकर कितने दबाव में है, इसका अनुमान कांग्रेस को विधानसभा पर प्रदर्शन की अनुमति देने के निर्णय से साफ नजर आता है। सरकार की सेहत ठीक नहीं है, तिस पर विपक्ष का आक्रामक रवैया उनकी तकलीफें बढा ही रहा है। कुल मिलाकर सरकार के कदम संकट की ओर अग्रसर हैं। सरकार अपने ऐजेन्डे में जनता के बजाय व्यक्ति को अधिक महत्व दे रही है। ऐसे में अपनी जडों से जुडा रहना ही भाजपा की पहली पसन्द होनी, चाहिए वरना आने वाले दिन किसी अप्रत्याशित परिणाम को जन्म देंगे जो सरकार व संगठन दोनों के हित में नहीं होगा।
डॉ ब्रजरतन जोशी
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