Home > Article >> Immidiate Comments | मिट्टी का माधो नहीं है राज्यपाल
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06 Apr 2008 Add comment Mail
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राजस्थान के राज्यपाल एस के सिंह ने जैसलमेर के उप पंजीयक कार्यालय में जाकर यह साबित कर दिया कि राज्यपाल का पद महज संवैधानिक प्रधान का ही नहीं होता बल्कि वास्तव में अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो वह अपनी सकि्रयता से राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्य को बखूबी निभा सकता है। राज्यपाल महोदय ने यह साबित किया है कि सिर्फ राजभवन में आने वाले मेहमानों की आवभगत करना ही उनका काम नहीं है या मंत्रियों व मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने तक का ही दायित्व उसका नहीं है बल्कि वह अपने तंत्र को संभाल कर उसकी खामियों को देख सकता है। एस के सिंह ने जब से राज्यपाल का पद ग्रहण किया है तब से ही उनकी सकि्रयता ने राज्य के लोगों को अहसास करवा दिया था कि वे एक सकि्रय राज्यपाल हैं। सिंह ने राज्य के कईं मुद्दों पर मंत्रीय के बयानों पर बेबाक टिप्पणी की है और अपनी राय को मजबूती से रखा है। राज्यपाल महोदय ने यह साबित कर दिया है कि वे राज्य में हो रहे कार्यों पर लगातार नजर रख रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे मुद्दे पर वे खामोश नहीं रह सकते हैं। राज्यपाल महोदय का यह कदम कुंभकर्णी नींद में सो रहे राज्य के प्रशासन पर करारा तमाचा है और एक सीख प्रदान करने वाला कदम है कि अगर जिम्मेवार पदों पर काम करना है तो अपनी जिम्मेवारी निभानी पडेगी। राज्यपाल एस के सिंह ने समय समय पर राज्य के कईं मंत्रीयों को भी अपनी गरीमा याद दिलाई है। राजस्थान के राज्यपाल अपने इस कदम के लिए धन्यवाद व बधाई के पात्र है और महामहिम राज्य की जनता आपसे उम्मीद करती है कि ऐसे कदमों से राज्य तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा।
समय समय पर भारत के लोकतंत्र में यह आवाज उठती रही है कि आखिर राज्यपाल के पद का क्या महत्व है। संवधान निर्माताओं ने अपने जिस मंतव्य के साथ इस पद को गढा है, ऐसे राज्यपालों ने संविधान निर्माताओं के उस मंतव्य को साफ किया है। पूर्व में मदनलाल खुराना व अंशुमान सिंह जैसे राज्यपालों ने भी अपनी सकि्रयता के कारण राज्यपाल की भूमिका को बताया था। वर्तमान में एस के सिंह महोदय के इस कदम ने भी भारतीय लोकतंत्र के इस पद को गरिमा व मान प्रदान किया है तथा इसकी प्रासंगिकता को सिद्ध किया है।
श्याम नारायण रंगा |
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