एक गांव मे एक आज्ञाकारी सीधी-सादी बहू रहती थी। वह अपनी सास से बहुत कम बोलती थी। वह इशारों-इशारों से ही काम चला लेती थी। हर रोज बहू सास से पूछती कि आज कितना चावल फगा। सास कुछ देर विचार करती और फिर धीरे से एक अंगुली ऊपर उठाती। कभी दो अंगुलियां दिखाती कभी तीन-जैसी उसकी मरजी। एक दिन सास दुनिया से चल बसी। बहू रो-रो कर हलकान हो गई। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अपनी गृहस्थी वह बिना सासू मां के कैसे चलाए। वह किससे पूछे कि आज कितना चावल बनेगा? इस सवाल से पति कुछ ही दिनों में आजिज आ गया। रोज ब रोज के झंझट से छुटकारा पाने के लिए पति ने एक तरकीब सोची वह कुम्हार के पास गया और उससे अपनी मां की मिट्टी मूर्ति बनाने को कहा। कुम्हार ने दो मूर्तियों बना दी। कुछ ही दिनों में मूर्तियों को रंग पोत दिया। नए नकोर कपडे पहना दिए गए। मूर्तियों को घर लाया गया और उसे ऐसे स्थान पर रखा जहां से वह पत्नी को दिखती रहे। सास को वापस पाकर बहू फूली न समाई। जब भी उसे चावल की मात्रा के बारे में पूछना वह रसोई से बाहर देखती और आदेश ले लेती।
दो अंगुलियों वाला हाथ पहले दिखता तो वह दो कटोरी चावल पकाती और तीन अंगुलियों वाले हाथ की झलक दिखती तो तो तीन कटोरी। बहू मिट्टी की सास पाकर खुश थी और पति पत्नी को खुश देखकर खुश था। यह खुशी ज्यादा दिन नहीं चली। एक रोज पति को पता चला कि चावल की बोरी कुछ ही हफ्तों में खत्म हो गई। खाने वाले तो पति-पत्नी दो ही थे। उसने पत्नी से पूछा तो उसने बताया कि वह सास के आदेश का पालन करती है। पति ने पूछा आज कितना चावल बना। बहू ने कहा-तीन कटोरी। पति के आग लग गई, दो जनों के लिए तीन कटोरी चावल? तुम्हारी अक्ल घास चरने गई है? हम इतना चावल नहीं खा सकते। जब मां जिंदा थी तब भी तुम दो कटोरी चावल पकाती थी और वह भी हमसे खाया नहीं जाता था। पत्नी ने हौले से जवाब दिया, हम दो नहीं, तीन है। अपनी मां को क्यों भूल रहे हो। मैं अब भी उन्हें भोग लगाकर ही खाती ह। अक्सर तो मेरे लिए थोडा ही बचता है। बुरा मत मानो, मां की खुराक पहले से बढ गई है। पति को अपने कानों पर भरोसा नहीं था। कैसे मिट्टी की सास कई बोरी चावल चट कर गई। पति ने मिट्टी की सास और सच्ची बहू दोनों को घर से निकाल दिया।
दरअसल होता यह कि वह दोनों वक्त सास के आगे थाली रखती और एक-एक कर वह सब परोसतीं जो घर में बना होता। खाना परोस कर जैसे ही वह रसोई में जाती। पडोासन दीवार में बने सूराख से दबे पांव आती और थाली का खाना लेकर उसी रास्ते से वापस चली जाती। बेचारी बहू सोचती कि उसकी सास पहले की तरह अब भी खाना खाती है। इस छोटी सी नादानी ने उसे घर से बेघर कर दिया।
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