एक सुंदर बगीचा था। बगीचे में रंग-बिरंगें फूल खिल रहे थे। बगीचे का सिंचन और संरक्षण करते जब मां बूढी हो गई तो उसके पूत्र ने कहा यह काम आप मेरे पर छोड दो। मैं सारे बगीचे का पानी पिलाउंगा और पूरी सार संभाल करूंगा।
एक महीने बाद जब बगीचे में मां गई तो मां ने देखा कि सारे फूल सूख रहे है। मां ने कहा-बेटे! क्या तुमने उपवन का बिल्कुल ध्यान ही नहीं रखा? सारे पौधे सूख गए हैं, फूल कुम्हला गए है। मां का उलाहना सुनकर पुत्र पश्चाताप करने लगा। उसने कहा-मैंने एक-एक फूल को प्राणों से ज्यादा प्यार किया है, सबकी अलग-अलग सार-संभाल की हैं। सबको अच्छी तरह से पानी पिलाया है, फिर भी सारे फूल सूख गए और मरझाा गए, इसका मुझे बहुत ही अफसोस है। मां ने कहा-भोले बेटे! पौधों को प्राण फूल में नहीं, मूल में रहता है। इन्हें जीवन देने के लिए जडों को सींचना आवश्यक होता है। किंतु तुम फूलों पर ही पानी डालते रहते हो, इसी भूल के कारण हरा-भरा बगीचा सूख गया है। फूलों की शोभा विलीन हो गई है। अब बेटे को समझ में आया कि मूल को सींचने से ही फूल सुरक्षित होते हैं।