Home > Article >> Politics | संकट में भारत का विश्व विख्यात महानगर मुम्बई
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24 Feb 2008 Add comment Mail
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मुम्बई भारत की उस महानगरी का नाम है जिसे कि देश की आर्थिक राजधानी के रूप में भी देखा जाता है। भारत के महाराष्ट्र राज्य की यह राजधानी तीन दिशाओं से अरब सागर से घिरी हुई है। इस प्राकृतिक संरचना के कारण मुम्बई में देश का सबसे बडा व आधुनिक बंदरगाह भी मौजूद है। समुद्री मार्ग से आने वाले बडे से बडे जलपोत मुम्बई बंदरगाह पर आयातित माल उतारते हैं तथा यहां से निर्यात किए जाने वाला सामान अन्य देशों में ले जाते हैं। बंदरगाह के अतिरिक्त मुम्बई का दूसरा सबसे बडा आकर्षण है यहां पनपने वाला फिल्म उद्योग। भारतीय फिल्म उद्योग को हॉलीवुड के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बडा फिल्म उद्योग माना जाता है। लगभग 100 वर्ष की अपनी यात्रा तय कर चुके भारतीय फिल्म उद्योग को विश्वस्तरीय बनाने में पूरे भारत के अनेकों प्रतिभाशाली नायक, नायिकाओं, निर्देशकों, लेखकों, गीतकारों, संगीतकारों तथा फिल्म निर्माताओं का हाथ रहा है। मुम्बई में स्थापित फिल्म उद्योग तथा यहां समुद्री जहाजों के आवागमन के कारण बडे उद्योगों को पहुंचने वाले लाभ जैसी प्रमुख विशेषताओं ने अनेकों बडे औद्योगिक घराने के सदस्यों को इस शहर को अपनाने के लिए भी बाध्य कर दिया। कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि मुम्बई को आधुनिक मुम्बई बनाने में तथा इसे विश्व के चंद प्रमुख महानगरों की श्रेणी तक ले जाने में पूरे भारतवासियों का योगदान रहा है न कि मुम्बई में रहने वाले मराठियों मात्र का।
परन्तु उपरोक्त वास्तविकताओं की अनदेखी करते हुए समुदायवाद व वर्गवाद की राजनीति करने वाला मुम्बई का ही ठाकरे घराना मुम्बई को केवल मराठों की जागीर बताने का प्रयास कर रहा है। महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टी शिवसेना का तो गठन ही मुम्बई में शेष भारतीयों की मौजूदगी तथा दिन प्रतिदिन बढते जा रहे उनके वर्चस्व के विरोध में ही हुआ था। बाल ठाकरे की शिवसेना ने चार दशक पूर्व सर्वप्रथम तो मुम्बई में दक्षिण भारतीयों की बढती हुई संख्या को ही अपने विरोध का आधार बनाया था। ठाकरे ने उस समय स्थानीय मराठाओं को बडी चतुराई से यह समझा दिया कि दक्षिण भारतीयों द्वारा मराठा समुदाय के लोगों को मिलने वाली सरकारी व गैर सरकारी नौकरियों पर कब्जा जमाया जा रहा है। इस आंदोलन ने मुम्बई व आसपास के मराठियों को यह एहसास दिलाया कि बाल ठाकरे वास्तव में देश के ऐसे नेता हैं जो मराठा हितों को सर्वोपरि रखकर अपनी राजनीति करते हैं। उधर मुम्बई में तथा महाराष्ट्र के नागपुर, नासिक व पुणे जैसे बडे व समृद्घ नगरों में गत् 40 वर्षों से उत्तर भारतीयों की संख्या दिन प्रतिदिन बढती गई। इन उत्तर भारतीयों में मुख्यतः उत्तर प्रदेश व बिहार राज्य के कामगार लोग बहुसंख्या में शामिल हैं। अब ठाकरे के निशाने पर केवल दक्षिण भारतीय ही नहीं बल्कि उत्तर भारतीय भी मुख्य रूप से शामिल हो गए।
ठाकरे परिवार में ही मराठा मतों पर वर्चस्व को लेकर एक अजीबोगरीब स्थिति गत् वर्ष उस समय पैदा हो गई जबकि बाल ठाकरे ने अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र उद्घव ठाकरे को बना डाला। जबकि बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी बनने की बाट जोह रहे उनके तेज तर्रार भतीजे राज ठाकरे को उत्तराधिकारी बनने के बजाए निराशा ही हाथ लगी। राज ठाकरे ने शिवसेना से विशेषकर अपने चाचा बाल ठाकरे से विद्रोह करते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नामक एक नए राजनैतिक दल का गठन कर डाला। राज ठाकरे ने भी क्षेत्रवाद व वर्गवाद की वही तलवार भांजनी शुरु कर दी जोकि बचपन से ही उनकी रगों में उनके चाचा बाल ठाकरे द्वारा घुट्टी की तरह भर दी गई थी। अर्थात् पहले महाराष्ट्र फिर सम्पूर्ण भारत राष्ट्र। अब बाल ठाकरे की शिवसेना तथा राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एम एन एस) के मध्य इस बात की प्रतिस्पर्धा शुरु हो गई कि मराठों का सबसे बडा हितैषी कौन? चाचा बाल ठाकरे या भतीजा राज ठाकरे? तथा इस प्रकार कथित रूप से मराठा प्रेम दर्शाने तथा इसे जगजाहिर करने का हिंसक रूप से निशाना बने गरीब, कामगार, मजदूर, तीसरे व चौथे दर्जे के कर्मचारी तथा टैक्सी चालक व दूध का उत्पादन करने व वितरण करने वाले गरीब व निम* मध्यम दर्जे के लोग।
मराठा हितों की बात करने वाले ठाकरे परिवार द्वारा केवल गरीब उत्तर भारतीयों को ही निशाना नहीं बनाया गया बल्कि उनके धार्मिक व सांस्कृतिक संस्कारों को भी चुनौती दी गई। बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में होली व दीपावली जैसे उत्साह व उल्लास की ही तरह मनाई जाने वाली छठ पूजा का इन कथित मराठा नेताओं द्वारा मजाक उडाया गया तथा इस त्यौहार को मुम्बई में आयोजित न किए जाने की चेतावनी दी गई। इसी दौरान मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन के जुहू स्थित प्रतीक्षा नामक बंगले पर कुछ अज्ञात लोगों द्वारा कांच की बोतल फेंककर हमला किया गया। इस घटना के लगभग एक माह के अंतराल के बाद गत् दिनों पुनः जुहू स्थित अमिताभ बच्चन के ए बी सी एल दफ्तर पर भी कुछ शरारती तत्वों द्वारा बोतलें फेंकी गईं। मुम्बई विशेषकर भारतीय फिल्म उद्योग पर ठाकरे के भतीजे राज ने यह कहते हुए निशाना साधा था कि अमिताभ बच्चन खाते हैं मुम्बई की तथा गाते हैं उत्तर प्रदेश की। अमिताभ बच्चन पर इस प्रकार की अनर्गल टिप्पणी के बाद तो मानो मुम्बई फिल्म जगत में कोहराम मच गया था। छोटे मोटे उत्तर भारतीय कलाकार तो अमिताभ बच्चन पर निशाना साधने तथा उनके घर पर हुए हमले से अवाक रह गए थे। उन्हें मुम्बई में अपना अस्तित्व खतरे में पडता नजर आने लगा। अमिताभ बच्चन ने राज ठाकरे की अपने विरुद्घ की गई इस बयानबाजी के बाद व्यक्तिगत् संबंधों के आधार पर बाल ठाकरे से मुलाकात की। बाल ठाकरे ने अमिताभ को सांत्वना तो दी परन्तु अमिताभ बच्चन के पक्ष में आकर राज ठाकरे का खुलकर विरोध करने का साहस नहीं किया। बजाए इसके बाल ठाकरे स्वयं अपने भतीजे राज ठाकरे के साथ उस प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गए जिसके तहत अब उन्हें यह साबित करना है कि मराठा हितों के वास्तविक रखवाले चाचा ठाकरे हैं न कि भतीजा राज।
ठाकरे घराने द्वारा की जाने वाली ओछी व घटिया राजनीति के इस पहलू को भी गौर से देखा जाना चाहिए कि उत्तर भारतीयों का आज मुम्बई में विरोध करने वाला तथा उनकी रोजी रोटी का दुश्मन बना बैठा ठाकरे घराना वर्ग, क्षेत्र व सम्प्रदाय की राजनीति करने में इतना पारंगत है कि जब कभी देश में मन्दिर-मस्जिद के मुद्दे को लेकर अथवा हिन्दू मुस्लिम मतभेदों को लेकर देश तनावग्रस्त होता है, उस समय तो यही विभाजनकारी शक्तियां हिन्दुत्व का झण्डा थाम लेती हैं। उस समय इन्हें मराठा व गैर मराठों का भेद नजर नहीं आता। और जब बात उत्तर भारतीयों के विुरद्घ मराठा मतों को एकजुट करने की हो तो इन्हें क्या हिन्दू तो क्या मुसलमान, सारे ही उत्तर भारतीय विशेषकर उत्तर प्रदेश व बिहार राज्य के सभी लोग इन्हें समान रूप से दुश्मन नजर आने लगते हैं। सवाल यह है कि गत् 40 वर्षों से महाराष्ट्र विशेषकर मुम्बई के लोगों में उत्तर भारतीयों के विरुद्घ जिस प्रकार नफरत का बीज बोया गया है तथा गत् दो महीने से इस नफरत के जो अफसोसनाक परिणाम देखे गए हैं, ऐसा विभाजनकारी मिशन चलाने वाले नेताओं को क्या हम राष्ट्रभक्त नेता के रूप में मान्यता दे सकते हैं? स्वयं को भारत, भारतीयता व भारतीय संस्कृति का संरक्षक बताने वाले यह ढोंगी केसरियाधारी नेता क्या अपने पुत्र व परिवार मोह मात्र में पडकर देश को तोडने की साजिश नहीं रच रहे हैं? भारत की एकता व अखण्डता पर सीधा प्रहार करने वाले नेताओं का इस प्रकार खुलेआम जहर उगलना, उत्तर भारतीयों के पवित्र एवं गहन आस्था के त्यौहारों को मनाने की चुनौती देना जैसी बातों में राष्ट्रहित निहित है अथवा राष्ट्र का अहित, यह भी पूरा देश देख रहा है।
अतः भारत सरकार, केन्द्रीय चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय परिपेक्ष में चिंतन करने वाले राजनैतिक दलों एवं भारतीय मीडिया को ऐेसे राष्ट्र विरोधी नेताओं, राजनैतिक दलों के विषय में न सिर्फ यथाशीघ्र गंभीरता से सोचना चाहिए बल्कि ऐसे नेताओं के विरुद्घ राष्ट्रद्रोह के तथा देश की एकता व अखण्डता को भंग करने की साजिश रचने के मुकद्दमे तत्काल कायम करने चाहिएं। मुम्बई हो या दिल्ली, चेन्नई हो या कोलकाता, सभी महानगरों पर पूरे भारतवासियों का समान अधिकार है तथा इन महानगरों को महानगर बनाने में तथा इन्हें शोहरत दिलाने में समस्त देशवासियों का समान योगदान है। अतः इन महानगरों में रहने, नौकरी, व्यापार करने आदि से भी इन्हें कोई रोक नहीं सकता। यदि देश के किसी भी कोने से ऐसी विघटनकारी आवाज बुलंद होती है तो उसे दबाने व कुचलने की तत्काल जरूरत है।
तनवीर जाफरी - tanveerjafri1@gmail.com |
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