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आपसी टकराहट के बीच रोजगार भीख तो नहीं !

18 Nov 2011      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

हाल ही में राहुल गाधी ने उत्तरप्रदेष की एक चुनावी सभा में प्रष्न खड़ा किया है कि यूपी के युवा कब तक महाराष्ट्र जाकर भीख मांगते रहेंगे। चुनावी सियासत में इस प्रष्न पर भारी बवाल मचा हुआ है। कोई यह यूपी का अपमान बता रहा है तो कोई इसे युवाओं का अपमान कह रहा है परन्तु वास्तव में अगर गौर किया जाए तो वर्तमाान समय में यह एक बड़ी समस्या है कि इस देष का युवा बेराजगार है और वह रोजगार की तलाष में यहा वहा दर दर की ठोकरें खा रहा है। हालात ऐसे पैदा हो गए हैं कि जब एक व्यक्ति अपने घर को छोड़कर किसी दूसरी जगह पर नौकरी करने जाता है तो वहा के स्थानीय लोगों के साथ व स्थानीय सत्ता के साथ उसका संघर्ष पैदा होता है। हमारे संविधान ने प्रत्येक नागरिक को यह मूल अधिकार प्रदान किया है कि प्रत्येक नागरिक इस देष के किसी भी कोने में जाकर अपनी आजीविका कमा सकता है और रोजगार कर सकता है परन्तु जब वह काम करने के लिए बाहर जाता है तो उसे बिहारी, मारवाड़ी, आसामी आदि कहकर दूसरे राज्यों से भगा दिया जाता है। सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र में षिवसेना उत्तर भारतीयों को रोजगार न देने की हिमायत करती है और वहा के उत्तर भारतीयों के साथ मारपीट की जाती है ताकि वे वहा से भाग जाए। आज बिहारी व मारवाड़ी भारत के प्रत्येक कोने में आपको मिल जाएंगे लेकिन वे वहा किन परिस्थितियों में काम कर रहें हैं इसका अंदाजा भी अपने घर बैठा आदमी नहीं लगा सकता है। अपने घर से बाहर या यूं कहे अपने क्षेत्र से बाहर जाकर नौकरी करने वाला आदमी भले ही कितने ही पैसे कमा ले लेकिन उसे बेइज्जत होना पड़ता है और उसे दब कर काम करना पड़ता है। परिस्थितयाॅं ये है कि करोड़पति मारवाड़ी व आसामी भी स्थानीय गूंडे बादमाषों को व स्थानीय सत्ता के लोगों को पैसे देकर काम करते हैं और अगर वो लोग पैसे देने से इंकार कर दें इन आसामियों, मारवाडि़यों व बिहारियों की बेइज्जती की जाती है और उनके साथ मारपीट की जाती है। सभी जानते हैं कि एक समय में आसाम से मारवाडि़यों को मारकर भगा दिया गया था और वर्तमान में यही काम महाराष्ट्र में हो रहा है। यहाॅं बात सिर्फ मारवाडि़यों व आसामियों व बिहारियों की नहीं है ये तो सिर्फ प्रतीक मात्र है। बिहार व राजस्थान मे दूसरे प्रदेष से आए लोगों को विकट परिस्थिितियों का ही सामना करना पड़ता है। यह परिस्थितियाॅं कुछ ज्यादा व कुछ कम जरूर हो सकती है। वास्तव में होता यह है कि स्थानीय लोग जब बेरोजगार होते हैं और बाहर का आदमी आकर वहीं काम लग जाता है तो स्थानीय लोगों को लगता है कि हमारे ही शहर में आकर दूसरा आदमी तो काम करें और हम बेरोजगार रहंे तो यह भावना पैदा होती है। जैसे एक मारवाड़ी किसी दूसरे राज्य में जाकर काम करेगा तो वहाॅं वह सेठ बन जाएगा और अपना धंधा जमाएगा और पैसे कमाएगा तो वहाॅं के स्थानीय लोगों के मन में यह बात आती है कि बाहर का आदमी हमारे यहाॅं आकर करोड़ों कमा रहा है और हम जो स्थानीय लोग है उसकी नौकरी कर रहें हैं, उसकी गुलामी कर रहें हैं तो ऐसी सोच स्थानीय लोगों में हीन भावना पैदा करती है और यही सोच आपसी टकराहट का कारण बनती है।
    अब अगर इन दोनों ही परिस्थितियों पर गौर किया जाए तो यह बात सामने आती है कि जो व्यक्ति अपने घर को छोड़कर बाहर आया है वह बेरोजगारी का षिकार है और जो व्यक्ति हीन भावना से ग्रस्त हो रहा है वह काम न मिलने के कारण या काम के अनुसार मजदूरी न मिलने के कारण बेरोजगारी का षिकार है अर्थात् दोनों ही जगह बेरोजगारी ही आपसी टकराहट का कारण बनती है।
ऐसी स्थिति में सत्ता में बैठे जन प्रतिनिधियों व सरकार चलाने वाले हुक्मरानों को चाहिए कि वे रोजगार के अवसर पैदा करें और ऐसी स्थितियाॅ पैदा करें कि किसी व्यक्ति को अपना राज्य या शहर छोड़कर जाना ही न पड़े और अगर कोई व्यक्ति अपना शहर या राज्य छोड़कर आता है तो  उसको ऐसा माहौल मिले कि वह निर्भिकता से व ईमानदारी से काम कर सके। अब यह काम कैसे हो यह जिम्मेदारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में तंत्र की है। अगर आम जन मे हीन भावना समाप्त हो जाएगी तो आपसी टकराहट की स्थितियाॅं स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। राज्य की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों को गरिमा के साथ जीने के अवसर प्रदान करंे और आजीविका कमाने के अवसरों को प्रदान करें। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो संवैधानिक तौर पर यह राज्य की विफलता का प्रतीक है। भारत एक राष्ट्र है और इसमें रहने वाला प्रत्येक नागरिक भारतीय है न कि मारवाड़ी, आसामी और बिहारी आदि आदि। ऐसी स्थिति में अगर किसी भी राज्य में जाति को लेकर व वर्ग को लेकर संघर्ष होता है तो इस संघर्ष को रोकने की जिम्मेदारी सरकार की बन जाती है। भयमुक्त माहौल को पैदा करें और आमजन अपने जीवन को जी सकें। अन्यथा राहुल गाॅंधी का कहा यह कथन सही होगा कि किसी दूसरे राज्य में जाकर काम करना भीख मांगने के समान ही है और भीख के भरोसे कब तक रहा जाएगा।


श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’
पुष्करणा स्टेडियम के पास
नत्थूसर गेट के बाहर
बीकानेर {राजस्थान}
मोबाइल 9950050079



Comments to this Article
aaj agar bharat main aadmi aadmi ka dushman hai to iski jimmedar 1947 se ab tak ki sarkar hai or wo sarkar congress ki rahi hai
Isliye Rahul vinci ko is bare main bolne ka adhikar nahin hai, Akshay (2011-11-18 11:01:06)
BAHUT ACHHA LAGA AAPKA LEKH OR MAI YE FEEL KARTA HU KI AAPNE SAB SAHI KAHA HAI OR EN SITUATION SE MAI BHI FACE HUA HU JAB HUM LOG KOLKATTA RAHTE THE US TIME HUM LOGO KO BHI AISA FEEL HOTA THA KI BAHAR HAI OR BIKANER HI APNA CITY LAGTA HAI. AAPKA AISE LEKH KE LIYE THANKS , NARESH SHARMA (2011-11-24 04:19:22)
Thanks to all of you ki aap sabne es article ko pasand kiya or es par apne comment diye ye aapka pyar hi hai ki mai next or next article likhta rahta hu thanks again to all of you , SHYAM NARAYAN RANGA (2012-02-12 10:42:58)

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