बेटी कहे पुकार के, मां मुझे जीने दो
ना मारो कोख में, मुझको जीवनदान दो
मत मनाओ भले, जन्म उत्सव मेरा
फिर क्यूं छीनती हो, जीने का हक मेरा
मुझे जन्म लेने दो मां
स्वच्छन्द वातावरण में सांस लेने दो मां
पिता का प्यार पा लेने दो मां
भाई की अंगुली पकड खेलने दो मां
मां का प्यार पा लेने दो मां
मुझे भी आजादी से जी लेने दो मां
सुबहा से शाम तक काम करती
मां-बाप , भाई-बहिन की सेवा करती
सदाचार से जीवन बिताती
कभी भी ना किसी को सताती
थकती है तो भी शिकायत ना करती
फिर क्यूं ? मां बेटी को मारने के लिए ‘हां‘ है भरती
कन्यादान व गऊदान कहते हैं महादान
करो प्रण ना मारने का, करो ये बलिदान
नवदुर्गा, वैष्णोरूपी है बच्ची
विधाता की रची हुई सौगात है सच्ची
मां होके क्यूं रूख है, बेटे का तेरा
क्या कोई अधिकार नहीं है,जीने का मेरा
मैं तो तुम्हारी की मूरत की इक छाया हूं
देखो, गौर करो, तुम्हारी ही काया का इक हिस्सा हूं
मम्मी -पापा की प्यारी बेटी बनूंगी
बडी होकर मैं भी नाम रोशन करूंगी
बेटियों को मत आंकों किसी से भी कम
बेटियां जमाने को बदल देगी, अगर खा ली ये कसम
हर मां-बाप का सुनहरा सपना इक बेटी हो
बदल जाएगा समाज और जमाना ,यदि हर घर में इक बेटी हो
- अनिल भार्गव (झुन्झुनूंवाला)