बसंती बयार के इस फाल्गुन माह मे जीवन की एक अलग ही उमंग होती है। जीवन के रंगो को दर्षाता यह महीना अपनी अल्हडता व मस्ती के लिए पूरी दुनिया में विषेश अंदाज के साथ जीया जाता है। भारत मे फाल्गुन माह में होली का त्यौहार अपना विषिश्ट स्थान रखता है। वैसे तो पूरी दुनिया में ब्रज की लठ्ठमार होली अपनी अलग पहचान रखती है लेकिन राजस्थान के बीकानेर की होली भी अंदर मस्ती, उल्लास के साथ साथ विषेश अंदाज समेटे हुए हैं आइये जानते है कैसी है बीकानेर की होली।
बीकानेर में होली का त्यौहार नौ दिन का होता है। खेलनी सप्तमी के दिन से षुरू हुआ यह त्यौहार पूर्णिमा को धुलंडी के दिन जाकर समाप्त होता है। बीकानेर के षाकद्वीपीय ब्राह्मणों द्वारा खेलनी सप्तमी के दिन मरूनायक चौक मे खम्भ पूजन के साथ ही होली के त्यौहार की षुरूआत कर दी जाती है। चूंकि षाकद्वीपीय समाज के लोग बीकानेर के मंदिरों के पुजारी है अतः षहर की प्रसिद्व नागणेची माता मंदिर मे इस दिन धूमधाम के साथ पूजा की जाती है व षाम को गैर गाते हुए पुरूश षहर मे प्रवेष कर होली के प्रारम्भ की सूचना देते है। अगले ही दिन अश्टमी को बीकानेर षहर के किकाणी व्यासों के चौक मे, लालाणी व्यासों के चौक मे सुनारों की गुवाड मे कई अन्य जगह पर थम्भ पूजन होता है व होलका प्रारम्भ होता है। इन दिनों में बीकानेर में रम्मतो की भी धूम रहती है। षहर के बारह गुवाड चौक में , बिस्सो के चौक मे, आचार्यो के चौक में, भट्डो के चौक मे, किकाणी व्यासों के चौक मे फक्ड दाता की रम्मत, हडाऊ मेरी व स्वांग मेरी की रम्मते, भक्त पूरणमल व षहजाही नोट की की रम्मते व अमरसिंह राठौड की रम्मत खेली जाती है। इन रम्मतों मे ख्याल, लावणी, चौमासों के साथ साथ फालगुनी मस्ती डे गीतो की धूम रहती है। रम्मतों के प्रथान व चौको मे उमडनें वाली भीड देखकर स्वतः अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीकानेर का आम जनमानस कितने गहरे तक अपनी परम्पराओं व रीति रिवाजों से आप भी जुडा है। होली के दौरान बीकानेर मे विभिन्न जातियों की गैर भी निकलती है। गैर मे पुरूश नाचते व गाते हुए विभिन्न मौहल्लों से निकलते है व चंग की धारा पर मस्ती का माहौल पैदा करते है। इन गैरो को रोकने के लिए ‘‘ तणी ‘‘ तोडते वक्त जो नजारा बनता है उससे बरबस ही ‘‘ महाराश्ट्र के गोविन्दा आला रे आला ‘‘ की याद जाती है व महसूस होता है कि विभिन्न संस्कृतियों का हमारा भारत जिस तरह एकता के साथ मे पिरोया हुआ है।
बीकानेरी होली का सबसे आकर्शण का केन्द्र होता है पुश्करणा समाज के हर्श व व्यास जाति के बीच खेला जाने वाला डोलची पानी का खेल ‘‘डोलची‘‘ चमडे से बना एक ऐसा पात्र है जिसमे पानी भरा जाता है व जोरदार प्रदार के साथ सामने बाले की पीठ पर इस पानी को मारा जाता है। बीकानेर के हर्शो के चौक मे होने वाले इस आयोजन को देखने इतनी भीड उमडती है कि जैसे सारा षहर ही आप यहां इकट्ठा हो गया है। प्रेम के रंग से भरी डोलची जब प्यार से पीठ पर पडती है तो इसकी गूंज आस पास खडे लोगो में भी उमंग भर देती है। करीब चार सौ साथ से चल रहे इस आयोजन के पीछे अपना एव समृद्वव गौरवषाली इतिहास है जिसकी पालना आप भी हर्श व व्यास जाति के लोग बडी षिरदत व ईमानदारी से करते है। होली के अवसर पर बीकानेर मे स्वांग की मस्ती का अपना अलग ही अंदाज है। गलियों व मौहल्लो मे आठ दिनों तक स्वांग बने लोगो की धूमर रहती है कही आपको भगवान षिव मिलेगे तो विश्णु भगवान ब्रहा जी से भी आपकी मुलाकात हो जाएगा। राक्षसों को देवताओं से गले मिलते भी आप इस दौरान देख सकते है। स्त्री वेषधारी स्वांग देखकर आप हैरान रह जाएंगे कि पुरूश मे भी नारी सुलभ सौदर्यता इस हद तक हो सकती है। इन स्वांग बने रानियो के लिए षहर के पुश्करणा स्टेडियम मे होली के दि नही ‘‘ फागणिया फुटबाल‘‘ का भी आयोजन होता है। इस खेल में स्वांग बने लोगो को ही एंटी दी जाती है। स्वांगधारियों के लिए आयोजित होने वाली ‘‘ मिस बीकाणा‘‘ प्रतियोगिता का भी अपना एक अलग मजा होता है।
होलाकश्टक के दौरान षहर मे लोग पापड नही खाते है और होलिका दहन के तुरंत बाद ही षहर में पापड का स्वाद बिखर जाता है। षहर मे सबसे पहले जूनागढ के आगे राजपरिवार की होली का दहन होता है व बाद मे साले की होली चौक मे व बारह गुवाड चौक मे होली जलाई जाती है। सबसे अंत मे दम्माणियों के चौक मे होली का दहन किया जाता है।
धुलंडी वाले दिन षहर मे पारम्परिक अषलीलता अपने चरम पर होती है। होली की मस्ती मे बीकानेर का हर बूढा, हर नौजवान व प्रत्येक बच्चा रंगा होता है। उम्र व पीढियों की सीमाएं तोडकर धुलंडी के दिन षहर की संस्कृति साझा हो जाती है दिन भर की मस्ती व उमंग सूयस्त तक अपने परवान पर चढती है।
धुलंडी वाले दिन भी षहर मे पुश्करणा समाज के हर्श जाति के दुल्हे की बारात निकलती है। वाकयदा विश्णु वेषधारी यह दुल्हा व्यास जाति के तेरह से सत्रह घरो के आगे जाता है व घर की औरते विधिवत दुल्हे का स्वागत करती है व मंगल गीत गाती है। बारात को जगह जगह पर दूध चाय व नाश्ते से स्वागत किया जाता है इन धरो मे धूमकर बिना दुल्हन लिए ही यह दूल्हा अपनी संस्कृति व इतिहास को समृद्ध कर वापस घर लौटता है। यह आयोजन अपने आप मे एक बडी धरोहर व संस्कृति को समेटे है।
रस प्रखर बीकानेर की होली में अल्हडता है मस्ती है रंग है इतिहास है गौरव है संस्कृति है जिस की पालना आज भी षहर के लोगो द्वारा पूरे मनोयोग से की जाती है। बीकानेर की होली अपने दामन मे कई रंग समेटे है जो इन आठ दिनों मे खुलकर बिखरते है व इन रंगो से सारेबार होने के लिए भारत भर मे फैला बीकानेरी बीकानेर आता है व पूरी तरह से रंग जाने की कोषिष करता है।
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