मनुष्य का यह विलक्षण युग है कि वह जिन चजों को सबसे कम समझता है उन पर सबसे तेज प्रतिक्रियांए व्यक्त करता है। सच्चिदानन्द सिन्हा की यह उक्ति मानवीय संस्कृति के संदर्भ मे जितनी खरी है उतनी ही ताल-संस्कृति के संदर्भ में भी। जब षहर का षैक्षणिक स्तर बहुत कम था और नगर विकास की अन्धाधुन्ध दौड का प्रतिभागी नही था, तब यहाँ के लोग प्रकृति मित्र कहे जा सकते थो। उनकी जीवनचर्या एवं दैनन्दिन कर्म मे प्रकृति के निमित ऐसे कर्म षामिल थे जो सार्वजनिक हित का पोशण करते थे।
नगरीकरण के चलते जिन बुराइयों की षिकायत देष के अन्य भागों की संस्कृति हुई, बीकानेरी संस्कृति भी उनसे अछूती नही रही। इसका कारण षिक्षा के बढते प्रभाव ने व्यक्ति को षिक्षित तो कर दिया पर संवेदना और चरित्र के स्तर पर कोई ठोस परिवर्तन ला दिया हो, ऐसा नही हुआ। फलस्वरूप अपने मूल स्वरूप में वे जितन सच्चे, सक्रिय, संवेदनषील, सजग और सतर्क रहे, कालान्तर मे वे उतने ही गैरजिम्मेदार, अनुत्तरदायित्वपूर्ण, निश्क्रिय और बेखबर हो गए।
एक समय था जब बीकानेर मे लगभग १०० से ज्यादा ताल-तलाइयाँ रही होगी। आज १ प्रतिषत भी संरक्षित है तो बडी बात समझी जाए, क्योंकि भौतिकतावादी दृश्टिकोण के चलते आज हर चीज या वस्तु को उपयोगितावादी दृश्टि से परखा जाता है। अगर उसकी उपादेयता संदेह के धेरे मे भी आ जाए तो उसका महत्व कम हो जाता है। नगर मे लगभग १०० से ज्यादा ताल-तलाइयों का होना, उनकी देखरेख, उनकी व्यवस्था से जुडी कठिनाइयों का सामना करना आदि उस समय के मनुश्य के दैनन्दिन सामाजिक कर्म मे षामिल था। आज से आदमी के दैनन्दिन कार्यो की सूची में अव्वल तो काई सामाजिक कर्म षामिल ही नही होता, अगर होता भी है तो उसमें बहुजन हिताय के बजाय स्वहिताय की भावना ज्यादा लक्षित की जा सकती है। फलस्वरूप संस्कृति से जुडे कर्मो की फेहरिस्त तो लम्बी हो गई पर उनसे लाभान्वित होने वाले जनों की संख्या का प्रतिषत घटा है। आज का व्यक्ति सार्वजनिक कर्म इसलिए करता है ताकि उसके अन्याय गैर सामाजिक कर्मो की विदूपता पर अव्वल तो समाज की नजर ही न पडे और पडे भी तो अपने द्वारा किए इन कर्मो से अपने तमाम अकर्मो को इनकी ओट मे छिपा सकें।
क्योंकि नगर में लगभग १०० से अधिक तालाबों का होना संगत नजर आता है, अतः इसे तालाबों की नगरी कहा जाए तो अत्युक्ति नही होगी। इसलिए ही कहा गया है सीयाळो खाटू भलो, उनाळो अजमेर।
नागौर नित रो भलो, श्रवण बीकानेर।
इस लोक प्रचलित पद मे कहा गया है कि मरूप्रदेष मे श्रावण का भरपूर आनन्द ही लेना हो तो उसके लिए बीकानेर का कोई विकल्प नही है। प्रष्न उठता है कि थार के रेगिस्तान के इस इलाके को श्रावण का श्रेश्ठ स्थल घोशित क्यों किया गया? इसका सीधा- सादा उत्तर एक तो यही है कि चातुर्मास में ही श्रावण आता है। यही बारीष का समय भी है। यहाँ लगभग सौ से ज्यादा तालाब रहे होगे। श्रावण माह मे वे पानी से लबालब रहते थे। फलस्वरूप उनके किनारे सधन वृक्षों की छाया थी। सांस्कृतिक माहौल मेले मगरियों मे उत्सवी बना रहता था। दूसरे श्रावण माह मे बारिष के कारण धीरे गीले तो हो ही जाते थे साथ ही सिन्दूरी आभा से युक्त भी हो जाते थे। घास आदि भी चा-पांच दिन मे उगने से चारो और वातावरण हरियाला हो जाता था। अतः उत्सवी आनन्द की बयार ही चारों और बहती रहती थी। इसलिए श्रावण बीकानेर का कहा गया।
जब ताल-तलैयाओं का यह जान अपने बीकाने प्रवास के दौरान तरूण भारत संध के श्री राजेन्द्रसिंह ने देखा तो उनके मुह से भी निकल पडा कि जल संरक्षण के मामले मे यहां के लागे राजथान के अन्य जिलो से बहुत आगे थें। तब फिर एक प्रष्न और काँधता है कि तालाबो की नगरी म आज केवल कुछेक तालाब देखने को मुष्किल से ही क्यों मिलते है? ऐसा क्या हुआ कि जिसने इस संस्कृति को इतने गहरे तक क्षत विक्षत किया कि आज इसके पदचिन्ह भी खोजना मुष्किल हो गया है? अचानक लगभग सौ से ज्यादा तालाब लुप्त हो गए? जाहिर है ये सब एक दिन, एक माह व एक वर्श मे नहीं घटा। संस्कृति के क्षरण की प्रक्रिया अत्यन्त धीमी होती है, चाहे वह मानवीय संस्कृति हो या कोई अन्य। यह तथ्य ताल संस्कृति पर भी लाग होता है। आजादी के बाद पचास वर्शो मे जितना नगर बढा, उतने ही तालाब घटे। नगर के बढने के व्यंजनार्थ मे उसके चहुँमुखी विकास की ओर संकेत है।
नगर से इस संस्कृति का लोप होना कोई सामान्य घटना नही रही । हालाँकि नगर के अधिकाषं जनों ने इसे सामान्य ही समक्षा। असल मे इस संस्कृति के हास से सामाजिक सद्भाव, परस्पर सहयोग और मानवीयता आदि मूल्यों का हास भी जुडा है। सूक्ष्म पर्यवेक्षण से जो तथ्य सामने आए, उनके अनुसार नगर में इस संस्कृति के लोप के चार कारण प्रमुख रहे ः
सामाजिक सजगता एवं सक्रियता का हृास ।
पाइप लाइन से जलापूर्ति
अतिक्रमण की प्रवृति का आक्रामक रूप एवं
खनन व्यवसाय
अधिकांष लोगो ने इस संस्कृति के क्षरण का कारण पूछने पर उन्होने बताया कि अतिक्रमण और खनन ही इसका मुख्य आधार रहे। लेकिन गौर से देखा जाए तो तस्वीर का एक दूसरा रूप कुछ और ही सच बताता है। मारवाडी में एक कहावत हैः-
साँची तो कैणी चाऊँ, मूँडे आई बात।
षंका और मुलायजा, कैवण देते नाय।
लेकिन मै षंका और मुलायजा नही रखते हुए इस संस्कृति के नश्ट होने के कारणों में सर्वप्रथम कारण सामाजिक चेतना के अभाव को ही मानता ह क्योंकि जब यह संस्कृति अपने षैषव मे थी तब से लेकर इसके यौवनकाल तक समाज का हर समुदाय इसकी राह मे आने वाली हर समस्या से दो हाथ करने की मुद्रा मे हमेषा तैयार रहा। कालान्तर मे इस प्रवृति में कमी आई। फलस्वरूप इस संस्कृति के मलू स्वरूप को क्षति पहुंची।
दूसरे, जब तब इस षहर में पाइप लाईन नही आई थी तब तक पेयजन स्त्रोत तालाब कुए बावडियां ही रहे। पाइप-लाइन के आगमन ने इनके महत्व को घटा दिया। फलस्वरूप समाज ने इनकी आवष्यकता को उचित नही माना और वे नेस्तनाबूद होते गए। पाइप लाइन यानी केन्द्रीय जल वितरण व्यवस्था, जो आज भी समाज को किसी तथ्य वस्तु आदि का तात्कालिक लाभ मिलना बंद हो जाता है तो दूरदृश्टि के अभाव में उसकी अनदेखी षुरू हो जाती है और यह इस हद तक होती है कि अन्त मे वह तथ्य, वस्तु आदि पूर्णतः विनाष के कगार पर आ जाती है। तालाब भी समाज की इसी सोच का षिकार हुए है ।
तीसरे इस संस्कृति के क्षरण मे अतिक्रमण का योगदान रहा, क्योंकि जनसंख्या वृद्धि और गांवो से पलायन कर आ रहे लोगो को रिहायष की खातिर जमीन की आवष्यकता पडी। षहर छोटे पडने लगे। ऐसे मे ताल तलैयाओं की आगोर खुली पडी थी और सामाजिक चेतना के अभाव मे उनका कोई धणी धोरा भी नही था, अतः उस पर कब्जा करना आसान था। साथ ही इन ताल तलैयाओं के व्यवस्थकर्मी समाज भी चूंकि अब पानी की समस्या से पाइप लाइन आने के कारण निजात पा चुके थे अतः उन्हे भी अब कोई विषेश रूचि इनमे नही रही । अतः लोग आते रहे आगोंरे आबाद होती रही, तालाब घटते गये और ताल-संस्कृति नश्ट होती गई।
चौथा महत्वपूर्ण कारक तत्व रहा- खनन व्यवस्था। क्योंकि प्रातः ताल तलाइयों की आगोरी बजरी की खदान के निकट रही है, अतः इन व्यवसायियों ने बिना यह सोचे समझे, कि हम भी उसी समाज का हिस्सा है जिसको इससे नुकसान होने वाला है, इन आगोरों को खोदना षुरू कर दिया। अंततः यह खनन तालाब की आगोर का नहीं वरन् समाज की आगोर क था जिसके सहारे समाज मे संस्कृति की सौरभ फैल रही थी। बल्कि कई जगह तो चौकाने वाले ये तथ्य भी सामने आए कि स्वंय तालाब की व्यवस्था करने वाले ट्रस्ट ने तालाब की आगोर खनन के लिए अपनर स्वीकृति इस तर्क पर दे दी कि इससे तालाब परिसर के विकास को धन मिलेगा और इस क्षेत्र मे विकासात्मक कार्यो को गति मिलेगी।
इसके साथ ही, एक कानूनी पेंच ने भी इस संस्कृति के नश्ट होने में अपनी अहम् भूमिका अदा की। वह पेंच था कि प्रायः प्रायः तालाबों का पटटा व्यक्तिगत नाम से नही था वरन् सार्वजनिक हितार्थ प्रन्यास आदि के नाम से होता था तथा आगोर जमाबंदी में चढा दी गई। जिससे कालान्तर मे अगर उस आगोर पर अतिक्रमण या खनन आदि हुआ और उससे जुडे पदाधिकारियों ने उसे रोकने की पहल की तो मालिकाना हक-हकूक न होने के कारण वे इसे नश्ट होने से बचा नही सकें। खनन व्यवसायिों एवं अतिक्रमण करने वालों को यह पेंच भली प्रकार से समझ आ चुका था, अतः उन्होने इसका भरपूर फायदा उठाते हुए समाज का भरपूर नुकसान किया।
इसके अलावा हम एक ऐसे समय मे जीवनयापन कर रहे है जिसमें हर वस्तु बिकाऊ होती जा रही है। ऐसे बिकाऊ होते जा रहे समय मे जल जैसे प्राकृतिक संसाधन पर महत्वाकांक्षी मनुश्य की दृश्टि जाना स्वाभाविक है। ताल संस्कृति के नश्ट होने के कारण साथ साथ ही समाज मे हाइडेन्ट कुओं का प्रचलन बढा। उसके पीछे सोच यह थी कि कुएँ के पानी को लगभग जीवन भर बेचा जा सकता है। अतः तालाब की तरफ से समाज का ध्यान हटा और हाइडेन्ट की ओर रूझान बढा। फलस्वरूप हाइडेन्ट की संख्या मे दिन-ब-दिन इजाफा होता जा रहा। पानी बेच-बेचकर मनुश्य अपनी स्वार्थपूर्ति के अनुश्ठाने मे निरत है। ऐसे में जल की अधाध्ुाध बिक्री और उससे उपजे फायदे ने तालाब को अनुपयोगी करार दे दिया। कुएं क्योकिं व्यक्तिगत सम्पदा होती है, अतः उन पर व्यक्ति विषेश का वर्चस्व बना रहता है जबकि तालाब इसके विपरीत सार्वजनिक वर्चस्व के होते थे, अतः उनकी सम्पदा पर समाज का अधिकार होता था। कालानतर में विक्रयी प्रवृति के कारण आए परिवर्तन से सामाजिक हित के इस साधन को क्षति पहुंची। इस तरह भी तालाब समाज से अलग होता गया।
यह तो हुई इस संस्कृति के लोप होने की बात । इससे भी अधिक विस्मयकारी तथ्य यह है कि लोग हस संस्कृति के महत्व को अस्वीकार कर रहे है अधिक टटोलने पर यही कहते है पानी की समस्या थी, पाइप लाइन आ गइ, अब इनकी क्या जरूरत? लेकिन ऐसाकहते वक्त वे यह भूल जाते है कि हमारे पूर्वजों ने इस संस्कृति का पल्लवन महज जल संरक्षण के दृश्टिकोण से ही नहीं किया था। हर तालाब की आगोर होती थी, उस आगोर मे नाना प्रकार के पेड व वनस्पतियाँ उगती थी। आयुर्वेदिक नुस्खों के द्वारा उनसे इलाज किए जाते थे। पारिस्थितिकीय संतुलन बना रहता था। हिरण व अन्य जंगली जानवर भी आगोर में स्वच्छन्द विचरण किया करते थे । इस प्राकर प्रकृति का चक्र अपने पूर्ण संतुलन से चलता था। पर्यावरण प्रदूशण का तो प्रष्न ही नहीं उठता था, क्योंकि तालाब के किनारे बडी तादाद मे पेड हुआ करते थे। इनके किनारे लगने वाले मेले मगरिये समाजिक सामंजस्य, उत्तरदायित्व, सहिश्णुता, परस्पी समभाव की अभिवृद्धि के प्रमुख कारक तत्व रहे।
विभिन्न समाजों के लोग अपने परिवार इश्टमित्रों के साथ इन षांत, पवित्र, स्वच्छ वातावरण वाले स्थानों पर आकर आपसी सुख-दुख बांटते थे। कहा जा सकता है कि तालाब व उनके किनारे बने मंदिर उस जमाने के आध्यात्मिक पर्यटन केन्द्र थे। तालाब, नगर की संस्कृति के लिए नदी और समुद्र का विकल्प भी थे। क्योंकि हमारी संस्कृति के मलू मे अध्यात्म का बहु अहम स्थान रहा है अतः यज्ञ, अनुश्ठान आदि कर्म को संस्कृति में बहुत ही अनिवार्य मान्यता प्राप्त थी। धर्मषास्त्रों में वण्रित वे यज्ञादि कर्म जो केवल समुंद्र या नदी के किनारे ही किए जा सकेत थे उन्हे यहां के लोग तालाब के किनारे कर अपनी आध्यात्मिक मंषा की पूर्ति किया करते थें। आज भी तालाब मे होने वाले श्रावणीकर्म को श्राद्धतर्पण को इसी दृश्टि से देखा जा सकता है। नगर के कई तालाबों को तो आजह भी अत्यन्त रमणीक पर्यटन केन्द्रो के रूप में विकसित किया जा सकता है। जिनमें सागर के देवीकुण्ड, कल्याणसागर, षिवबाडी, संसोलाव, हशेार्लाव आदि प्रमुख है।
लेकिन दुर्भाग्यवष स्वातंत्रयोतर पीढी ने इसके इस स्वरूप पर यदा कदा केवल विचार ही किया। व्यवहार में इस हेतु कोई सार्थक प्रयत्न किया गया तो, ऐसा देखने में नही आया। संस्कृत में एक प्रसिद्ध सूक्ति है - ज्ञानः भार क्रिया बिना- अर्थात् बिना कर्म के ज्ञान भार है। समाज ने ताल-संस्कृति से संबंधित ज्ञान को भारस्वरूप ही रखा । इसके प्रति क्रियात्मक दृश्टिकोण कभी अपनाया ही नहीं। फलस्वरूप तालाब के साथ आदमी का सामाजिक रिष्ता भग्न होता गया और परम्पराएं टूटती गई। नगर में बढते अपराध, सामाजिक हिंसा, अराजकता, वैमनस्यता, असंवेदनषीलता ,असहनषीलता आदि इस संस्कृति के विलोपन की ही उपज है जबकि इनके उत्स को समाज किसी अन्य दृश्टिकोण से ही देख रहा है। कुछ अनुभवी बुजुर्गो ने इसी तथ्य को एक अन्य प्रकार से रखते हुए कहा कि स्थानीय आबोहवा व जल ही वहां के लोगो की प्रकृति का निर्धारक तत्व होता है। उनकी यह स्थापना बोध को जन्म दिया है जो किसी हद तक संस्कृति के नृतत्वषास्त्रीय अध्ययन से मेल खाती है। सुनने मे यह स्थापना भी वित्रित्र ही लग सकती है कि जीवन पर तालाब व कुएं के पानी का असर भी अलग अलग होता है, पर यह भी अलग से अध्ययनयोग्य विशय है। इसका एक सहज स्फूर्त तर्क तो यह कि अलग अलग भूमिगत जलस्त्रोतों में विभिन्न प्रकार के तत्वों मे से कुछ हमारे अनुकूल नही होते । पष्चिमी राजस्थान में बहुताधिक जगह पानी खारा है। ऐसे में तालाबों जैसे साधन पीने योगय पानी के लिए ज्यादा कारगर साबित होते है। भूमिगत जल का अधिक दोहन प्रकृति के प्रतिकूल इसलिए भी है कि वह उसके पुनरूत्थान चक्र में कोई सक्रिय भागीदारी नहीं निभा पाती । जबकि तालाब, नाडे आदि इस प्रक्रिया में वांछित सक्रियता आसानी से निभाते रहते है। साथ ही, चलता हुआ जलस्वच्छ व पवित्र माना जाता है। तथा हवा और प्रकाष के साथ भी उनका सम्फ सीधा होता है ंजिससे पानी में जीवाणुओं को विकसित होने का अवसर ही नही मिलता। क्योंकि तालाब के आगार की विषालता सर्वविदित है, अतः उसमें हवा के साथ पानी एक किनारे से दूसरे किनारे तब बहता रहाता है।
इन सबसे अलावा पाइप लाइन बिछाना वाला यह विकसित दिमागधारी समाज भूल ही गया कि आखिर पाइप लाइन में भी पानी कहां से आएग
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