वैश्विक-भारतीय अर्थ व्यवस्था महाजनी सभ्यता का पर्यायवाची रही है। काल और परिवेश के अनुसार इसके कई संस्करण भिन्न-भिन्न स्वरूपों में सामने आते रहे हैं। साम्राज्यवाद-रियासतकाल में महाजनों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दीवानी जगजाहिर थी। इनका परचम शिखर पर फरूकता था, इनका सूर्य कभी आच्छादित या ग्रसित होता रहा है। मोटे तौर पर काल और परिवेश के अनुसार मुखौटा व चोला बदलता रहता है। ऐसा बदलाव नीति और नीयत का हिस्सा है। जरिये -अन्तर्राष्ट्रीया वित्त कोष, विश्व बैंक, डंकन प्रस्ताव-अंकराज, विश्व व्यापार संगठन, ग्लास्तनोत, पेरास्गाइका, उदारवाद, नई आर्थिक नीतियां, विनिवेश आदि नीतियां पूंजीवादी साम्राज्यवाद - महाजनी सभ्यता किसी न किसी रूप में अपना वर्चस्व बनाये रखने में जुटी रही है। कल्याणकारी राजय की अवधारणा जरिये महाजनी बचे है वे नकारा - निष्प्रभावी हैं, दिखावटी है - सार्वजनिक उपक्रम/संस्थान आदि। लाखों के लडाऊ और करोडों के खेलार महाजन/साहूकार व जमींदार, जागीरदार व तअल्लुकेदार (तालुकेदार) ब्रिटिश शासन - रियासतकालीन अर्थव्यवस्था के आधार स्तम्भ रहे हैं। इसके साथ ही इनकी साख ख्यात-कुख्यात रही है। नीति व नीयत के कारण महाजनी सभ्यतापरक अर्थव्यवस्था की इकाई स्तर पर ’मुनीम‘ संस्थान की मानिद उपस्थिति उल्लेखनीय रही है। सही तौर पर देखें तो महाजनी अर्थव्यवस्था का मेरूदण्ड मुनीम नामक संस्था रही है। ब्रिटिश-रियासतकाल हो या फिर स्वाधीन भारत दोनों ही परिस्थितियों में महाजनी सभ्यता के दो स्तर देखे गये हैं। प्रथम- बिणज करने वाले महाजन-सेठ-साहूकार, दूसरा- कृषि पर आधारित-जमींदार, जागीरदार और तअल्लुकेदार, दोनों की रीढ ’मुनीम‘ होते थे। उक्त दोनों क्षेत्रों के ’मुनीम‘ की साख कार्य व्यवहार जुद-जुदा दरअसल इनके मुनीम, मुनीम कहे जाते तो अवश्य थे, परन्तु वे थे तो साफतौर से गुमास्ते, रोकडये व उगाहीदार आदि, बल्कि कई तो हाजरिये-हजूरिये भी थे। बाजरी-हाजरी जुमला इनकी कार्यप्रणाली का परिचायक था। दूसरी तरफ हवेली के दीवानखाने- हवेली के व्यावहारी के मुनीम मोदी से हाली तक को अपनी रैयल समझते थे। इनकी जुबान से निकला शब्द हुक्म समझा जावे इनकी चाह रहती थी..... कमोबेश हवेली में भी मुनीम के अधिनस्थ गुमास्ते, रोकडये उगाहीदार व हजूरिये किस्म के हुक्म बनाने वाले मुनीम कहलाते थे। अपने-अपने कार्यक्षेत्र में, पर थे वे दोयम दर्जे के मुनीम, फिर मुनीम पद कया था/है ?
मुनीम पद की साख - शख्सियत कुछ और होती है। वह उनके चाल-ढाल और व्यवहार से देखते बनती है। मुनीम वहीं होता है जिसकी साख सेठ-साहूकार से हो दरअस्ल बाजार-समाज मुनीम को सेठ का सेठ मानता है। वास्तव में होते ही थे अपने कार्य व्यापार-व्यवहार एवं रहन-सहन के कारण । महाजनी समाज में कुछ जुमले मुनीम की साख, शख्सियत के परिचायक बन गये, बतोर नमूना पेश है- सेठ का सेठ - मुनीम, सेठ की अक्षय मुद्रा -मुनीम, साहूकार का कुबेर - मुनीम, सेठ का कामदार -मुनीम, सेठ का विदुर - मुनीम.....आदि।
दूसरे शब्दों में मुनीम की साख - सेठ की साख, एक और बात जिस सेठ का मुनीम गुणवंत होता था उस सेठ की सेठाई निरी-निराली होती थी, उस सेठ की चाल मदमस्त गजराज सी, बोलते ही लगता - लाखों का लडाऊ और करोडों का खेलार। पोतेबाकी-तिजोरी, हुण्डी उतरे-सिकरे, ’डंको चाले देश दिशावरां में धडल्ले से वो भी मुनीम जी के ताण। गुणवंत मुनीम का सेठ गर्वीला होता, उसे अपने मुनीम पर नाज होता है। मुनीम की सीख से ही सेठ दीन-दुःखी को दान, पखेरुओं को चुगा, चौपायों को घास, गुड व चाटा, नशेबाजों को माल-मलिंदा घुटवाना, उनका जैकारा सुन-सुन कर प्रफुल्लित होना, किसी न किसी बहाने ब्राह्मणों को पोखना, स्वस्तिवाचन से अभिषिक्त व अभिमंत्रित होते रहना, गौशाला, पोसवाल, प्याऊ, धर्मशाला, दातव्य औषधालय, मंदिर बनवाना और मेले -मगरियों में अन्नक्षेत्र, जरूरतमंदों व परित्यक्तजनों में पेटिये फेरना, काल में भूखे डांगरों के लिये राहत सेवा शिवि खोलना, यानी कुछ न कुछ करते रहना, नाम का नाम, साख की साख, पुण्य का पुण्य मिलता रहे, क्यों न करें। गुणवंत मुनीम जो उनके दीवानखाने की शोभा बढाते हैं वे घर बैठे लाखों कमाकर देते हैं।
सेठ के परिजनों को सामान्यतः मुनीमजी से जलन होती है। उन्हें लगता है कि मुनीमजी चिकनी-चुपडी व चतुराई भरी बातों से सेठ को बिलमाकर ऐश करते हैं। इक्के पर चढे फिरते हैं, ठसके से देर से आते और जल्दी चले जाते हैं। मोह लिया है सेठ को, इस सोच की धनी अक्सर सेठानियां होती है। वह भी वे जिनके पास स्वयं की बुद्धि नहं होती, पीहर की होती है या फिर परायी होती है। उन्हें चाकरों की चुगली विश्वसनीय लगती है परन्तु साहूकार कितना ही नासमझ हो, चाहे कितना ही जोरू का गुलाम हो, डरता हो, वह इस बात को खूब समझता है कि मुनीम जी का कोई विकल्प नहीं। उनके जैसा दूसरा कोई नहीं। मुनीम जी से ही बरकत, शोहरत जो मिलती है वह और किसी से नहीं।
मुनीम-गुणवंत मुनीम के मानी क्या है ?
मुनीम-सामान्यतः सेठ-साहूकार के साले होते हैं। वे गरीब घराने से आन बहू के भाई-भतीजे होते हैं, या फिर चाकर के पूत, इनकी दीवानखाने में घुसने की नीयत मे ही खोट होती थी। एक विशेष उल्लेखनीय तथ्य कि समझदार साहूकार प्रथम मो इनको घर में घूसने नहीं देता, कभी अक्लमारी जाय और इनको प्रवेश दीवानखाने में हो जाय तो इनको दीवानखाने से दूर जनाना ड्योढी की हाजी में रखा जाता। फुटक बाजार काम इनको सौंपा जाता जिससे इनकी बहन के खर्चे निकल जाय और इनका भी दरिद्र धीरे-धीरे कम होता जाये। इनकी मुनीमजी का पद पाने की खूब तमन्ना होती है, पर वह ताबे की बाहर की चीज होती है। दूसरा साहूकार यह ठीक से जानता है कि ऐसे मुनीम लोग तिजोरी में सुराग के समान होते हैं। कोशिश करते हैं सेठ का दत्तक बनने की, तीसरा, किसी वजह से ये गरीबी की ओट में मुनीम बन भी जाय तो इनको बसना पूजने वाले मुनीम कहा जाता था......
मुनीम गुणवंत होता है यह उनके कार्य-व्यापार-व्यवहार से सिद्ध होता रहता है नित्यप्रति, वे कौन से गुण है जिनकी वजह से इनकी साख - सेठक, सेठ, कुबेर, कामदार, विदुर आदि कही जाती है। उसे समझ लेते हैं, गुणवंत मुनीम वे होते हैं जो ः-
१. आगमभखी हो, अर्थात् भावी परखने में माहरत रखता हो,
२. मिनख-मिनखाचारे की पहचान खूब होती हो,
३. कर्मनिष्ठ, संतोषी व ईमानदार होते हैं,
४. आंक, पडता व भाव जानने की पुख्ता समझ हो,
५. मनसा, वाचा कर्मणा से शीलता व गोपनीयता परम् इष्ट हो,
६. बिजण की हर कोण से समझ,
७. लेखों की गहरी समझ,
८. सर्वगुण यानी - ब्ण्म्ण्व्ण्ए थ्ण्डण्ए डण्व्ण्ए ।कउण्ए त् - व्ण् का काम एक अकेला व्यक्ति निष्ठा-ईमानदारी से कमोबेश करता है।
९. मुडिया भाषा व धडा-गुणा, बिणज, महाजन व मुनीम की जान हो,
१०. सबसे महत्वपूर्ण बात कि वे सूनी मखरे का धंधा करने में माहरत रखते है, अर्थात् जीरो मुद्रा यानी बिना टके का निवेश किये हो मुनाफा कमाता हैं, इतना ही नहीं, बल्कि मुनाफे का चक्र चलाते रहते हैं, सेठ की आज्ञा के बिना जमाखर्च के लेखों से ही सेठ के परिज्ञान में आता है कि क्या व्यापारिक व्यवहार हुआ।
११. सुख नियंता व दुःख हर्ता होना है,
१२. समर्थवान मुनीम के रहते कभी सेठ का दिवाला नहीं निकलता।
निश्चय ही आजादी के दो-तीन दशक पश्चात् पैदा हुई पीढी में यह उत्सुकता अवश्य देखने को मिलती है कि ये ख्यात नाम मुनीमों की गुणवंतता व शख्सियत कैसी होती थी, चूंकि फिल्मों में प्रदर्शित मुनीमों की छवि को देखकर उनकी/हमार/धारणा विपरित बनी हुई है। वे युवजन-सज्जन उपरोक्त उल्लेखित गुणों को परखने की थोडी सी समझ रखते हैं जो मुनीम की कूज और औकात को आसानी से समझ जायेंगे।
पिछली सदी में कुछ ऐसे मुनीम हुए हैं जिनकी साख आज भी जीवंत है। इनमें ऐसे कम ही मुनीम होते थे जिनके घर सेठ की घोडागाडी खडी उनका इंतजार करती, उन्हें लिये घूमती फिरती।
मुनीमों के कारण साहूकार घराने की साख - मुनीम की साख एक दूसरे का पर्याय बन जाती है। कई मुनीम घराने की साख से इज्जत पाले है तो कई घराने मुनीमों के कारण भी अपनी साख उपार्जित करते हैं। प्रथम दृष्टया - मुनीमों की शख्सियत का रेखाचित्र जो हमारे दिमाग में है, वे इस प्रकार है ः- लम्बी चौडी भरी-पूरी कद-काठी, पंचरंगी पाग, उन्नत भाल, कुंकुं का वैष्णवी तिलक, गहरी दृष्टि सम्पन्न आंखे, धीर-गंभीर, प्रसन्नचित्त आकर्षित मुख-मुद्रा, बाकडली मूंदे, बंध गले का कोट, घुटनों तक लम्बा, चून दी हुई धोती, कंधे पर दुपट्टा, हाथ में छडी, ठसके की चाल, जल्दी से कोई पास नहीं फटकता, जो एक बार बात कर गया वह उम्र भर के लिए वशीभूत हो गया, कर्णप्रिय वाणी-नपी तुली व ओजस्वी, ऐसे में माणकलालजी जोशी, शिवप्रतापजी जोशी, रमणलाल बिस्सा, जीवराजजी कल्ला, शिवचंद बागडी का नाम तथा जगन्नाथजी हर्ष व भैंरूबक्सजी ओझा की नाम छवि आंखों के सामने उभरती है। जिसे साठोत्तरी पीढी खूब जानती है। चाहे तो युवत्तर पीढी साठोत्तरी की आंख-अनुभव से इनकी शख्सियत को भली-भांति समझ सकती है।
मुनीमों की शख्सियत को समझने के लिए महाजन क्षेत्र को वर्गीकृत करके विश्लेषित करते है तो पाऐंगे कि दो तरह के क्षेत्र चिन्हित होते हैं, प्रथम - उत्पादन व आडत तथा दूसरा - दीवानखाने। हम यहां दोनों क्षेत्रों के खास साख-रौब-रुतबे वाले मुनीमों की पहचान करा रहे है। दूसरे शब्दों में बतौर बानगी उन्हीं नामों का यहां उल्लेख हो रहा है जिनकी छवि हमारी पीढी के दिलो-दिमाग में अमिट रूप से अंकित है।
प्रथम उत्पादन व आडत क्षेत्र के अग्रणि मुनीमों में- श्री रामनारायण रंगा, (उत्पादक-आर.आर. कंजारिया व डागा घराना) थोक व्यापार व आडत में श्री रामदेवजी रंगा बहुउद्देशीय खुदरा क्षेत्र के मुनीमों में - श्री शिवकिसन भैया, नरसिंहदासजी रंगा, कजलीदासजी हर्ष, ठेकेदारी व्यवसाय क्षेत्र में श्री मोडारामजी पुरोहित, खादी एवं सर्राफा बाजार में श्री शिवशंकर रंगा की बडी साख है। युवापीढी में भी इनके उत्तराधिकारी इस समय भी कार्यरत हैं।
’मुनीम‘ पद को जो बडी-इज्जत मिली उनमें बडे सेठ-साहूकार घरानों के मुनीमों के कार्य व्यापार व व्यवहार के कारण, ये वे घराने थे जिनका ठाट राजघराने से कम नहीं था। राजघरानों में उनकी खूब पैठ थी। ये घराने रियासतों को विशेष अवसरों पर जरूरत मुजब बडी रकम भी साजते -उचंती देते थे।
गत ५२१ वर्षों के कार्यकाल में कई घराने हुवे, लेकिन मेरी नजर में प्रथम दृष्टया जिनकी साख आज भी महाजनी क्षेत्र में कायम है उनमें प्रमुख घराने हैं - सर्वश्री सदासुख गंभीरचन्द कोठारी, रायबहादुर डागा घराना, सेठ नरसिंहदास, सेठ रामनाथ डागा तथा नरसिंह सहाय, मदनगोपाल, मूंधडा घराने में सेठ गिरधरदास मूंधडा के दीवानखानों की साख सेठ-मुनीम (एक दूसरे के पर्याय) के नामा-कामा-कार्य-व्यापार व्यवहार के कारण आज भी कायम है।
कोठारियों के मुनीम रहे हैं - श्री जीवराजजी कल्ला, श्री ओंकारमलजी व्यास, श्री माणकलालजी जोशी, श्री शिवचंद बागडी, रायबहादुर डागों के मुनीम - श्री शिवप्रतापजी जोशी, श्री रमणलालजी बिस्सा, श्री भैंरूबक्सजी ओझा, तोलाराम अग्रवाल तथा नरसिंह सहाय, मदनगोपाल, मूंधडा घराने में - श्री जगन्नाथजी हर्ष, श्री रमणलालजी जोशी, गौरीशंकरजी चूरा एवं श्री माणकलालजी जोशी प्रमुख एवं आदर्श मुनीम थे।
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