हजार हवेलियो के षहर और छोटी काषी से सम्बोधित होने वाला षहर बीकानेर ऊन उद्योग के लिए भी विष्व में अपनी महत्वपूर्ण पहचान रखता है। बीकानेर क्षेत्र भौतिक एवं मानवीय संसाधनों की दृश्टि से काफी सम्पन्न है। ऊन मण्डी एषिया की सबसे बडी ऊन मण्डी है। बीकानेर देष में कच्ची ऊन के क्षेत्र में सबसे बडा उत्पादक है। देष के ऊन उत्पादन का चालीस प्रतिषत बीकानेर में ही होता है। बीकानेर ऊन उद्योग द्वारा इतनी बडी मात्रा में ऊन उत्पन्न करने के उपरान्त भी यहां ऊन का अंतिम उत्पादन नहीं के बराबर होता है। वर्तमान मे बीकानेर में ऊन उद्योग सें संबंधित करीब एक सौ से ज्यादा इकाईयां कार्यरत है। भेड व ऊन इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण आर्थिक आधार रहा है। इसका वर्णन कर्नल टोड सन् १८२९ में अपनी पुस्तक ‘‘ एनल्स एण्ड एंटीक्वीटीज ऑफ राजस्थान ‘‘ मे कुछ इस तरह से करते है ‘‘ रेगिस्तान में चराई जाने वाली भेडो की ऊन, ऊन से वस्तुएं या उत्पाद बनाने एवं व्यापार करने के दोनों के कामों में इस भाग के लोग ऊन को काम में लेते है। इसका उपयोग हर प्रकार के ऊनी वस्तु बनाने में होता है जो नर एवं नारी दोनों के काम आते है तथा हर अमीर एवं गरीब इन्हे पहनता है। यह चर्खे एवं खड्डी (लूभ) इनकी हर किस्म बनती है जैसे मोटी लोई या कम्बल जिसकी कीमत तीन रूपये प्रति दो नग से लेकर तीस रूपये तक होती है। इनका क्वालिटी अच्छी होती है। इस से दुपट्टा (स्कार्फ) औरतों के लिये बनता है। ऊन के साफे (टर्बन) बनाये जाते है। जो कम से कम ४०-६० फुट लम्बे होते है। वे सिर पर भारी नहीं लगते है।‘‘ कर्नल टोड के इस कथन से बीकानेर की ऊन की महत्व और भी ज्यादा बढ जाता है। बीकानेर की ऊन विषेश रूप से कारपेट वूल है। आजादी से पूर्व बीकानेर रियासत की केन्द्रीय जेल में जो भी कालीन बने व बहुत ही उच्चकोटि के कालीन बने थे। विष्व बाजार में आज भी बीकानेर जेल में निर्मित कालीनों की मांग है, जिसकी मुंह मांगी कल्पनानीत कीमत ग्राहक देने को तैयार है। बीकानेर की जेल मे बले कालीनों के विशय मे तो अनेक कहानियां भी प्रचलित है। जिसके बारे मे एक जनश्रुति यह भी है कि बीकानेर जेल में निर्मित कालीन महाराजा गंगासिंह जी इंग्लैण्ड से खरीदकर लाये थे। बीकानेर मे निर्मित कालीनों में उच्चकोटि की चोखला ऊन का उपयोग किया जाता है। चौखला ऊन की रंगाई पक्की व खूबसूरत होती है। इस ऊन में लचीलापन होने के कारण कारपेट अपनी खूबसूरती को स्थाई रूप से कायम रख सकता है। इसी कारण बीकानेरी ऊन को कारपेट वूल के नाम से जाना जाता है। चौखला ऊन का उत्पादन कम होने के कारण न्यूजीलैण्ड वूल व अन्य आयातित वूल से इसकी पूर्ति की जाती है। अन्य ऊनों के मुकाबले बीकानेर की चौखला ऊन प्राकृतिक रूप से लचीलापन के लिए सर्वश्रेश्ठ है और न्यूजीलैण्ड वूल इसके बराबर नहीं है। चौखला ऊन से निर्मित कारपेट कलात्मक होते है। बीकानेर में ५० से अधिक संस्थाएं और समितियां है जो प्रतिवर्श दस करोड से भी अधिक की ऊनी माल देष के सभी राज्यों मे बिकती है। बीकानेर की ऊनी लोई, राजीव षॉल, लेडीज षॉल, रेडीमेड, होजयरी वस्त्र बहुत प्रसिद्ध है। गांवो में परम्परागत चर्खो पर कतई होती हैं बीकानेर में लगभग एक लाख व्यक्ति खादी कार्य से आंषिक व पूर्ण रोजगार से जुडे है।
गलीचा ऊन व कराकुल पेल्ट उत्पादन विकास से संबंधित केन्द्रीय भेड व ऊन अनुसंधान संस्थान की प्रयोगषाला व केन्द्र बीकानेर में स्थित है जो देष की भेडों से सोवियत रूस की कराकुल भेडों से संकर प्रजनन द्वारा गलीचा ऊन की मात्रा व किस्म में वशिद्ध व सुधार में निरन्तर प्रयासरत है। सन् १९५६ में केन्द्रीय ऊन विष्लेशण प्रयोगषाला बीकानेर मे स्थापित की गई। इस प्रयोगषाला में विषेशज्ञों द्वारा ऊन के रेषे की लम्बाई, माइक्रोन, रेषे का व्यास व षुद्ध ऊन की माता व प्रतिषत आदि की जांच की जाती है। सन् १९७९ में राजस्थान सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर मरूस्थल से जुडे सम्पूर्ण भू-भाग को ऊन आधारित क्षेत्र घोशित किया था। सन् १९८१ के बीकानेर स्थित बीछवाल औधोगिक क्षेत्र में ऊन मंडी यार्ड की स्थापना की गई है। मिर्जापुर और भदोई क्षेत्र से दक्ष गलीचा बुनकर लाकर स्थानीय लोगों को प्रषिक्षण दिलवाया जाए और बीकानेर मे ही निर्मित चौखला ऊन के धागे का अंतिम उत्पादन गलीचा तैयार करवाया जाए तो बीकानेर क्षेत्र में हजारों लोगो को स्वरोजगार मिलेगा वहीं विदेषी मुद्रा अर्जन में बीकानेर की राज्य में प्रत्यक्ष भागीदारी बढेगी। ऊन उद्योग के विकास और उससे अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिये यह अतिआवष्यक है। कि भेडो से अधिक ऊन प्राप्त की जाए और ऊन की मात्रा तथा गुणवता में सुधार के प्रयास किये जाए। बीकानेर में ऊन उद्योग का भविश्य उज्जवल है। बषर्ते प्रयास यह किया जाए कि बीकानेर में ही अंतिम उत्पादों का निर्माण हो, जिससे बीकानेर के लोगो का अधिकाधिक रोजगार के अवसर प्राप्त हो सके। बीकानेर में देष की सबसे अधिक ऊनी मिलें है जिनमें गलीचा निर्माण को लिए काम आने वाला धागा तैयार किया जाता है। विदेषी मुद्रा अर्जन में बीकानेर ऊन मण्डी का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भागीदारी है। ऊन उद्योग को विकसित करने के लिए आवष्यक है कि राज्य सरकार ऊन व्यवसाईयों को प्रोत्साहित करें कि वे ऊन से निर्मित अंतिम उत्पादो का निर्माण बीकानेर में ही करें। ऊन उद्योग को विकासोन्मुख बनाने के लिए आवष्यकता इस बात की है कि सरकारी स्तर पर इसके विकास की ऐसी नीति निष्चित की जाए जिससे व्यवसायी स्वंय आकर्शित होकर इस उद्योग को अपनाए तभी बीकानेर में ऊन उद्योग व उससे निर्मित गलीचा उद्योग पनप सकता है और परवान चढ सकता है। एषिया की सबसे बडी ऊन मण्डी होने का गौरव बीकानेर के नाम दर्ज है। इस गौरव को बरकरा और इसमें उत्तरोतर वशिद्ध के लिए यह जरूरी है। कि बीकानेर के सभी राजनीतिज्ञ दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर बीकानेर के हक के लिए अपनी-अपनी आवाज बुलन्द करें ।
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