विक्रम संवत् १५४५ की वैशाख शुक्ला द्वितीया के दिन जोधपुर के राव जोधाजी के पुत्र ’बीकाजी‘ ने अपने चाचा कांधल के सहयोग से बीकानेर की स्थापना की। बीकानेर के तीन घराने यहां बन-बीका, बीदा, कांधलोत। इनके आश्रय में संगीत जीवी जातियों में ढोली तथा दमामी मुख्य थे। बीकाजी ने अपने पिता से राजचिन्हों के फलस्वरूप ’बेरीसाल नगारा‘ तथ ’भंवर ढोल‘ भी प्राप्त किया था जो आज भी बीकानेर दुर्ग में संरक्षित है। सन् १५७४ में रायसिंह ने आलमखाना, नौबतखाना, नक्कारखाना, तालीमखाना, गुणीजनखाना जैसे विभागों में कलाकारों को नियुक्तियां दी। रायसिंह जी के अनुज महाराजा पृथ्वीराज डिंगल के प्रसिद्ध कवि थे और उन्होंने संगीत-नृत्य विषयक अनेक फुटकर रचनाओं का निर्माण किया जिसमें योगमाया और कन्हैयाष्टक (अमृतध्वनि) महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। सत्रहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में अनूपसिंह का शासन काल संगीत की दृष्टि से बीकानेर के लिए सर्वाधिक गौरव का कहा जा सकता है। महाराजा अनूपसिंह की गुणग्राह्यता से प्रभावित होकर ही भाव भट्ट दिल्ली से बीकानेर आये तथा यहां उन्होंने ’अनूप संगीत रत्नाकर‘, अनूप संगीत विलास‘, ’अनूप संगीताकुश‘, भाव मंजरी जैसी अनुपम संगीत ग्रंथों की रचनाएं की। स्वयं महाराजा ने भी ’अनूप संगीत विनोद‘ नामक ग्रंथ लिखा। इसके अलावा महाराजा ने महत्वपूर्ण संगीत ग्रंथों की पाण्डुलिपियां एकत्रित की और ’अनूप-संस्कृत ग्रन्थागार‘ में २०८ संगीत ग्रंथों को संकलित र बीकानेर को दुनियां के मानचित्र पर शीर्षस्थ किया। कलात्म नृत्य के प्रथम आचार्य सांवलदास भी महाराजा अनूपसिंह के आश्रित कलाकारों में रहे हैं। महाराजा रतनसिंह जी और सरदारसिंह जी के शासन काल में जानकीप्रसाद कत्थकाचार्य हुए जिन्हें ’बनारस घराने का संस्थापक‘ कहा जाता है। जयपुर घराने के संस्थापक गोपालपुरा के हरीप्रसाद, हनुमानप्रसाद कत्थक का नाम यहां उल्लेखनीय है। इसी क्षेत्र के जयलाल जेसे कत्थकाचार्य के नाम से आज भी कलाकार कान पकडते हैं। सरदारसिंह के समय ’वल्लभ सम्प्रदाय‘ में प्रचलित कीर्तनकारों की परम्परा का विधिवत् श्रीगणेश हुआ। इस परम्परा के सूत्रधारों में चैनधर जी गोंसाई, श्यामलालजी, पं. काशीनाथजी, श्री बालकिशनजी, श्री जमनादासजी गोंसाई, जेठा महाराज, श्री वल्लभजी, श्री बंशीजी, श्री अबीरचन्दजी, श्री गोपालजी, श्री कोटि महाराज जैसे उच्चकोटि के कलाकार हुए। महाराजा गंगासिंहजी के समय के दस्तावेजों में मिरची खां, शमशुद्दीन खां, रुकनुदीन खां, अल्लारखे खां, लंगडे हुसैन बख्श, कासिम खां, सराजुद्दीन, अल्लाउदीन, गुलाम मोहम्मद, पद्मश्री अल्लाह जिलाई बाई प्रमुख है। तलवारों, कांच के टुकडों, शूलों (कीलों), गुलाल पर चमत्कारिक नृत्य प्रस्तुत करने वालों में गिरधारीलाल तिवाडी का नाम बीकानेर रजवाडे में चर्चित रहा है। महाराजा गंगासिंह के शासनकाल में राजस्थानी गीतों की धुनों को स्वरांकन करने वाले जर्मनी से आये ’बैण्ड मास्टर जैम्स‘ को भारतीय संगीत का ऐतिहासिक पुरूष माना गया है, जिन्होंने ’पं. विष्णु दिगम्बर पुलस्कर‘ को स्वरांकन की शिक्षा दी। सिर पर मुकुट बांध हाथ में बंशी लिए तथा मंदिरों में चक्कर लगाने वाले श्री गोपाल आचार्य की चर्चा करना यहां प्रासंगिक होगा। इसी प्रकार अनेक वाद्यों पर अधिकार रखने वाले प्रज्ञाचक्षु संत गायक गुणिजन पुरी यहां के चर्चित कलाकार रहे। बेवा महाराज (श्री वासुदेव भादाणी) अपनी गृहस्थी छोडकर संगीत कला को समर्पित हो गये थे। नाद साधक श्री भादाणी प्रतिक्षण अपने मुख से विष्णु उच्चारित करते रहते थे। मोहता परिवार े सहयोग से संचालित लाभूजी गोस्वामी ने संगीत विद्यालय स्थापित किया, गांधर्व विद्यालय मास्टर मुस्सदीलाल शर्मा द्वारा संचालित तथा भारतीय संगीत कला मंदिर नृत्याचार्य जमुना प्रसाद पांडे द्वारा संचालित तथा गोपाल गांधर्व विद्यालय गोपाल राव खट्टी द्वारा संचालित हुआ। चूरू निवासी अजयचन्द्र शर्मा ने ऑल इण्डिया संगीत कॉलेज के पश्चात् श्री संगीत भारती बीकानेर की स्थापना की, जो आज भी निरन्तर कार्य कर रही है। श्री संगीत भारती संस्थान द्वारा कलानुसंधान पत्रिका तथा कला दर्शन शोध पत्रिका का प्रकाशन किया गयां इस प्रकाशन कार्य के अन्तर्गत राजस्थान की लोककला संगीत दर्शन, संगीत शिक्षा, मनोविज्ञान कत्थक विषयक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हुई है। इस संस्था का जहां शोध क्षेत्र में संगीत जगत में महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है, तो वहीं संस्था द्वारा ’मनोवैज्ञानिक संगीत शिक्षा प्रदर्शनी‘ भी भारत संगीत शिक्षण संस्थाओं में एक आदर्श रूप में स्वीकार की गई प्रवृति है। संस्था द्वारा प्रारम्भिक से स्नातकोत्तर संगीत शिक्षा पाठ्यक्रम की ९० रागों की प्रस्तुति की ’पाठयोजना‘ भी ध्वन्यंकन के माध्यम से निर्मित की गई है, जो ४५ कैसेट्स में उपलब्ध है। बीकानेर के लोकसंगीत में जैसलमेर, जोधपुर और शेखावाटी क्षेत्र का मिला-जुला रूप रहा है। इन क्षेत्रों में प्रचलित सभी गीत-नृत्य शैलियां बीकानेर में प्रचलित रहीं, परन्तु इसके साथ-साथ यहां के उल्लेखनीय संगीत-नृत्य में ’सिद्धों का अग्नि नृत्य‘ पद्मश्री अल्लाह जिलाई बाई की माड प्रस्तुति, श्री माधवसिंह का कच्छी घोडी नृत्य, रम्मत का नाट्य संगीत निर्गुण वाणी ने अपनी अलग पहचान बनाई है जो संगीत जगत के लिए अनुकरणीय उपलब्धि कही जा सकती है। हवेली संगीत में श्री जगत नारायण गोस्वामी उर्फ ढूंढ महाराज और शास्त्रीय संगीत में श्री मोतीलाल रंगा के नाम भी स्मरणीय रहेंगे।
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|