इन्सानियत इन्सान से कहती है बार बार,
हर हाल मे करना है पोलीथीन का बहश्किार
दरअसल पोलीथीन तो है इक बला का नाम
इसकी वजहा से लग रहा है नालियों में जाम
ख्ाामोष क्यूं बैठी हुई है षहर की अवाम
उठो बदल के रखना है अब षहर का निजाम,
अबके लडाई दोस्तों लडनी है आर-पार,
हर हाल में करना है पोलीथीन का बहिश्कार
ये षहर बीकानेर बनेगा कभी निगम,
मुद्दत से इस उम्मीद में बैठे हुए थे हम,
देखे कोई मकसूद का आला है क्या अज्म
नगर निगम बना के ही इसने लिया है दम,
जिम्मा तो हर इक काम का लेती नहीं सरकार
हर हाल मे करना है पोलीथीन का बहिश्कार।
यह षहर छोटी काषी है कहलाता है महान।
लाखों रूपये का रोज यहाँ होता भी है दान
इंसानियत के वास्ते है वक्ते इमतेहान
अफसोस जिसको मरते है खाकर ये बेजुबान
इंसानियत का हरगिज गिरने ना दौ मैयार
हर हाल मे करना है पोलीथीन का बहिश्कार
करना है पोलीथीन से अब आपको परहेज
कपडे की थैलियो से ना अब कीजिए गुरेज,
कपडे की थैलियों से बने आपकी इमेज,
कपडे की थैलियों से है हर आदमी का फैज
है वक्त हर सपने को कर लिजिए साकार
हर हाल में करना है पोलीथीन का बहिश्कार
कपडें का थैला धर से लेके निकलो साहिबान,
थैली मे पोलीथीन की ना आन है षान,
उस वक्त में निकलती है गरीब की तो जान,
फटती है पोलीथीन बिखर जाता है समान,
नुकसान खुद का देख खुद होते है षर्मसार,
हर हाल में करना है पोलीथीन का बहिश्कार
ताकत से ना रूकेगा ना ये जोरो-जबर से,
ये जुल्म गर रूकेगा तो खुद अपने ही घर से,
लेना है काम आपको दिमाग-ओ-सब्र से,
वरना तो सोचते हुए गुजरे कई अरसे,
खुद पे ‘‘ षकील‘‘ करना है अब खुद का इख्तियार,
हर हाल में करना है पोलीथीन का बहिश्कार।
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