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| RSS | 18 March 2010 |
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संदर्भः- पाकिस्तान क्रिकेट टीम का भारत दौरा शायद भारत और पाकिस्तान के कुछ लोग इस बात का इंतजार कर रहे होंगे कि भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली क्रिकेट सीरीज में उस जुनून का आनंद उठा सकेंगे जो किन्ही दो देशो के बीच होने वाली जंग जैसा होता है परन्तु ऐसी सोच रखने वालो की पीढी पुरानी हो चुकी है और अपनी चमक तेज करता मीडिया इसी पीढी की सोच का भूनाना चाहता है। मीडिया नई पीढी में भी इसी सोच को पैदा कर बाजारवाद के जरिये क्रिकेट से सारा पैसा बटोर लेना चाहता है। अधेड और बूढी होती पीढी इस सोच के साथ भारत और पाकिस्तान की क्रिकेट सीरीज का इंतजार कर सकता है परन्तु नई पीढी इस सोच का नकार चुकी है। नई पीढी की आंखो में जंग का सपना नहीं है। सपना है भी तो इसकी दिशा बदल चुकी है। अधेड होती पीढी की आंखो का इंतजार इसलिये भी पूरा नहीं हो सकता है क्योकि दोनो देशों की क्रिकेट टीमों की कमान नई पीढी के हाथ में आ चुकी है। करीब एक दशक पहले तक भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैचों में जंग जैसा वातावरण देखने को मिलता था। खेलप्रेमियों में ही नहीं खिलाडयों में भी एक दूसरे का पराजित कर सब कुछ जीत लेने जैसा अहसास कर लेने की तमन्ना होती थी। यहां तक की अन्य किसी भी देश से पराजित होना दोनो देशो को गवारां था परन्तु एक दूसरे से हारना चुल्लु भर पानी में डूब मरने जैसा अहसास होता था। १९८७ में भारत पाकिस्तान की सीरीज से पूर्व इमरान खान ने कहा था तेल देखेंगे तेल की धार देखेंगे। १९९१ में विश्वकप के दौरान किरण मोरे और जावेद मियांदाद का विवाद जगजाहिर है। १९८७ के विश्वकप में दोनो देश सेमिफाईनल में हार गये थो परन्तु दोनो देशो में एक दूसरे की हार पर जश्न मनाये गये थे। शारजाह में भारत लगातार पाकिस्तान से पराजित होता रहा और आखिरकार विवाद के चलते भारत ने शारजाह में खेलने से ही इनकार कर दिया। भारत से हारने पर पाकिस्तानी खिलाडयो का स्वदेश लौटना मुश्किल होता था। शारजाह में ही आस्ट्रेलिया कप के फाईनल में अंतिम गेंद जो चेतन शर्मा द्वारा फेंकी गई उस पर छक्का मारकर जावेद मियांदाद ने पाकिस्तान को विजय दिलाई दी। उस गेंद के लिए चेतन शर्मा को उस समय की पीढी ने आज तक माफ नहीं किया है। मैचों के दौरान एक दूसरे देशों के झंडे जलाने की खबरे भी कई बार आती रही है। यह जंग ए जुनून मिडिया की उपज नहीं थी परन्तु उस पीढी को यह विरासत में मिली थी। दोनो देशो की जवान होती पीढीयो ने अपने बुजुर्गो की आंखो में विभाजन और दो युद्धो का दर्द देखा था। इसलिए यह जंग ए जुनून की भावना उन्हे विरासत में मिली थी। यही भावना १९८० से पहले हॉकी के मैदान में देखने को मिली और बाद में इसने क्रिकेट को अपने आगोश में ले लिया। समय ने करवट बदली । दुनिया समाजवाद की भूल भूलैया से निकलकर आर्थिक उदारीकरण के दौर में आ गई । भारत और पाकिस्तान की चौथी पीढी जवान होने लगी। उनकी आंखो में बदले की नहीं आसमान की ऊंचाइयां छुने का सपना है। अब मैच जंग नहीं मैत्री माना जाता है। अब भारत- पाक क्रिकेट मैच में जंग का नहीं खेल का आनंद लिया जाता है। २०-ट्वन्टी विश्वकप फाईनल जीतने की खुशी में पाकिस्तान को हराने का जश्न नहीं था बल्कि विश्व कप जीतने का जश्न था जबकि पाकिस्तान में भारत से हार का गम नहीं बल्कि विश्वकप हारने का गम था। अब महेन्द्र सिंह धोनी और शोएब मलिक तेल की धार नहीं देखते बल्कि क्रिकेट में आनंद का समंदर देखते है। अब क्रिकेट की लडाई आस्ट्रेलिया की ओर रूख कर चुकी है। आस्ट्रेलियाई भारतीय उपमहाद्वीप की क्रिकेट टीमों और खिलाडयों को अपमानित करने का कोई अवसर नहीं छोडते है। आस्ट्रलिया के खिलाफ मानसिक लडाई में अब भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका एक साथ खडे दिखाई देते है। अब हवा का रूख बदल चुका है। भारतीय उपमहाद्वीप की क्रिकेट ने उच्च शिखर को छु लिया है। अब यहां क्रिकेट का उत्सव मनाया जाता है जबकि आस्ट्रेलिया इस उपमहाद्वीप के खिलाडयो को अपमानित कर खीझ मिटाता है।
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