Wednesday, 13 December 2017

गेन्द मतदाता के पाले मे


नई सरकार चुनने की तारीखों की घोषणा के साथ ही गेन्द अब मतदाताओं के पाले मे आ गई है।

लेकिन दुविधा जस की तस बनी हुई है बकौल कॉग्रेंस, उनके फैसले अप्रिय हो सकते है, लेकिन देश हित के लिए ही थे और   बीजेपी द्वारा भ्रष्टाचार, साठ वर्षों तक अवरूद्ध विकास और राष्ट्रवाद के वादों के साथ मतदाताओं के रिझाने के लिए जबर्दस्त ब्रांडिंग की जा रही है। आक्राम राजनीति करने वाली आप पार्टी ने नेताओं के आचरण, भ्रष्टाचार और लोकपाल जैसे मध्यम वर्ग को आकर्षित करने वाले मृद्दों के उठाकर लोकसभा चुनाव को रोचक बना दिया है।

आम जन को अपनी सरकार चुनने के लिए पांच साल मे एक ही बार यह मौका मिलता है लेकिन किसी एक पार्टी पर सभी का विश्वास करना नामुमकिन होता है क्योंकि प्रायः सभी लोग अपने हितों, स्वार्थों, भाई भतीजा, और जात-पात की सोच से ऊपर उठ ही नती पाते है, और यहीं पर आकर राजनेताओं को मौका मिल जाता है आम जन के छोटे स्वार्थों के बीच अपने बड़े काले कारनामों के अन्जाम देने का। क्योंकि जब जनता चुनावी प्रत्याशि को जाता पात, अपने पराये की सोच के साथ वोट देता है तो क्षेत्र के अन्य लोगों के हितों पर कुठाराघात निश्चित हो जाता है और विजेता प्रतिनिधि जिसकी जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली भाषा और आचरण मे जीने लगता है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नही कही जा सकती है। इससे विकास जैसे मृद्दे तो दूर की बात सब के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, चिकित्सा और कानून व्यवस्था भी सही ढंग से पूरा नही हो पाता है।

पिछले साठ वर्षों से आज गरीबी हटाने का मूद्दा जिन्दा है जिसके ऊपर अभी तक कोई ठोस नही बनी आज भी देश के हर हिस्से मे हजारों लाखों लोग भूखे नंगे सो रहे है, बेघर है। 

काँग्रेस लम्बे समय से राज करने के बाद छाती ठोकर कर नही कह पायेगी  इन्दिरा, राजीव के गरीबी हटाऐंगें के वादों को पुरा कर चुकी है उलट इसके अब राहुल गांधी भी इसी गरीबी हटाने के वादें कर रहे है।

बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया जो कि  गुजरात के विकास मॉडल का पूरे देश मे लागू करने का दावा कर रहे है लेकिन गुजरात के किसानों  के साथ ग्रामीण संतुष्ट नही है। मुख्य रूप बड़े उद्यमियों को फायदा पंहुचाने के आरोपों से भी मोदी घिर चुके है।

राजनीति अब मुख्यतः दो चेहरों मोदी बनाम राहुल की बताई जा रही है और दोनो ही एक दूसरे छिछले आरोप के साथ बेसिर पेर की बयानबाजी के साथ मंच पर हाजिर रहते है आम जन के बीच अपनी छवि चमकाने के लिए 500-600 करोड़ रूपये के मीडिया कैंपेन के सहारे चुनावी नैया पार लगाना चाहते है। 

सत्ता मे रहते हुए राहुल की चुनावी मे होना चाहिए जैसे शब्द बोल रहे जबकि पिछले दस वषों से लगातार सभी काँग्रेसी उनके पक्ष मे माहौल बनाते नजर आ रहे थे वहीं बीजेपी जिन्होने भ्रष्टाचार, कालेधन के खुब विरोध किया उन्ही पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार अपने ही राज्य मे लोकपाल लगाने की स्थिति मे नकारात्मक छवि स्पष्ट है। 

जहां काँग्रेस की अल्पसंख्यकों की तरफ झुकती नीतियों से खफा हो रहे बहुसंख्यकों को मोदी द्वारा अपने पक्ष मे करने का मरीचिका सपना दिखा रहे है वहीं राहुल गांधी बीजेपी को मार्केटिंग और बेतुके बयान के साथ छलावे के आरोप के साथ रैलियां कर  रहे है। इसी बीच तीसरा मोर्चा भी चुनावी माहौल  मे  फिर एक बार मुखरित हो रहा है। अब जागरूक मतदाता को ही निर्णय करना होगा कि इस देश का निति निर्माता कौन हो।