यह किस्सा ५०० वर्ष पहले का हैं। मेघा ढोर चराया करता था। पशुओ के साथ मेघा कोसो तक फैले सपाट रेगिस्तान मे भोर में ही निकल लेता। मेघा दिनभर का पानी अपने साथ एक कुपडी, मिटटी की चपटी सुराही में ले जाता। शाम वापस लौटता। एक दिन कुपडी में थोडा सा पानी बच गया। मेघा को न जाने क्या सूझी कि उसने एक छोटा सा गढढा किया, उसमें कुपडी का पानी डाला और आक के पतों से अच्छी तरह ढक दिया। चराई का काम। आज यहां, कल कही ओर। मेघा दो दिन तक उस जगह पर नही जा सका और फिर वहां तीसरे दिन पहुंच पाया। उत्सुक हाथो ने आक के पते धीरे से हटाएं। गडढे में पानी तो नही था पर ठंडी हवा आई। मेघा के मुंह से शब्द निकला- ‘भाप’। मेघा ने सोचा इतनी गर्मी में थोडे से पानी की नमी बची रह सकती हैं, तो फिर यहां तालाब भी बन सकता है।
मेघा ने अकेले ही तालाब बनाना शुरू कर दिया। अब वह रोज अपने साथ कुदाल-तगाडी भी लाता। दिनभर अकेले मिटटी खोदता और पाल पर डालता। गाएं भी वही आसपास चरती रहती थी। भीम जैसी शक्ति नही थी, लेकिन भीम की शक्ति जैसा संकल्प था मेघा के पास। दो वर्ष तक वह अकेले ही लगा रहा। सपाट रेगिस्तान मे पाल का विशाल घेरा अब दूर से ही हर दिखने लगा था । पाल की खबर गांव को भी लगी।
अब रोज सुबह गांव से बच्चे और दूसरे लोग भी उसके साथ आने लगे। सब मिलकर काम करते। १२ साल हो गए थे,अब भी विशाल तालाब पर काम चल रहा था । लेकिन मेघा की उमर पूरी हो गई। पत्नी सती नही हुई और अब तो तालाब पर मेघा के बदले वह काम करने जाने लगी और फिर छह महीने में तालाब का काम पूरा हो गया। तालाब भाप के कारण शुरू हुआ था, इसलिए उस जगह का नाम भाप पडा जो बाद में बिगडकर ’बाप‘ हो गया। चरवाहे मेघा को समाज ने मेघोजी के नाम से याद रखा और तालाब की पाल पर ही इनकी सुंदर छतरी और उनकी पत्नी की स्मृति में एक देवली बना दी गई। यह जगह अब बीकानेर-जैसलमेर के रास्ते में पडने वाला छोटा से कस्बे बाप के नाम से जाना जाता है।
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