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16 May 2008
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26
Nov
आतंकवादियों ने किया देश में शांति भंग करने का एक और प्रयास 
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तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

गत् दो दशकों से निरंतर भारत आतंकवाद की चपेट में है। वैसे तो भारत में अंजाम दी जाने वाली आतंकवादी घटनाओं के प्रायः अलग-अलग स्वरूप व अलग-अलग कारण भी दिखाई देते हैं। परन्तु देश में सबसे अधिक चर्चित आतंकवाद के रूप में तथाकथित ‘इस्लामिक’ आतंकवाद अथवा ‘जेहादी’ आतंकवाद को ही देखा जा रहा है। इन आतंकवादियों द्वारा साधे जाने वाले उनके लक्ष्यों से भी यह साफ जाहिर हो जाता है कि दरअसल उनका मकसद केवल और एकमात्र यही रहता है कि किसी भी तरह भारत में अस्थिरता का वातावरण बना रहे। चारों ओर अशांति फैली रहे, पूरे देश में साम्प्रदायिकता का धुआं उठता रहे तथा साम्प्रदायिक सद्भाव की विश्वस्तरीय मिसाल पेश करने वाले इस महान देश को साम्प्रदायिक हिंसा से ग्रस्त देश के रूप में बदनाम किया जा सके।
गत् 23 नवम्बर को भारत के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश में तीन अलग-अलग शहरों में मात्र 14 मिनट के अंतराल में हुए श्रंख्लाबद्घ बम धमाके न सिर्फ आतंकवादियों की मंशा को उजागर करते हैं बल्कि इससे इनके बढते हुए हौसलों का भी बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इंडियन मुजाहिद्दीन संगठन नामक एक नए तथा पूरी तरह से अपरिचित किसी तथाकथित संगठन द्वारा भारत की एक समाचार एजेंसी को 23 नवम्बर दोपहर 1 बजकर 18 मिनट पर एक ई-मेल भेजा गया। इस ई-मेल में आतंकवादियों द्वारा जहां और तमाम साम्प्रदायिकतापूर्ण बातों व अपनी कथित समस्याओं का जिक्र किया गया था वहीं यह चेतावनी भी दी गई थी कि अगले चंद मिनटों के भीतर ही भारत में इस प्रकार के हमले होने वाले हैं। इस ई-मेल के प्राप्त होने के मात्र 5 मिनट के बाद ही फैजाबाद में एक बजकर 23 मिनट पर पहला बम विस्फोट हो भी गया। इसके पश्चात फैजाबाद, वाराणसी तथा लखनऊ में अदालत परिसरों के भीतर ही 14 मिनट के अन्तराल में 5 बडे धमाके किए गए। इन हादसों में अब तक 16 व्यक्तियों के हताहत होने का समाचार मिल चुका है जबकि लगभग 60 व्यक्ति गंभीर रूप से घायल भी हैं।
अदालत परिसरों में किए गए इन विस्फोटों के विषय में आतंकवादियों द्वारा यह बताया जा रहा है कि इन हमलों का मकसद भारत में अधिवक्ताओं के विरुद्घ अपने आक्रामक रुख को दर्शाना था। ज्ञातव्य है कि गत् 17 नवम्बर को लखनऊ में तीन खतरनाक आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया था। इन पर आरोप था कि यह आतंकवादी कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के सांसद पुत्र राहुल गांधी अथवा किसी अन्य राष्ट्रीय स्तर के नेता का अपहरण कर अपनी मांगें मनवाने की खतरनाक योजना पर काम कर रहे थे। आतंकवादियों से पूछताछ के दौरान यहां तक पता चला कि यह लोग राहुल गांधी के गले में ग्रिनेड बमों की ‘माला’ पहनाए जाने की कोशिश में थे। इन आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद जब इन्हें लखनऊ की कोर्ट परिसर में लाया गया उस समय कुछ उत्तेजित वकीलों द्वारा इन आतंकवादियों से हाथापाई की गई। कुछ वकीलों ने इन आतंकवादियों के मुकद्दमे न लडने का भी फैसला किया था।
बस, इन गिरफ्तार आतंकवादियों के साथ वकीलों की मामूली धक्कामुक्की व इनके दुर्भाग्यपूर्ण हैसलों के विरुद्घ इनका साथ न दिए जाने का वकीलों का फैसला इन आतंकवादियों के आकाओं को अच्छा नहीं लगा। परिणामस्वरूप मानवता के इन दुश्मनों ने दर्जनों घरों व परिवारों को गम, शोक तथा अंधकार के वातावरण में ढकेल दिया। मृतकों में 4 वकील शामिल हैं जिन्हें कि मुख्य रूप से निशाना बनाकर विस्फोट की यह घटनाएं अंजाम दी गई थी। सम्भवतः फ्रांस से भारत में एक न्यूज एजेंसी को भेजे गए इस ई-मेल में अपनी आतंकवादी कार्रवाई को इस्लाम से प्रेरित बताया गया है तथा इस्लाम धर्म को सबसे अच्छे धर्म के रूप में प्रदर्शित करने की कोशिश की गई है। इसमें इनके द्वारा की जाने वाली हिंसा को भी उचित ठहराया गया है तथा ऐसे हमलों का आह्वान भी किया गया है। कुल मिलाकर एक बार फिर भारत में धर्म के नाम पर साम्प्रदायिकता का जहर घोलने का जबरदस्त प्रयास इन धर्मांध सरफिरों द्वारा किया गया है।
बम विस्फोट के समय व स्थान के मध्य बनी कडी भी आश्चर्यचकित करने वाली है। पहला विस्फोट उत्तर प्रदेश राज्य के फैजाबाद नगर की अदालत परिसर में उस समय हुआ जबकि वहां विवादित राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद मामले की एक सुनवाई चल रही थी। याद रहे कि अयोध्या के इस विवादित मुद्दे ने ही देश का साम्प्रदायिक सौहार्द्र आहत कर रखा है तथा आतंकवादी भी समय-समय पर इसी मुद्दे की आड में अपनी रोटियां सेकते रहते हैं। दूसरा विस्फोट वाराणसी की अदालत परिसर में उस समय हुआ जबकि वहां 2006 में वाराणसी में हुई बम विस्फोटों के मामले पर अदालत में सुनवाई चल रही थी। इसी प्रकार लखनऊ में हुए विस्फोटों के समय उन तीन आतंकवादियों के मामले पर बहस चल रही थी जिन्हें गत् 17 नवम्बर को लखनऊ से ही गिरफ्तार किया गया था।
उपरोक्त तीनों अतिसंवेदनशील तथा अतिसंगीन अपराधों के मामलों में तीन अलग-अलग शहरों में अदालती सुनवाई का होना तथा उन तीनों ही शहरों में एक ही समय ऐसे जानलेवा विस्फोट की घटनाओं को संचालित कर इसे अंजाम तक पहुंचाना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए अत्यन्त चुनौतीपूर्ण हो गया है। इस घटना के बाद हालांकि भारतीय राजनीति में फिर वही आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरु हो गया है। राज्य व केंद्र सरकार सुरक्षा मामलों को लेकर एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने व नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार व नेताओं द्वारा भी अपने चिरपरिचित अंदाज में आतंकवादियों से निपट लेने, उनका मुंहतोड जवाब देने जैसी बातें मीडिया के समक्ष की जा रही है। परन्तु हकीकत इससे कुछ भिन्न ही है।
आतंकवादी घटनाओं का जितना दंश भारत ने दो दशकों में झेला है शायद ही किसी अन्य देश को ऐसे दयनीय हालात का सामना करना पडा हो। भारत के साम्प्रदायिक सद्भाव को आहत करने का प्रयास वास्तव में देश की आजादी के समय से ही होता आ रहा है। साम्प्रदायिकता की इस आग ने ही भारत के दो टुकडे करवा डाले। उसके बाद से लेकर अब तक इस देश में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, ट्रेन, बस, रेलवे स्टेशन, पार्क, सरकारी इमारतें, भीड भरे बाजार आदि कोई भी स्थान इन आतंकवादियों के लक्ष्य से अछूता नहीं रहा। यहां तक कि भारतीय संसद को भी इन आतंकवादियों ने अपने नापाक खून से अपवित्र कर डाला। और अब यही सिलसिला भारतीय अदालतों तथा अधिवक्ताओं को निशाना बनाने तक आ पहुंचा है। आतंकवादियों ने भारतीय पुलिस को अपना अगला निशाना बनाने का भी इरादा जाहिर किया है।
प्रश्न यह है कि आतंकवाद का यह सिलसिला क्या अनवरत यूं ही जारी रहेगा? क्या आतंकवादी भारत में शांति भंग किए जाने के अपने नापाक मंसूबों में यूं ही कामयाब होते रहेंगे? क्या आतंकवादियों के शिकार हुए बेगुनाह लोगों की लाशों पर बैठकर उनके परिजन यूं ही विलाप करते रहेंगे तथा प्रत्येक ऐसे हादसों के बाद नेताओं व सुरक्षा एजेंसियों द्वारा दिए जाने वाले बयान मात्र ही इन बेगुनाह एवं शांतिप्रिय नागरिकों को ढाढस बांधने के लिए पर्याप्त हुआ करेंगे। या फिर इन घटनाओं से छुटकारा पाने के लिए किसी कारगर उपाय की भी तलाश करनी पडेगी। निश्चित रूप से इतने विशाल आकार तथा इतनी विशाल जनसंख्या वाले भारतवर्ष में सुरक्षा की दृष्टि से न तो चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा सकती है न ही प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा की सरकार द्वारा गारंटी ली जा सकती है। परन्तु इतना तो अवश्य किया जा सकता है कि देश में सक्रिय गुप्तचर एजेंसियों को पूरी तरह से चाक चौबंद किया जाए। उन्हें आधुनिकतम सुविधाओं व साजोसामान से सुसज्जित किया जाए तथा उसके पश्चात इन गुप्तचर एजेंसियों से प्राप्त हाने वाली प्रत्येक सूचना पर बारीक नजर रखते हुए आतंकवादियों के इरादों को समय से पहले ध्वस्त करने के बाकायदा प्रयास किए जाएं।
निःसंदेह भारतीय नागरिक आतंकवादियों के नापाक इरादों का जवाब तो शांति, प्रेम व सद्भाव जैसे अहिंसक गांधीवादी हथियारों से तो दे ही देते हैं परन्तु साथ-साथ यह भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की भी जिम्मेदारी है कि वे किसी आतंकवादी घटना के घटित होने से पूर्व ही इनके इरादों को पस्त करने का समुचित व कारगर उपाय करें।

 तनवीर जाफरी - tanveerjafri1@gmail.com



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