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फिर पक्षपातपूर्ण हुई क्रिकेट अंपायरिंग

06 Jan 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

 

Nirmla Raniबावजूद इसके कि दुनिया के कुछ गिने-चुने देशों में ही क्रिकेट का खेल खेला जाता है परन्तु फिर भी यह इस समय दुनिया के सबसे आकर्षक खेलों में अपना स्थान बनाए हुए है। जिन-जिन देशों में क्रिकेट खेला व देखा जाता है वहां की जनता इसे अपनी भावनाओं तक से जोड चुकी है। इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, भारत, पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड जैसे कुछ ही देश ऐसे रहे हैं जिन्होंने काफी लम्बे समय से क्रिकेट में अपनी रुचि रखी है। धीरे-धीरे इन देशों के साथ श्रीलंका, बंगलादेश तथा जिम्बाब्वे जैसे देशों की टीमों ने भी हिस्सा लेन शुरु कर दिया। कुल मिलाकर इस समय केवल यही देश या दो तीन और देशों में क्रिकेट का खेल या तो देखा जा रहा है या इसकी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की टीम तैयार करने का कार्य हो रहा है।
  उपरोक्त देशों के मध्य सबसे रोमांचक मैच भारत, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों के मध्य इसलिए माना जाता है क्यों कि इन्हें विश्व की जुझारु क्रिकेट टीमों की नजर से देखा जाता है। क्रिकेट की लोकप्रियता इस समय इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ने आम लोगों के बीच इस हद तक बढा दी है कि क्रिकेट में होने वाली हार-जीत को आम लोगों ने अपनी व अपने देश की प्रतिष्ठा तक से जोड रखा है। ऐसे में प्रत्येक क्रिकेट प्रेमी की केवल यही इच्छा होती है कि उसके देश की टीम केवल और केवल जीत का ताज ही पहने। परन्तु यदि खिलाडी अच्छा भी खेलें और उनके हिस्से में हार भी आए तो इस दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाएगा। खेल की भाषा में इसे ‘पार्ट ऑफ द गेम’ अथवा खेल का ही एक अंग का नाम दिया गया है। ऐसा लगता है कि दुनिया के कुछ क्रिकेट अंपायरों ने अकेले ही खेल की इस सूक्ति का लाभ उठाने का ठेका ले रखा है।
  आधुनिक कैमरा तकनीक के आने से पूर्व तो बेशक क्रिकेट अंपायरों के मनमाने फैसलों पर पर्दा पड जाता था परन्तु अब तो क्रिकेट के खेल के दौरान घटे किसी भी क्षण को बाआसानी अनेकों बार पूरी सूक्ष्मता से देखा व समझा जा सकता है। इसे हम टेलीविजन की भाषा में ‘एक्शन रीप्ले’ के नाम से जानते हैं। आखिर इतनी आधुनिक वैज्ञानिक व्यवस्था उपलब्ध होने के बावजूद गलत फैसलों की स्वीकार्यता के मायने ही क्या रह जाते हैं?
  गत् दिनों ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में भारत व ऑस्ट्रेलिया के मध्य क्रिकेट टेस्ट मैच खेला गया। हालांकि आधिकारिक रूप से ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच में 122 रनों से अपनी जीत दर्ज कराई। परन्तु यह मैच गलत अंपायरिंग को लेकर अत्यन्त विवादित रहा। जैसा कि टी वी पर होने वाले प्रसारणों में साफ देखा गया कि किस प्रकार क्रिकेट अंपायरों द्वारा ऑस्ट्रेलिया के आऊट हुए खिलाडियों को नॉट आऊट घोषित किया गया। जबकि ठीक इसके विपरीत भारत के नॉट आऊट खिलाडियों को उन्हीं अंपायरों द्वारा गलत तरीके से आऊट घोषित कर दिया गया। आरोप यहां तक मुखरित हुए कि ऑस्ट्रेलिया में अंपायरिंग कर रहे अंपायर स्टीव बकनर तथा उसके साथी अंपायर को भी ऑस्ट्रेलियाई टीम के खिलाडियों के साथ ही गिना गया। गलत अंपायरिंग के कारण उत्तेजित लोग यह कहते दिखाई दिए कि ऑस्ट्रेलियाई टीम 11 नहीं बल्कि 13 खिलाडियों के साथ खेल रही थी। जाहिर है क्रिकेट प्रेमियों द्वारा टेलीविजन के ऊपर स्पष्ट रूप से अंपायरों द्वारा दिए जाने वाले गलत फैसले को देखने के बाद उसे कैसे सहन किया जा सकता है।  क्रिकेट में गलत अंपायरिंग का आरोप लगना कोई नई बात नहीं है। इस खेल में अक्सर अंपायरों पर उंगली उठते देखा जा सकता है। परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारत विशेषकर अंपायरों द्वारा लिए जाने वाले दुर्भावनापूर्ण फैसलों का अक्सर शिकार होता रहा है। ऑस्ट्रेलिया में पिछले दिनों घटी घटना भी उसी दुर्भाग्यपूर्ण फैसले का एक बडा व जीता जागता उदाहरण है। इस बार भी भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड (बी सी सी आई) सिडनी में भारत की टीम के विरुद्घ अंपायरों द्वारा लिए गए गलत फैसलों की कठोर शिकायत करने जा रहा है। ऐसी शिकायतें पहले भी अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट संघ (आई सी सी) को मिलती रही हैं। परन्तु उसका स्थाई समाधान जाहिर है अब तक नहीं निकल सका। यही वजह है कि बेईमान अंपायरों के हौसले बुलन्द हैं तथा कैमरे की आंखों को धत्ता बताते हुए स्टीव बकनर जैसे बेईमान अंपायर अपने मनमाने फैसले देते जा रहे हैं। इनके फैसले न सिर्फ खिलाडियों के खेल कैरियर को नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि प्रभावित टीम के देशवासियों की भावनाओं को भी बुरी तरह आहत करते हैं। और इस व्यवस्था से जुडे तथा प्रायः उत्पन्न होने वाली ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों को आसानी से पचा पाने की क्षमता रखने वाले विश्ा*ेषक इसे ‘पार्ट ऑफ द गेम’ कहकर पचा जाते हैं।
  मेरे विचार से इस समस्या का स्थायी समाधान अब निकाल लिया जाना चाहिए। क्रिकेट पंडितों का मानना है कि क्रिकेट के दो अंपायर क्रिकेट के मैदान में खडे होकर अपनी निर्णयकारी भूमिका को निभाते हैं। इससे क्रिकेट की वास्तविकता, मौलिकता तथा इसकी शान बनी रहती है। उधर क्रिकेट में आधुनिकता के घालमेल के पक्षधर यह दलील देते हैं कि अब बिना अंपायरों के मैदान में खडे हुए भी केवल कैमरों की मदद से पूरे खेल पर नजर रखी जा सकती है। इन हालात में जरा सी भी गल्ती की उम्मीद नहीं की जा सकती। उपरोक्त दोनों ही तर्क अपने आप में सही व सराहनीय है। हर खेल की अपनी एक मौलिकता, प्राचीनता व शान होती है। उन्हें भी बरकरार रखा जाना चाहिए। परन्तु यदि हमारे किसी संदेह अथवा हमारी किसी गल्ती का समाधान विज्ञान अथवा आधुनिक तकनीक करने में समर्थ है तो आखिर उसका सहारा लेने में हर्ज भी क्या है। अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट संघ (आई सी सी) को ऐसे नियम बनाने चाहिए ताकि क्रिकेट की मौलिकता भी बनी रहे तथा किसी भी खिलाडी के साथ अन्याय भी न होने पाए। इसमें अंपायरों को भी यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि गल्ती चूंकि किसी भी व्यक्ति से हो सकती है, अतः किसी अंपायर का गलत निर्णय दे डालना कोई अस्वाभाविक घटना नहीं है। लिहाजा यदि कैमरे के निर्णय को अन्तिम निर्णय के रूप में आई सी सी स्वीकार्यता प्रदान कर देती है, ऐसे में अंपायरों को इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्ा* कतई नहीं समझना चाहिए।
  क्रिकेट के मैदान में अंपायर द्वारा एक उंगली उठाए जाने का अर्थ आऊट होना होता है। इस प्रकार अंपायर की उठने वाली उंगलियां कभी कभार ही संदेह अथवा पक्षपात की नजरों से देखी जाती है। अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट संघ (आई सी सी) को चाहिए कि अंपायर द्वारा दिए गए वे फैसले जो दोनों ही पक्षों को मान्य हों अर्थात् स्पष्ट रूप से वह सही फैसला हो उसे तो स्वीकार किया जाए और यदि अंपायर के किसी भी निर्णय में आऊट होने वाला खिलाडी अथवा इसके विशेषज्ञ संदेह खडा करते हैं तो ऐसे खिलाडी को तकनीकी संतुष्टि के पश्चात ही आऊट स्वीकार किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया को हालांकि बहुत तेजी से निपटाने की व्यवस्था होनी चाहिए उसके बावजूद इसमें लगने वाले समय को खेल के समय में अलग से जोड लिया जाना चाहिए।
  यदि उपरोक्त नियम अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट संघ द्वारा बना दिए गए तो अंपायरों द्वारा की जाने वाली मनमानी पर भी रोक लग सकेगी तथा भारत जैसे अन्य दुर्भाग्यशाली देशों की क्रिकेट टीमें अंपायरों का कोपभाजन बनने से बच सकेंगी।

Nirmal Rani: 098962-93341


Comments to this Article
Nirmal ji ka sujhaw bahut theek likha hai.aaisa hi hona chaahiye.Jab aadhunik suvidhaayen mojood hain phir sirf umpire par depend rahne ki zaroorat hi kya hai. Nirmal ji kaa sujhaav sab se achchha hai., Des Raj (2008-01-07 21:01:43)

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