Sunday, 01 November 2020

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दलित नेतृत्व बनाम दलित समाज


Writer - Nirmal Rani


बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर भारतीय राजनीति के उस शिखर पुरुष का नाम है जिन्हें देश का प्रत्येक वर्ग व समाज आदर, श्रद्घा तथा सम्मान की नजर से देखता है। बावजूद इसके कि वे स्वयं एक दलित परिवार में जन्मे तथा जीवन के अन्तिम समय में बाबासाहब ने अपने लाखों समर्थकों व अनुयाईयों के साथ बौद्घ धर्म स्वीकार कर लिया था। फिर भी उनकी काबिलियत, योग्यता तथा देश व राजनीति के प्रति की गई उनकी कुर्बानियों ने उन्हें उस स्थान तक पहुंचा दिया था कि भारतीय समाज उन्हें किसी वर्ग विशेष का नेतृत्व करने वाले नेता के रूप में सीमित नहीं रख सका।
  अब लगता है समय काफी कुछ बदल चुका है। आज का दलित नेतृत्व बाबासाहब अम्बेडकर से अपनी तुलना तो करना चाहता है परन्तु उन जैसा आदर्श नहीं स्थापित करना चाहता। वर्तमान दलित नेतृत्व, बातें तो दलित समाज के हितों की करता है परन्तु उसका ध्यान अपने, अपने परिवार के व अपने आसपास के लोगों को लाभ पहुंचाने तक ही केंद्रित रहता है। जब तक बाबू जगजीवन राम को उत्तर भारत के दलितों का नेता माना जाता रहा, उस समय तक तो दलित राजनीति में गांधीवाद तथा सादगी के दर्शन हो भी जाया करते थे। परन्तु जब से राम विलास पासवान, कांशीराम व मायावती जैसे आधुनिक सोच रखने वाले नेताओं ने दलित राजनीति को नेतृत्व प्रदान करने का जिम्मा उठाया तब से तो दलित नेतृत्व में, उसके रहन सहन, जीवनशैली, नेतृत्व प्रदान करने की निराली सोच, शानो-शौकत आदि में क्रांतिकारी परिवर्तन देखा जाने लगा। ऐसा नहीं है कि उच्चस्तरीय रहन सहन उनका अधिकार नहीं है या उनकी इस उच्चस्तरीय जीवनशैली से भारतीय समाज के किसी वर्ग को ईर्ष्या है। कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति तो राजनेताओं के मनोरंजन एवं भोगविलास का एक उपयुक्त माध्यम मात्र ही बनकर रह गया है। कम ही नेता इस समय देश में ऐसे होंगे जिन्होंने राजनीति में कुछ गंवाया ही होगा, कमाया नहीं। भारत के प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित होने वाले लगभग आज तक के सभी नेताओं को इसी श्रेणी में डाला जा सकता है।
  वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को ही ले लें। देश व दुनिया के उच्चतम पदों पर आसीन रह चुके होने के बावजूद इस व्यक्ति के पास उस दिन भी मात्र मारुति 800 कार ही थी जिस दिन कि उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने हेतु बुलाया गया था। भारत के प्रधानमंत्री के पद पर बैठने वाले लोग भी यदि चाहते तो शेर की खाल को अपना आसन या अपने ड्राइंग रूप की शोभा बढाने के साधन के रूप में प्रयोग कर सकते थे। यह भी चाहते तो अपना रहन-सहन व जीवनशैली को राजशाही शैली की भांति शानो-शौकत से परिपूर्ण बना सकते थे। परन्तु इन्होंने ऐसा नहीं किया। इन सभी नेताओं ने सादगीपूर्ण जीवन गुजारकर यह प्रमाणित किया कि वे एक ऐसे बडे राष्ट्र के प्रमुख हैं जहां की अधिकांश आबादी गरीबी रेखा से नीचे बसर करती है।
  परन्तु भारत के दो प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश व बिहार में मायावती तथा राम विलास पासवान जैसे दो ऐसे नेता देखे जा सकते हैं जोकि अपनी राजनीति तो दलितों के नाम पर करते हैं परन्तु दलितों के उत्थान, विकास अथवा उनके रहन-सहन को ऊंचा उठाने से अधिक इनका ध्यान अपने जीवन स्तर को तथा अपने रहन-सहन की शैली को ऊंचा करने में केंद्रित रहता है। कुछ वर्ष पूर्व तक राम विलास पासवान का ड्राइंग रूप अन्य सभी केंद्रीय नेताओं में सबसे आलीशान हुआ करता था। उनके इस शाही वैभव के प्रदर्शन के विषय में जब उनसे पूछ गया तो उन्होंने प्रश्ा* के जवाब में प्रश्ा* ही किया था कि क्या दलित नेता को अपना रहन-सहन ऊंचा रखने का अधिकार नहीं है। यहीं पर बात गांधीजी के विचारों की आती है। वे तीसरे दर्जे के रेल के डिब्बे में यात्रा क्यों करते थे। सिर्फ इसलिए ताकि वे साधारण डिब्बे की यात्रा के द्वारा साधारण भारतीयों के सम्फ में आ सकें तथा उन साधारण रेल यात्रियों के दुःख-सुख को करीब से देख व समझ सकें। किस घटना ने गांधी को अपना शानो-शौकत से भारा जीवन त्यागने तथा तन पर मात्र एक धोती लपेटने हेतु प्रेरित किया था यह भी सभी जानते हैं।
  फिर आखिर वर्तमान शाही दलित नेतृत्व उस समाज को अपने उच्चकोटि के रहन सहन से क्या संदेश देना चाहता है। यदि यह कि दलित समाज इसी शाही ठाठ-बाठ का अनुसरण करे, फिर तो यह बहुत अच्छी सोच है। परन्तु करे तो कैसे करे। यह तो जीवन स्तर के ऊपर उठने से ही सम्भव है। और जब जीवन स्तर सुधारने की बात हो तो समाज का धनवान होना भी जरूरी है। इसके लिए आवश्यकता है ऊंची शिक्षा, स्व रोजगार तथा स्वावलम्बन की। अब प्रश्ा* यह है कि इसके लिए मायावती व राम विलास पासवान जैसे दलित नेताओं ने सम्पूर्ण दलित समाज को स्वावलम्बी बनाने हेतु अब तक किया ही क्या है? क्या बिहार व उत्तर प्रदेश में दलितों पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी आई है? देश में दलितों पर होने वाले हमले, दलित महिलाओं के साथ होने वाली अभद्र घटनाएं, दलितों का शोषण व  उत्पीडन आज भी इस देश की आमतौर पर घटने वाली घटनाएं हैं। वर्तमान दलित नेतृत्व इनको समाप्त करने की दिशा में आखिर क्या कर रहा है?
   आईए हम बताते हैं कि क्या कर रहा है। पूरे दो दशकों तक कांशीराम व मायावती ने दलित समाज को ‘मनुवादियों’ के विरुद्घ जमकर उकसाया। उन्हें अभूतपूर्व तरीके से लामबन्द किया। आज स्थिति यह है कि बहुजन समाज पार्टी भारतीय इतिहास की दलितों के नाम पर गठित होने वाली सबसे बडी व पहली राजनैतिक पार्टी है। इसी फार्मूले के साथ मायावती ने उत्तर प्रदेश में इतनी मजबूती हासिल की कि वे तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर अन्य दलों के समर्थन से पहुंची। दलितों को संगठित कर तीन बार गठबंधन सरकार के रूप में सत्ता में आने पर मायावती को यह एहसास हो गया कि दलित समाज, बहुजन समाज पार्टी के झंडे तले कितना ही संगठित क्यों न हो ले परन्तु बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत में ला पाना अकेले इस समाज के वश की बात नहीं है। बस इसी सोच ने मायावती को मनुवादियों के विरुद्घ जहर उगलने से रोक दिया। बहुजन समाज के बजाए सर्वजन समाज के नारे लगने लगे। मनुवादियों ने भी मायावती को क्षमा करने में ही अपनी भी भलाई समझी। तिलक, तराजू और तलवार जिसका अर्थ ब्राह्मण, वैश्य तथा क्षत्रीय समाज से लिया जाता था तथा अभद्र नारों का प्रयोग कर इन समुदायों को कोसने का अफसोसनाक काम किया जाता था। उसे यू टर्न देते हुए ‘सर्वजन समाज’ की इस मसीहा ने अब नया नारा दिया, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है।’ मायावती के इस नए नारे की ‘कद्र’ करते हुए या यूं कहें कि मायावती को क्षमा करने में ही अपनी भलाई समझते हुए या फिर सत्ता में भागीदारी की लालसा ने उत्तर पद्रेश के ब्राह्मण समाज को बहुजन समाज पार्टी के साथ जोडकर आखिरकार मायावती को चौथी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना ही दिया। इस बार मायावती किसी गठबंधन सरकार की नहीं बल्कि बहुजन समाज की पूर्ण बहुमत वाली सरकार की मुख्यमंत्री बनी हैं। क्या यह सही नहीं कि पूर्ण बहुमत में आने की उनकी आकांक्षा ने उन्हें ब्राह्मण समाज के साथ जुडने को मजबूर कर दिया? और यदि ऐसा करना ही था तो देश के दलित समाज के दिलों में ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा राजपूतों के प्रति नफरत पैदा करने वाले नारे लगवाने की उन्होंने जरूरत ही क्यों महसूस की थी।
  मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जहां उन्होंने चार बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का एक कीर्तिमान स्थापित किया है, वहीं चमत्कारिक रूप से उन्होंने इस वर्ष 15 करोड रुपए के अग्रिम आयकर का भुगतान कर यह भी साबित कर दिया है कि वे उत्तर प्रदेश की सबसे शक्तिशाली नेता मात्र ही नहीं बल्कि वह देश की सबसे धनवान नेत्री भी हैं। मायावती की वार्षिक आया 60 करोड रुपए दर्शाई गई है। मायावती को राजनैतिक बिसात बिछाने में जहां महारत हासिल है वहीं धन संग्रह के तरीके भी उनसे बेहतर शायद ही कुछ नेता जानते हों। मैडम ने पहले स्वयं को दलित समाज में दलित नेत्री के रूप में स्थापित किया। अपनी आक्रामक भाषणशैली के द्वारा उनके दिलों में सम्मानजनक स्थान बनाया। और फिर स्वयं को जिंदा देवी के रूप में पूजने का भी आह्वान किया। उन्होंने अपने अनुयाईयों को यह भी कहा कि वे मंदिरों में जाकर पैसे चढाना बंद करें। मैं जिंदा देवी हूं, जो कुछ चढाना है वे मुझपर चढाएं। कभी आपने कल्पना भी की है कि बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर जैसा महान नेता भी इस स्तर की राजनीति या ऐसे आह्वान कर सकता था? बात यहीं तक खत्म हो जाती तो भी गनीमत थी। अब तो खुलेआम मायावती जी अपने जन्मदिन के बहाने भारी धन संग्रह किया करती हैं। सोने-चांदी, हीरे आदि के आभूषण तथा नकदी सब कुछ उनके जन्मदिन पर सौगात के रूप में आती है। धन संग्रह तथा इसके द्वारा अर्जित सम्पत्ति का तो अब मायावती को खौफ भी सताने लगा है। पिछले दिनों दिए गए उन्हीं के बयान से यह पता चलता है कि उन्हें इस बात की शंका है कि आय से अधिक संपत्ति के लंबित पडे एक मामले में उन्हें जेल भी भेजा जा सकता है। गोया दलित नेतृत्व के भोग विलास व ऐशो आराम का पैमाना इतना लबरेज हो चुका है कि वह अब सम्भवतः छलकने ही वाला है। अफसोस कि इस इन्तेहा तक पहुंचने के बाद भी बहन मायावती स्वयं को बाबासाहब अम्बेडकर के समतुल्य कहने से बाज नहीं आतीं।
  उपरोक्त पूरे घटनाक्रम में यदि कोई ठगा हुआ सा नजर आता है तो वह है देश का वही दलित समाज जिसके कंधों पर कदम रखते हुए मायावती ने स्वयं को न सिर्फ चौथी बार उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बडे राज्य के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाने का कीर्तिमान बना दिया बल्कि इसी के माध्यम से वे देश की सबसे बडी आयकर देने वाली नेत्री भी बन बैठीं। अगर सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा तो अभी मायावती के मुंह से एक और आवाज निकलने वाली है कि दलित को देश का प्रधानमंत्री बनाओ। और यदि किसी भी दल ने उनके प्रधानमंत्री बनने का किसी भी कारणवश विरोध किया तो उसपर भी ‘मनुवादी’ अथवा दलित विरोधी होने का लेबल लगा दिया जाएगा।
  समय चक्र यूं ही चलता रहेगा। दलित समाज की ही तरह अन्य समाजों में भी बिरादरी, वर्ग, क्षेत्र तथा जाति आदि की राजनीति करने वाले लोग स्वयं तो यूं ही ऐश करते रहेंगे तथा अपने राजनैतिक लाभ के निहितार्थ समाज के निमित्त यह फैसले करते रहेंगे कि कब किसे गाली देनी है तथा कब किसके गले में हाथ डालना है। इसी प्रकार नेताओं का अपना जीवन तो पूरी ऐश व सुरक्षा के साथ गुजरता रहेगा जबकि सम्बद्घ समाज यूं ही टकटकी लगाए यथापूर्व स्थिति इस राजनैतिक तमाशे को केवल देखता ही रह जाएगा।  Nirmal Rani , Ambala City 134002, Haryana
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