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Oct
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन : पगडंडी का सच
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Vibha Bansalगुटनिरपेक्षता का उद्भव अन्तर राष्ट्रीय समाज की यथार्थताओं से हुआ है। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात गुटीय राजनीति से स्वयं को दुर रखने के लिए एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के स्वतन्त्र राज्यों ने गुटनिरपेक्षता की नीति का अनुसरण करना उचित समझा जिसका मुख्य उद्देश्य साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद,
शोषण, रंगभेद और जातिभेद को दुर कर विकसित और विकासशील देशों की भिन्नता को दुर करना था। गुटनिरपेक्षता की नीति शक्ति गुटों से अलग रहने और शांतिपुर्ण सहअस्तित्व की स्वतंत्र नीति हैं। जो राष्ट्रों के मध्य सहयोग पर आधारित हैं। प्रतिद्वन्द्विता पर नहीं। यह एक आन्दोलन है जो विश्व में सुरक्षा और शांति के लिए निरन्तर गतिशील हैं। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन प्रति  तीसरे वर्ष अन्तर
राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श करने के योजनाएं निर्धारित करने के लिए सदस्य देशों का शिखर सम्मेलन आयोजित करता है जिसमें निर्णय बिना मतदान सर्व सम्मति से होते है। अब तक १४ शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। पहला शिखर
सम्मेलन यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में १ से ६ सितम्बर १९६१ में हुआ था जिसमें २५ देशों के शासनाध्यक्षों ने भाग लिया। सम्मेलन के अन्त में नि:रस्त्रीकरण करने, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक पिछडेपन को दूर करने, घरेलू मामलों में विदेशी हस्तक्षेप और रंगभेद की निन्दा तथा विश्व शांति और सह-अस्तित्व की अवधारणा के विकास की घोषणाएं की गई। तब से अब तक आन्दोलन निरन्तर अन्तरराष्ट्रीय समस्यों के निदान में प्रभावशाली भूमिका निभाता आ रहा है।
आज इसके सदस्यों की संख्या २५ से बढ्कर ११६ तक पहुँच चुकी है। १९५०-६० में इसने स्वाधीनता का नारा दिया। १९७०-७४ में इसने आर्थिक सहयोग और नवीन अन्तरराष्ट्रीय अर्थवयस्था की स्थापना के प्रयास किए। तत्पश्चात् संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन तथा लोकतंत्रीकरण का अभियान चलाया, कार्टागेना (१९९५) सम्मेलन में आर्थिक मुद्दों पर विशेष बल दिया, विकसित और विकासशील देशों के बीच संवाद स्थापित करना आवश्यक समझा। अंकयड(सं रा व्यापार एवं विकास सम्मेलन) एवं यूनिडा (संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन) को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना गया, कुआलालम्पुर सम्मेलन (२००३) में इराक के विरुद्ध अमेरिका सहित संयुक्त राष्ट्र सेनाओं की कार्यवाही की निन्दा की गई तथा विवादो को सुलझाने के लिए युद्ध का सहारा न लेने का आह्वान किया गया। सदस्य देशों से आतंककारी गुटों व संगठनों के आर्थिक और कार्यकारी तंत्र को ध्वस्त करने की अपील की गई। संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने तथा बहुध्रुवीय विश्व को बढावा देने का संकल्प व्यक्त किया गया। हवाना निर्गुट सम्मेलन (सितम्बर २००६) में
आतंकवाद का सामना कठोरता से करने का संकल्प किया गया है। तालिबान और अन्य आतंककारी गुटों के एक साथ सक्रीय रहने पर आंदोलन के राष्ट्रों ने चिन्ता व्यक्त की है। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को अपने जन्म के साथ ही अनेक बाधाओं का सामना करना पडा है। सबसे बडी रुकावट अमेरिका और सोवियत संघ
महाशक्तियों के रुप में रहे है। इनका प्रयास गुटनिरपेक्ष राज्यों को विघटित करने का रहा है। अमेरीका द्वारा दक्षिणी अमेरीकी राज्यों पर निरन्तर दबाव बनाया गया है। अमेरीका निकारागुआ को गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन आयोजित करने से रोकने में सफल रहा भारत-पाकिस्तान को एक दूसरे के विरुद्ध भडकाना, नेपाल को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए उकसाना, पाकिस्तान को सैनिक और आर्थिक सहायता,हिन्द महासागर में नौसैनिक अड्डों की स्थापना, इराक में सैनिक हस्तक्षेप द्वारा
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को शिथिल करने में सक्षम रहा हैं। गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों की आर्थिक दशा ने आन्दोलन की राह में बाधा उत्पन्न की है। कमजोर आर्थिक दशा ने गुटनिरपेक्ष राज्यों को नवीन उपनिवेशवाद के अधीन कर दिया है। नई आर्थिक विश्व व्यवस्था तथा विश्व व्यापार संगठन के होते हुए भी अमेरीका संरक्षणात्मक तथा प्रतिबन्धात्मक व्यापार नीति अपनाता है। विश्व बैंक में अमेरीका का बीस प्रतिशत हिस्सा है गुटनिरपेक्ष देश अर्थ के लिए अमेरीका पर
निर्भर हैं इन देशों में निवेश, तकनीक हस्तान्तरण के नाम पर अमेरीका आर्थिक
शोषण करता है। परमाणु अप्रसार और पूर्ण निरस्त्रीकरण किए नाम पर सामरिक अस्त्र परिसीमन सन्धि जैसी भेदभाव पूर्ण सन्धि हस्ताक्षर करवाने में सफल रहा हैं। भारत के मना करने के बावजूद हस्ताक्षर कराने के लिए निरन्तर दबाव बनाये हुए है। कृषि के क्षेत्र में पैटेन्ट अधिकार लागू होने से इन देशों को विकसित देशों से कृषि सम्बन्धी तकनीक खरीदने के लिए भारी मूल्य चुकाना पड्ता है। मावाधिकार, पर्यावरण, श्रम मानकों के सम्बन्ध में नयी शर्ते थोपने की
धमकी जारी है। मार्च २००३ में इराक पर अमेरीकी हमला पश्चिमी तेल पर एकाधिकार करने का ही प्रयास है। अब गुटनिरपेक्ष राज्य ईरान की बारी है। महाशक्तियों की गुप्तचर एजेन्सियां गुटनिरपेक्ष में अस्थिरता उत्पन्न करने का प्रयास करती है। क्यूबा में फिदेल कास्त्रो सरकार को पदच्युत करने की कोशिश रही। भारत में नागा, भिजो विद्रोहियों तथा खालिस्तानियों की गति विधियों को बढावा
दिया, चिली के राष्ट्रपति की हत्या करवायी। स्वयं गुटनिरपेक्ष देशों का पारस्परिक तनाव आन्दोलन की सफलता आन्दोलन की सफलता में सबसे बडा बाधक है। कोलम्बो (१९७६) सम्मेलन में बंगलादेश ने भारत के साथ गंगा के पानी के
बंटवारे के प्रश्न को शिखर सम्मेलन में उठाने का प्रयास किया, १९७९ का हवाना शिखर सम्मेलन मिश्र के निष्कासन और कम्बुजिया के प्रश्न पर विभाजित था, जकार्ता (१९९२) शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान ने कश्मीर को मसला बनाया, इसके अतिरिक्त ईरान-इराक विवाद, तैल उत्पादक देशों द्वारा गैर तैल उत्पादक देशों का शोषण गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के विभाजन के प्रतीक है। अगस्त १९९६ में सी टी बी टी प्रारुप पर भारत का साथ देने वाला एक भी राष्ट्र नहीं था, अर्जेंटीना, ब्राजील और मिश्र ने अमेरीका और पश्चिमी देशों का साथ दिया। इन बाधाओं और दबावों के मध्य भी गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्राप्तियां कम नहीं हैं। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के निरन्तर बढते देश इस बात का प्रमाण है कि यह विश्व जनमत की प्रबल अभिव्यक्ति हैं। एशिया अफ्रीका के देशों और प्रशान्त महासागर, कैरेबियन सागर, हिन्दमहासागर के द्विपों का आन्दोलन सम्मिलित होना आन्दोलन की सफलता क सूचक है। १९५५ के बांडुग सम्मेलन में नेहरु, नासिर, टीटो तथा चाउ-एन-लाई द्वारा गुटनिरपेक्षता के संगठित समर्थन ने विश्व के पराधीन राष्ट्रों की स्वतंत्रता की आवाज उठाने का मंच प्रदान किया तथा एशिया, अफ्रीका के राष्ट्र एक-एक करके स्वतंत्र होने लगे। साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, रंगभेद, बाहरी हस्तक्षेप, अन्याय और शोषण से मुक्ति दिलाना इसकी प्रमुख उपलब्धि हैं। गुटनिरपेक्ष आन्दोलन द्वारा नई अन्तर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को अपनाया गया।
१९८६ के हराई सम्मेलन में अफ्रीकी कोष की स्थापना की गई। विकसित और विकासशील
देशों के मध्य संवाद को आवश्यकता समझा गया है। इसमें सफलता न् मिलने पर दक्षिण-दक्षिण संवाद की ओर प्रयास किये गये हैं। आज विकसित राज्य गुटनिरपेक्ष देशों की आवाज को अनुसुना नहीं कर पाते। विकसित देशों द्वारा एक पक्षीय तरीके से श्रम मानकों को विदेशी व्यापार के साथ जोडने के प्रयासों का गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने विरोध किया हैं। आन्दोलन ने विश्व का ध्यान पर्यावरण संरक्षण की ओर किया हैं। ओजोन परत, परमाणु छीजन, बडे पैमाने पर वनों के कटाव के
कारण मिट्टी के कटाव की समस्या की ओर ध्यान दिया गया हैं।  गुटनिरपेक्ष देशों की बढती हुई संख्या ने सुरक्षा परिषद् की भूमिका को कम करके महासभा के महत्व को बढाया हैं। संघर्ष के क्षेत्रों में तनाव करने में सहायता की है कोरिया, इण्डो चीन, स्वेज समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास किये तथा शान्ति सेनाएं भेजी। हवाना, सम्मेलन २००६ में इरान के परमाणु कार्यक्रम को महाशक्ति अमेरीका तक पहुँचाया हैं। संक्षेप में जिस मनोवैज्ञानिक विवशता में नवोदित राष्ट्रो ने गुटनिरपेक्षता को अपनाय था की वे महाशक्तियों की विचारधारागत बद्धता से स्वतंत्र होकर अपनी नीति निर्धारित कर सकें उस प्रतिष्ठा को कुछ हद तक प्राप्त कर विश्व समाज में एक नवीन सम्मान संतुलन स्थापित करने में सक्षम हो सके हैं। हवाना सम्मेलन में सदस्य देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि  परमाणु उर्जा का शांतिपूर्ण प्रयोग के लिए उत्पादन उनका मूल अधिकार हैं। आवश्यकता है कि आतंकवाद का सामना करने तथा अपनी
अर्थव्यवस्था के विकास के लिए गुटनिरपेक्ष राष्ट्र एक दृष्टिकोण अपनायें तो आन्दोलन सार्थक सिद्ध हो सकता है।

 

श्रीमती विभा बंसल
बी जे एस रामपुरिया जैन महाविद्यालय
बीकनेर




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