पाकिस्तान में हो रहे राजनैतिक विरोध तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रही आलोचनाओं के मध्य वहां आपातकाल का दौर जारी है। बावजूद इसके कि आम जनजीवन सामान्य नजर आ रहा है। बाजार, दुकानें, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सरकारी कार्यालय सभी रोजमर्रा की तरह खुल रहे हैं तथा अपने कर्तव्यों का निर्वाहन कर रहे हैं। परन्तु इसके बावजूद राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ तथा उनके द्वारा 3 नवम्बर को पाकिस्तान में घोषित किए गए आपातकाल का विरोध करने वालों की गिरफ्तारियों अथवा उन्हें नजरबन्द किए जाने का सिलसिला जारी है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी नजरबंद हैं। बेगम बेनजीर भुट्टो को भी पुनः नजरबंद कर दिया गया है। पाकिस्तान उच्चतम न्यायालय के एकमात्र अल्पसंख्यक न्यायाधीश जस्टिस भगवान दास को भी इस वर्ष नजरबंदी में रहते हुए दीपावली जैसा पावन पर्व तन्हाई में ही मनाना पडा। उनका कुसूर यह था कि उन्होंने इस अस्थाई संवैधानिक आदेश के तहत शपथ लेने से इन्कार कर दिया था। इस अस्थाई संवैधानिक आदेश की व्यवस्था पाक संविधान को भंग करने के बाद राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा की गई थी। इसके अतिरिक्त प्रसिद्घ मानवाधिकार कार्यकर्ता असमां जहांगीर सहित अनेकों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, कई राजनैतिक दलों के अनेकों नेताओं व कई गैर सरकारी संगठनों के प्रमुखों अथवा कार्यकर्ताओं को आपातकाल के विरुद्घ आवाज उठाने के परिणामस्वरूप या तो जेल भिजवा दिया गया है अथवा उन्हें नजरबंद रखा गया है।
हां, पाकिस्तान की जनता आम जनजीवन सामान्य होने के बावजूद निजी मीडिया नेटवर्क पर लगी पाबंदी से अवश्य दुःखी व नाराज है। लाखों लोग अपने पसंदीदा स्थानीय टी वी चैनल के प्रसारण को नहीं देख पा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान में डिश एंटीना की बिक्री बहुत अधिक बढ गई है। पिछले दिनों लंदन से प्रकाशित होने वाले द टेलीग्राफ के दो ब्रिटिश पत्रकारों को भी पाकिस्तान छोडकर जाने का आदेश दिया गया है। उनपर आरोप है कि उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग में जनरल मुशर्रफ की हुकूमत व उनकी कार्यप्रणाली की आलोचना की है। पाकिस्तान में आपातकाल की घोषणा करते समय राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा यह बताया गया था कि इस्लामिक आतंकवाद अपने चरम पर पहुंच चुका है तथा पाकिस्तान के लिए यह एक बडा खतरा महसूस होने लगा है। इसके अतिरिक्त न्यायपालिका का प्रशासन में हस्तक्षेप करना भी आपातकाल लगाए जाने के कारणों में एक प्रमुख कारण बताया गया था।
उपरोक्त हालात से राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ को अब तक कितनी राहत मिली और कितनी नहीं यह तो आपातकाल की समाप्ति के बाद ही पता लग सकेगा। परन्तु पाकिस्तान के एटॉर्नी जनरल मालिक कय्यूम के अनुसार मुशर्रफ एक माह के भीतर ही आपातकाल की समाप्ति की घोषणा कर सकते हैं। आपातकाल की घोषणा के समय सरकार ने अपनी यह नीति स्पष्ट की थी कि जब तक पाकिस्तान में हालात सुधर नहीं जाते तब तक आपातकाल जारी रहेगा। परन्तु एटॉर्नी जनरल मलिक कय्यूम के अनुसार स्थिति में सुधार हो रहा है तथा सरकार एक माह के भीतर इस आपातकाल स्थिति को समाप्त किए जाने की घोषणा कर सकती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भी पिछले दिनों मुशर्रफ से फोन पर 2॰ मिनट लम्बी अपनी बातचीत में उन्हें यही समझाने का प्रयास किया कि वे अपनी फौजी वर्दी से बाहर निकलें तथा पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार जनवरी ॰8 में चुनाव कराए जाने की व्यवस्था करें। मुशर्रफ पर जार्ज बुश सहित तमाम अन्तर्राष्ट्रीय व स्थानीय दबाव व आलोचनाओं का असर यह हुआ है कि मुशर्रफ ने 9 जनवरी तक चुनाव कराने की घोषणा कर दी है। यदि मुशर्रफ की मानें तो वे किसी ऐसी तिथि की तलाश में हैं जबकि राष्ट्रीय असेम्बली के साथ-साथ चार प्रान्तीय असेम्बली के चुनाव भी कराए जा सकें।
प्रश्ा* यह है कि 9 जनवरी तक चुनाव कराए जाने के मुशर्रफ के वादे के बाद अब पाकिस्तान में जारी आपातकाल की सम्भावनाओं एवं इसके भविष्य को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए। आपातकाल की घोषणा के बाद पाकिस्तान में घटित होने वाले आतंकवादी हादसों में निश्चित रूप से कमी दर्ज की गई है। उधर फिलहाल इन आतंकवादियों के विरुद्घ इसी दौरान पाक सैनिकों अथवा पुलिस द्वारा कोई ऐसा विशेष अभियान भी नहीं चलाया गया है जिसे आपातकल में होने वाली विशेष कार्रवाई कहा जा सके। इस खामोशी भरे घटनाक्रम को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए। मुशर्रफ आतंकवादियों के विरुद्घ किसी बडे अभियान को क्या इसलिए नहीं छेडना चाहते क्योंकि इससे मुशर्रफ के और अधिक उलझ जाने का खतरा है? दूसरी ओर ऐसा लगता है कि आपातकाल की स्थिति से घबराकर आतंकवादियों ने भी अपनी रणनीति में थोडा बदलाव लाते हुए नियमित चलने वाले अपने ऑप्रेशन में कमी लाने का फैसला किया है। परन्तु इन सबसे अलग यह समाचार भी आ रहे हैं कि पाकिस्तान की सेना व पुलिस पाक-अफगानिस्तान सीमान्त क्षेत्रों में किसी बडी कार्रवाई की योजना भी बना रही है।
ज्ञातव्य है कि पाकिस्तान के सीमान्त कबाईली इलाकों में स्वातघाटी व वजीरिस्तान सहित अन्य कई क्षेत्रों पर तालिबानी आतंकियों का पूरा नियंत्रण है। यहां तक कि इन्होंने कई सैन्य व पुलिस चौकियों व नाकों को भी अपने नियंत्रण में ले लिया है। यही वह क्षेत्र है जहां कि तालिबानी आतंकवादियों के समक्ष, पाकिस्तानी सेना द्वारा सैकडों की संख्या में सशस्त्र समर्पण किए जाने के समाचार प्राप्त हुए थे। अफगानिस्तान में अमेरिका व उसके सहयोगी देशों द्वारा 2॰॰1 में स्थानीय कबाईली नेताओं के संगठन नॉर्दन एलायंस के साथ मिलकर किए गए ऑप्रेशन के परिणामस्वरूप सत्ता से खदेडे गए तालिबानों के बारे में उस समय तो ऐसा लगने लगा था कि शायद अब यह मानवता विरोधी कट्टरपंथी अपनी ताकत समाप्त कर बैठे हैं। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। पिछले तीन वर्षों से इनके पुनः संगठित होने के समाचार प्राप्त होने लगे थे। अफगानिस्तान से यदि यह खदेडे जाते तो पाकिस्तानी सीमान्त क्षेत्रों में इन्हें आसाानी से पनाह मिल जाती। इस कबाईली क्षेत्र को तो आतंकवादियों के स्वर्ग होने की संज्ञा दी गई है। आहिस्ता-आहिस्ता पाकिस्तान के भीतर भी इनका पुनः प्रवेश शुरु हो गया। आखिरकार हालात यहां तक आ पहुंचे कि ऑप्रेशन लाल मस्जिद जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना सामने आई। यहां यह बताना भी न्यायसंगत होगा कि इन तालिबानियों ने केवल अफगानिस्तान पर ही शासन करने की अपनी योजना नहीं बना रखी है बल्कि पाकिस्तान पर भी हुकूमत करना इनकी सूची की प्राथमिकताओं में शामिल है। अक्सर यह पाकिस्तानी जनता में इस प्रकार का प्रचार करते भी पाए गए हैं। जाहिर है नासूर रूपी इस बीमारी का इलाज होना बहुत जरूरी है। चाहे वह आपातकाल के दौरान मुशर्रफ द्वारा चलाए जाने वाले किसी बडे अभियान के द्वारा किया जाए अथवा पाकिस्तान की निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार द्वारा पूरी पारदर्शिता व ईमानदारी के साथ संभव हो।
इसके अतिरिक्त दूसरी सबसे बडी चिंता पाकिस्तान में मौजूद परमाणु शस्त्रों को लेकर जताई जा रही है। अमेरिका, भारत व स्वयं पाकिस्तान का वर्तमान शासन इस बात से चिंतित है कि कट्टरपंथियों व आतंकवादियों के दिन-प्रतिदिन बढते जा रहे हौसले व उनकी शक्ति में लगातार होती जा रही बढतरी कहीं उन्हें इस योग्य न बना दे कि वे पाकिस्तान में मौजूद परमाणु शस्त्रों पर नियंत्रण कर बैठें। पिछले दिनों पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम बेनजीर भुट्टो ने भी इस विषय पर अपनी चिंता जताई थी कि जैसे भी हो यह अतिसंवेदनशील हथियार किसी भी कीमत पर गलत हाथों में नहीं जाने चाहिए।
उपरोक्त समस्त हालात के मद्देनजर पूरी दुनिया की निगाहें पाकिस्तान में लागू आपातकाल की ओर इस उद्देश्य से लगी हुई हैं कि देखें आखिर जनरल मुशर्रफ द्वारा जल्दबाजी में घोषित इस आपातकाल का भविष्य क्या होगा तथा आपातकाल समाप्त होने से पूर्व इसमें क्या-क्या संभावनाएं छुपी हुई हैं। जो भी हो दुनिया के शांतिप्रिय लोग पाकिस्तान के उज्जवल भविष्य की तथा कट्टरपंथी, रूढीवादी एवं आतंकवादी शिकंजों से उसके मुक्त होने की केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं।
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