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16 May 2008
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18
Dec
पाकिस्तानः हाफिज खुदा तुम्हारा 
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तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

दक्षिण एशियाई देशों के प्रमुख संगठन दक्षेस के अन्तर्गत आने वाले दो प्रमुख देश भारत व पाकिस्तान इन दिनों पूरे विश्व में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। दुनिया का ध्यान भारत की ओर आकर्षित होने का कारण जहां दिन-प्रतिदिन इसकी मजबूत होती अर्थव्यवस्था तथा सन् 2020 तक विकसित राष्ट्रों की सूची में भारत का नाम दर्ज होने की संभावना है, वहीं भारत के पडोसी देश पकिस्तान के दिन-प्रतिदिन बिगडते जा रहे हालात तथा पाक में व्याप्त राजनैतिक अस्थिरता के अतिरिक्त पाकिस्तान में पनपने वाली आतंकवादी विचारधारा भी मुख्य रूप से पाकिस्तान की ओर पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित कर रही है।
  जहां तक पाकिस्तान में मौजूदा राजनैतिक हालात का प्रश्ा* है तो पाकिस्तान की लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा पाकिस्तानी सेना के मध्य दिखाई देने वाली उठा पटक कोई नई बात नहीं है। दरअसल पाकिस्तानी सेना भी स्वयं को देश की व्यवस्था को देखने व चलाने का उतना ही जिम्मेदार व योग्य मानती है जितना कि वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुडे अन्य लोग। यही वजह है कि पाकिस्तानी सेना, खासतौर पर पाकिस्तान का शासक बनने की तमन्ना रखने वाले पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष ‘उपयुक्त’ अवसर हाथ लगते ही लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों का तख्ता पलट देते हैं। फौजी शासक जरूरत पडने पर इन निर्वाचित सरकारों के मुखिया को किसी भी हद तक पहुंचाने में भी नहीं हिचकिचाते। चाहे वह जेल में कैद रखना हो, देश निकाला देना हो या फिर फांसी के फंदे पर लटकाया जाना। पाक सेना इनमें से कोई भी कदम उठाने में नहीं हिचकिचाती। पिछले दिनों तो पाकिस्तान में आपातकाल लगने, संविधान को भंग करने तथा उच्चतम न्यायालय को भंग कर नई सर्वोच्च न्यायपीठ गठित होने तक के नजारे देखने को मिले।
  बहरहाल पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ अपनी सोची समझी फौजी रणनीति का प्रयोग करते हुए तथा पाकिस्तान की सत्ता पर अपना नियंत्रण रखते हुए दुनिया को यह दिखाने की कोशिश जरूर कर रहे हैं कि पाकिस्तान लोकतंत्र के रास्ते पर चल पडा है। पाकिस्तान में लागू आपातकाल का हटाया जाना तथा निकट भविष्य में वहां होने वाले चुनाव इस बात का प्रमाण भी देते हैं। परन्तु पर्यवेक्षक यह भली भांति देख रहे हैं कि मुशर्रफ, जनरल मुशर्रफ से बदलकर राष्ट्रपति मुशर्रफ क्यों न बन गए हों परन्तु पाकिस्तानी सत्ता अब भी सेना के भारी प्रभाव व दबाव से अछूती नहीं हैं। एक ओर तो पाकिस्तानी अवाम पाक सत्ता पर सेना व लोकतंत्र के ठेकेदारों के बीच गत् 6 दशकों से निरंतर चली आ रही खींचतान को देख-देख कर स्वयं को असहज स्थिति में पा रही है तो दूसरी ओर राजनैतिक अस्थिरता के इन्हीं हालात में पाकिस्तान में आतंकवाद, आतंकवादी विचारधारा तथा इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथ को फलने-फूलने का भरपूर मौका मिला है। इससे बढकर इसका सुबूत और क्या हो सकता है कि पिछले दिनों पाकिस्तान में मुशर्रफ द्वारा जब आपातकाल की घोषणा की गई तो उस समय आपातकाल लगाए जाने के कारणों में एक प्रमुख कारण पाकिस्तान में बेकाबू होती जा रही आतंकवादी गतिविधियां भी थीं।
  पाक में आपातकाल की घोषणा से पूर्व आत्मघाती हमलों द्वारा पाकिस्तान के सैनिक हितों को निशान बनाने की जो एक श्रृंखला आतंकवादियों द्वारा शुरु की गई थी, आपातकाल लगने के बाद उसमें भारी कमी भी देखी गई। परन्तु यह आतंकवाद क्या पाकिस्तान से कभी समाप्त भी हो सकेगा? पाकिस्तान में फलने-फूलने वाला यह आतंकवाद पूरी दुनिया को विशेषकर भारत तथा दक्षिण एशिया को कितना प्रभावित करेगा, यह विषय पूरी दुनिया के लिए एक गहन चिंता का विषय बना हुआ है। भले ही इस्लाम के नाम पर फैलने वाले आतंकवाद के पीछे अमेरिका द्वारा इराक पर अकारण हमला किए जाने को मुख्य कारण क्यों न माना जा रहा हो परन्तु कट्टरपंथी लोगों द्वारा इस्लाम के नाम पर फैलाई जा रही जहरीली तथा वैमनस्यपूर्ण विचारधारा का भी इसमें कम योगदान नहीं है। इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा केवल स्वयं को ही सही तथा खुदा का वास्तविक बंदा मान बैठना तथा अन्य गैर मुस्लिमों को खुदा का बंदा न स्वीकार करना ही दुनिया में नफरत फैलाने का प्रमुख कारण बनता जा रहा है।
  पकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों के फलने-फूलने से केवल पाकिस्तानी शासक व प्रशासकगण ही चिंतित नहीं हैं बल्कि पाकिस्तान का मुख्य सहयोगी अमेरिका तो इस विषय को लेकर सबसे अधिक चिंतित व गंभीर है। कुछ वर्ष पूर्व तक पाक अधिकृत कश्मीर के कुछ गुप्त ठिकानों पर चलने वाले आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर जब पूरी तरह परवान चढ गए तो न केवल भारतीय कश्मीर तथा भारत के अन्य कई हिस्से इसकी चपेट में आए बल्कि इस्लामाबाद की लाल मस्जिद तक यही आतंकवाद सिर चढ कर बोला। और इन्हीं बिगडते हालात ने पाकिस्तान को आपातकाल की स्थिति तक पहुंचा दिया। परन्तु पाकिस्तान से आतंकवाद को बढावा देने के सिलसिले में जो ताजी रिपोर्टें आ रही हैं, वह इतनी भयावह हैं कि उनपर शीघ्र विश्वास ही नहीं होता। परन्तु दुर्भाग्यवश यह रिपोर्ट सत्य पर आधारित हैं तथा पूरी तरह विश्वसनीय भी हैं।
  आतंकवादी मिशन में गरीब, अनपढ, उत्साही तथा युवा बेरोजगारों को प्रयोग कर चुकने के बाद अब इन मानवता विरोधी कट्टरपंथियों द्वारा मासूम बच्चों को अपने नापाक मकसद के लिए प्रयोग किया जा रहा है। तीन साल से लेकर पांच से सात साल तक के उन बच्चों को जिनकी उम्र अभी दूध पीने, खेलने और खाने की है, उन्हें ए के 47 जैसे हथियारों से रूबरू कराया जा रहा है। पाकिस्तान में कईं गुप्त ठिकानों पर खेल-खेल में ही उन बच्चों को आत्मघाती हमले करने की ट्रेनिंग दी जा रही है। गरीब मां बाप से उनके बच्चों को धर्म के नाम पर ले लिया जाता है। इसके बदले में उस बदनसीब बच्चे के मां बाप को कुछ रकम अदा कर दी जाती है तथा उन्हें यह विश्वास दिला दिया जाता है कि अब यह बच्चा या तो फातेह(गाजी/विजेता) होगा या शहीद। उन कट्टरपंथियों द्वारा अनपढ व गरीब मुस्लिम समाज को गुमराह किया जाता है कि उक्त दोनों ही हालात में बच्चे का जन्नत (स्वर्ग) में जाना निश्चित है। खबर तो यहां तक है कि ऐसे बच्चों की संख्या लाखों तक पहुंच भी चुकी है जिन्हें आतंकवादियों द्वारा अपने नापाक इरादों की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाना है। इससे भयानक सत्य पाकिस्तान के लिए और क्या हो सकता है।
  ठीक इसके विपरीत यदि पाकिस्तान के एक और पडोसी देश चीन के बच्चों की मानसिकता के विषय में बात करें तो वहां भी तीन साल से लेकर पांच वर्ष तक के बच्चों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु उनका यह प्रयोग खेलकूद में हिस्सा लेने तथा औलंपिक खेलों में अधिक से अधिक स्वर्ण पदक चीन में लाए जाने के निहितार्थ किया जाता है। चीन में होने वाले आगामी ओलंपिक खेलों की तैयारियों के सिलसिले में भी छोटे व मासूम बच्चों को जिमनास्ट की बाकायदा ट्रेनिंग दी गई है। परन्तु उन बच्चों के माता-पिता का एकमात्र लक्ष्य चीन में होने वाले ओलंपिक में अधिक से अधिक स्वर्ण पदक प्राप्त करना है, न कि उन्हें आतंकवादी बनाना, आत्मघाती बनाना अथवा स्वर्ग का सौदागर बनाना।
  कुछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अधिकांश बच्चे पहले पांच वर्ष में ही अपने जीवन के 80 प्रतिशत संस्कारों, आदतों तथा व्यवहार आदि को धारण कर चुके होते हैं। बच्चे शेष 20 प्रतिशत अपने जीवन में चारों ओर पाए जाने वाले वातावरण से प्राप्त करते हैं। यदि यह तथ्य सही है तो इस बात की सहज ही कल्पना की जा सकती है कि पांच वर्ष से कम उम्र में जिन बच्चों को खतरनाक शस्त्रों, आत्मघाती बमों, जेहादी मानसिकता जैसी बातों से रूबरू कराया जाएगा तो ऐसे में उनका भविष्य आखिर क्या होगा? क्या ऐसे मासूम बच्चों से कभी प्यार, मोहब्बत, मानवता, क्षमा तथा सहयोग जैसी मानवतापूर्ण बातों की उम्मीद भी की जा सकेगी? और इन सबसे बडा चिंता का विषय यह है कि पाकिस्तान में फलने-फूलने वाली आतंकवाद की यह नर्सरी बेगुनाह लोगों को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ स्वयं इस्लाम धर्म व मुस्लिम जगत के लिए कितनी अधिक घातक साबित होगी।

 तनवीर जाफरी - tanveerjafri1@gmail.com



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Pakistan Hafiz Khuda Tumhara:Bahut sahi likha hai tanveer jafri sahab ne.Benazir bhutto ki hatya ne jafri ji ke shandaar satya lekh par mohar kaga di hai.Ab to wastav men AAi Pakistan : Hafiz Khuda Tumhara.Jafri sahab aapko bahut bahut Badhaai. Bhagwan kare aapki qalam se aaise hi satya saamne aate rahen.AApke lekh aatankwaad ke wirudh zabardast chetaawani dete hain.AAisa lekhon ke liye jafri saahab badhai ke paatra hain.Dharamveer Singh Chandigarh, Dharam veer Singh (28/12/2007 20:27:31)
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