ऋद्धि एवं सिद्धि के स्वामी श्री गणेश ही एकमात्रा हिन्दू देवता हैं जिनकी पूजा-अर्चना के बिना कोई भी मांगलिक कार्य प्रारंभ नहीं होता है।
श्री गणेश की पूजा भारत वर्ष के अलावा विदेशों में भी की जाती है। ये लोकप्रिय देवता जैन बौद्ध धर्म मं भी पूजे जाते हैं। इनके मंदिर एवं मूर्तियां चीन, जापान, नेपाल, कोरिया, भूटान, तिबत, श्रीलंका, वर्मा, जावा, सुमाथा, बाली, कम्बुजिया, मंगोलिया के साथ-साथ पाकिस्तान एवं बांग्ला देश में भी पाई जाती हैं।
श्री गणेश का परिवार छोटा है। उनको जन्म दिया पार्वती मैया ने । पिता महादेव, भाई कार्तिकेय, दो पत्नियां ऋद्धि एवं सिद्धि एवं दो पुत्रा शुभ एवं लाभ तथा गणेशजी व वैनायिकी नामक शक्तियां हैं।
भारत वर्ष में इनको एकदंत, विनायक, गणेश, गणपति, गणेश्वर, गणदेवता, गजानन, लम्बोदर, गजकर्ण, भालचन्द्र, कपिल एवं द्वैमातुर के नाम से पुकारा जाता है।
सिन्धु घाटी के ५०० हजार वर्ष की सभ्यता से आज तक के इतिहास में इनकी प्रतिमाओं का १५०० वर्ष का काल ही है- जबकि इनके पिता शिवजी अनादि काल से पूजे जाते रहे हैं। हडप्पाकाल में काले-कलूटे, मोटे पेट वाले, छोटे-छोटे पैर वाले व भारी सूंड वाले देवता की पूजा की जाती रही। कलकत्ता के म्यूजियम में दूसरी शताब्दी का एक सोने का सिक्का है जिसमें शिव की मूर्ति एवं नीचे गणेश लिखा हुआ है।
प्राचीनतम प्रतिमाएं एवं उनका काल क्रम
श्रीलंका एवं अमरावती के स्तूप की वेदिका की मूर्ति गजानन की दूसरी शताब्दी की है। तीसरी शताब्दी की २० ईंच की लाल पत्थर की मूर्ति मथुरा में मिली। मध्यप्रदेश के भूमरो के मंदिर में प्राचीनतम पाषाण की प्रतिमा ५ वीं शताब्दी की मिली। सातवीं शताब्दी में वेलूर के चेत्राकेशव मंदिर एवं लखन्डी के काशी विशवेश्वर मंदिर में पाषाण प्रतिमाएं मिली। इसी शताब्दी की चालुक्य नरेशों की राजधानी में चट्टानें काटकर नटराज (शिव) की प्रतिमाओं के साथ बालक गणेश दिखाए गये हैं। ऐहोल में बालक गणेश लड्डू खाते हुए शिव-पार्वती की मूर्ति के साथ दिखाये गये हैं।
ऐलोरा की पत्थर की गुफाओं में भी गणेशजी की मूर्तियां पायी गई हैं, आठवीं शताब्दी की है। मध्यप्रदेश के भेराघाट-जबलपुर में, दसवीं शतादी की एक प्रतिमा दीवाल पर खोदकर सर्पधारी गणेश की बनाई गई है। जोधपुर के घटिमाता नामक स्थान पर (८६२ ई.सं.) नवमी शताब्दी की गणेश की मूर्ति पाई गई है। त्रिामुख वाली पाषाण की प्रचीनतम गणेश की प्रतिमा दसवीं शताब्दी की हिमाचल प्रदेश के चम्बा नामक स्थान पर प्राप्त हुई। उडीसा में गणेश नवग्रहों के साथ तो, त्रिपुरा एवं कर्नाटक में ऊंची-ऊंची विशाल मूर्तियां हैं तो ऐलीफेन्टा (बम्बई) की गुफाओं मे गणेश तो त्रिाचनापल्ली एवं वल्तागम मे खडे व बैठे गणेश की मूर्तियां, पश्चम बंगाल में कमल पर बैठे गणेश, ढाका (पूर्वी बंगाल) में शेर पर सवार गणेश की प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं। दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी की इसी श्रृंखला में राजस्थान के दक्षिण भाग वागड (वाग्वर) प्रदेश की प्राचीन “तिलकपुर पाटन नगरी” के नाम से विख्यात तलवाडा के एक प्राचीन गणेश मूर्ति है जो ख्ूाब प्रसिद्ध है।
दसवीं शताब्दी मे निर्मित गणेश की आदमकद खडी, पूर्वाभिमुखी उपासना की अनुपम एवं अलौकिक मूर्ति है। गुजरात के राजा सिद्धराज के लेख से पता चलता है कि सोलंकी वंश के राजा कर्ण के पुत्रा जमारा ने मालवे के राजा नरवर्मा को हराकर अपनी विजय के उपलक्ष में बांसवाडा के तलवाडा (तलपाटक नगर) गांव में सिद्धपेन गणनाथ का मन्दिर बनवाकर मूर्ति की ५ अप्रैल ११०९ सोमवार-विक्रम संवत ११६६ वैशाख सुदी ३ को स्थापित की।
सिद्धपेन गणपति के आसान पर पांच पंक्तियों का बारीक अक्षरों का खुदा हुआ लेख है। परन्तु अनन्तकाल तक पूजा एवं प्रतिदिन पानी (जल चढाने)डालने से अधिकांश अक्षर घिस गये हैं। आज भी यह मूर्ति अपने मूल स्थान पर बिराजमान है।
इस कालक्रम में अर्थूना ग्राम के परमार राजा मंडलीक के पुत्रा चामुन्डाराज ने अपने पिता की स्मृति में ई.सं. १०८० दिनांक ३१ जनवरी शुक्रवार, वि.सं. ११३६ फाल्गुन सुदी ७ मडलेश्वर महादेव का मंदिर बनवाया उसके मुख्य द्वार पर श्री गणेश की दूसरी प्राचीन मूर्ति है। इस मंदिर के अलावा सामने पहाडी पर गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नवग्रह, शिव (ताण्डव नृत्य करते हुए) चामुण्डा, भैरव, दिग्पाल आदि-आदि भग्नावशेष मूर्तियां पाई गई हैं। यहीं निज मंदिर में शिवलिंग के अतिरिक्त पार्वती, गणपति व उमा माहेश्वर की मूर्तियां रखी हुई हैं। ये सभी 11 वीं व 12 वीं शताब्दी की बनी हुई प्राचीन मूर्तियां हैं।
- श्याम व्यास, तलवाडा
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