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शहर में बिगडे हालात के लिए नेता जिम्मेदार

13 May 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

- नशेडी युवक को वारदातों की छूट देती है पुलिस-
-नेताओं ने किया कानून व्यवस्था का कबाडा-

शहर में व्याप्त अराजकता, सरेआम हो रही आपराधिक वारदातों के लिए अकेली पुलिस ही नहीं, राजनीतिक लोग भी जिम्मेदार हैं। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए राजनीतिक लोगों ने पुलिस थानों में ऐसे लोगों की नियुक्तियां करवाईं, जो कानून के प्रति कम और उनके प्रति ज्यादा वफादार रहें। लूट-खसोट, कमीशनखोरी व भ्रष्टाचार ने पिछले दो साल में अपनी गहरी जडें जमा ली और स्थिति यहां तक बिगड गई कि अपराधी खुद पुलिस थानों में जाकर पुलिसकर्मियों व अधिकारियों को धमकाने लगे हैं और पुलिस अधिकारी व कर्मचारी भी अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए इन आपराधिक किस्म के लोगों के हां में हां मिलाते रहे। नतीजा यह निकला कि आपराधिक तत्वों के हौसले बुलंद हो गए। पुलिस का भय उनके दिमाग से निकल गया। शातिर किस्म के पुलिसकर्मियों ने शहर में हुई एक-दो वारदातों को भी अपनी कमाई का जरिया बना लिया। जिसमें हाइवें पर सरेआम चौथ वसूली तथा वाहन चोरी व अन्य अपराधों में गिरफ्तार किए गए युवकों को पुलिस नशेडी होने के नाम पर छोड देती है या उसे तुरंत न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया जाता है। इसके पीछे पुलिस वालों का तर्क यह होता है कि वह नशेडी था, मर जाता तो हमारे गले में आफत आ जाती इसलिए छोड दिया। बल्कि हकीकत यह है कि पुलिस के आज भी रुपए कमाने वही हथकंडे हैं, जो दस साल पहले होते थे। अब घटनाओं की आड लेकर रुपए ऐंठ लिए जाते हैं और उसे नशेडी बताकर या तो छोड दिया जाता है या न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया जाता है। पूर्व पुलिस अधीक्षक बीजू जार्ज जोसफ ने यहां एक व्यवस्था की थी कि नशेडी किस्म के युवकों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और उन्हें मेडिकल जांच के बाद अस्पताल में भर्ती करवाया जाए। उसकी हालत सुधरने के बाद पूछताछ कर आपराधिक वारदातों का खुलासा किया जाए, परंतु इससे पुलिस को फायदा नहीं हुआ और उनका फार्मूला फेल हो गया। इसलिए पुलिस अधीक्षक जार्ज के साथ ही इस कानून को भी फाइलों में दफन कर दिया गया। अब नशेडी युवक पुलिस की कमाई का जरिया बन गए हैं। यह कहां का कानून है कि शरीफ आदमी को तो वारदात के संदेह में ही गिरफ्तार कर लिया जाए और जो सरेआम वारदात करते पकडा जाए और वह नशेडी हो तो पुलिस उसे हाथ नहीं डालती। उसके परिजनों को बुलाकर उसे सौंप देती है तो क्या शरीफ आदमी की शराफत उसका गुनाह है। पुलिस की इसी कार्यप्रणाली के कारण शहर के हालात बिगडते चले गए। अपराधियों के हौसले बढे, वोट की राजनीति के चलते राजनीतिक पार्टियों के लोगों ने भी इन्हें संरक्षण देना शुरू कर दिया। जो लोग कुछ साल पूर्व कांग्रेस नेताओं की सभा में दिखाई देते थे, वे आज भाजपा नेताओं की सभाओं में भी दिखाई देते हैं। उन लोगों के वास्तविक काम धंधे क्या है, उनकी आमदनी का जरिया क्या है। रहन-सहन, ठाठ-बाठ के लिए रुपया कहां से आता है। या तो वे राजनीतिक लोग बता सकते हैं जिनके संरक्षण में वे काम करते हैं या  वे अधिकारी बता सकते हैं जिनके इलाके में ये लोग सक्रिय रहते हैं। राजनीतिक लोगों ने अपना दबदबा आम लोगों में बनाने के लिए सबसे पहले पुलिस तंत्र को अपने कब्जे में किया जाता है। जब तक राजनीतिक लोगों की सिफारिश पर पुलिस थानों में सिपाही से लेकर थाना प्रभारी तक नियुक्तियां होती रहेंगी, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी। आपराधिक तत्वों के हौसले और मजबूत होंगे। इस राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस जिले के अमन-चैन को खतरे में डाल दिया है। स्वार्थों की पूर्ति के लिए राजनीतिक लोग ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति करवाते हैं जो कानून को खेल समझकर उनके हर काले-सफेद में मदद करते हैं। यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब शहर के प्रत्येक गली-मौहल्ले में सरेआम आपराधिक गैंग वारदात कारित करेंगे और पुलिस उस गैंग को बचाने के लिए आएगी न कि पीडित व्यक्ति को। आज भी स्थिति यह है कि राजनीतिक संरक्षण में आपरधिक वारदातें कर रहे गुण्डई तत्वों के खिलाफ लोग गवाही देने से कतराते हैं। साल के अंत में जब अपराध के आंकडे जारी होंगे तो थाना प्रभारी गर्व से कह सकते हैं कि उनके इलाके में अपराध कम हुए हैं। उन्होंने इंस्तादी कार्रवाई कर गुण्डई तत्वों पर अंकुश लगाया है बल्कि हकीकत यह है कि बडे-बडे अपराधों को छोटी धाराओं में तब्दील करने में इनका खुद का स्वार्थ है।


-लक्ष्मीकान्त शर्मा

 




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