Sunday, 01 November 2020

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किसानों के कर्ज माफी की राजनीति


Writer - Nirmal Rani

भारत सरकार के वित्त मंत्री पी चिदम्बरम द्वारा गत् दिनों यू पी ए सरकार का अंतिम वार्षिक बजट संसद में पेश किया गया। देश के सभी राजनैतिक दल विशेषकर स्वयं को किसानों का मसीहा बताने वाले नेताओं ने इस बात का बखूबी अंदाजा लगा रखा था कि यू पी ए शासनकाल का अन्तिम बजट होने के नाते यह एक अति लोकलुभावना चुनावी बजट हो सकता है। हुआ भी कुछ वैसा ही या शायद उससे भी अधिक। पूरे देश में मंहगाई बढने का आरोप झेल रही कांग्रेस पार्टी ने देश के किसानों के 60 हजार करोड रुपए के कर्जे माफ कर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि कांग्रेस ही किसानों की सच्ची हमदर्द है।
  भारतीय राजनीति में बुद्घिजीवी समझे जाने वाले राजनीतिज्ञों के अतिरिक्त नौकरशाहों का एक ऐसा वर्ग भी है जोकि इस प्रकार के कर्ज माफी जैसे लोकलुभावने फैसलों को उचित नहीं समझता। बजाए इसके ऐसे फैसलों को यह वर्ग सरकारी खजाने पर एक बडा बोझ मानता है। और सच्चाई भी यही है कि किसी किसान का एक बार या दो बार कर्ज माफ कर देना उसके लिए स्थाई राहत मिलने का माध्यम नहीं है। स्थाई राहत के लिए तो स्थाई उपायों की तलाश करनी होगी। यह वजह जाननी होगी कि आखिर किसान अपने कर्ज की भरपाई किन कारणों से नहीं कर पाया। फिर उन कारणों का समाधान खोजना होगा। जाहिर है कि इसमें सबसे पहले कारण के रूप में सूखा, बाढ व बिजली की किल्लत जैसी बातें ही सामने आएंगी। और यह ऐसी जटिल समस्याएं हैं जिनका पूर्ण रूप से समाधान भारत जैसे विशाल देश में अभी तक नहीं हो सका है। उधर भारत में शहरी चकाचौंध तो दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है। देश के मुख्य मार्ग, महानगर, मुख्य नगर तो तरक्की करते दिखाई दे रहे हैं परन्तु गांवों में गरीब किसानों की हालत अब भी लगभग वैसी ही या उससे भी बद्तर बनी हुई है जैसी कि चार दशक पूर्व थी। पहले से बद्तर हालत यूं कही जा सकती है क्योंकि अब तो गत् कई वर्षों से गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, साहूकार का कर्ज न अदा कर पाने जैसे कारणों से किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के समाचार प्राप्त होने लगे हैं। परन्तु लगता है हमारे नेताओं को इनकी बुनियादी समस्याओं की न तो फिक्र है, न ही यह स्थायी समाधान हेतु गंभीर नजर आते हैं। अफसोस तो यह है कि किसानों की बुनियादी समस्याओं के प्रति गैर संजीदा रुख अपनाने के बावजूद यही तथाकथित किसानों के मसीहा स्वयं को किसानों का सबसे बडा हमदर्द प्रमाणित करने का भी पूरा प्रयास करते हैं।
  उदाहरण के तौर पर चिदम्बरम ने इस वर्ष किसानों व आम लोगों को राहत देने वाला एक ऐसा बजट पेश किया जिसकी इसी प्रकार के होने की उम्मीद भी की जा रही थी। विपक्ष ने इसे चुनावी बजट कहा तो कांग्रेस ने भी कहा, हां। बजट के चुनावी बजट होने में कोई हर्ज नहीं। लोकतांत्रिक सरकार अच्छा काम करने के लिए चुनी जाती है। और यदि चुनाव में जाने से पूर्व कांग्रेस ने अच्छा काम किया तो निश्चित रूप से जनता इसका सिला पार्टी को चुनावों के दौरान देगी। यह था कांग्रेस के एक प्रवक्ता का तर्क। दूसरी ओर विपक्षी दल फरमाते हैं कि केंद्र सरकार ने उनके दबाव में आकर किसानों के कर्ज माफ किए हैं तथा जनहित का यह बजट पेश किया है। मजे की बात तो यह है कि हरियाणा की इंडियन नेशनल लोकदल जैसी क्षेत्रीय पार्टी जिसका लोकसभा में कोई नामलेवा भी नहीं है, उसके प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला भी इसी गलतफहमी का शिकार हैं कि उनकी पार्टी के दबाव  में आकर केंद्र सरकार ने किसानों के कर्ज माफ किए हैं। इसी प्रकार अकाली दल व भारतीय जनता पार्टी ने बजट पेश होने से पूर्व दिल्ली में बडी सभाएं व प्रदर्शन कर किसानों की समस्याओं को उजागर किया था। इनका भी यही कहना है कि किसानों को मिलने वाली राहत इनके दबाव की बदौलत दी गई है। अर्थात् विपक्षी दल एक ओर तो इसे चुनावी बजट भी बताते हैं तो दूसरी ओर इस बजट में किसानों को व आम आदमियों को दी गई राहत का श्रेय भी अपने ही ऊपर लेना चाहते हैं। इन हालात से एक बात तो बिल्कुल साफ जाहिर होती है कि चाहे वह सत्तारूढ दल हो या विपक्षी पार्टियां, इन सभी को किसानों को अपना बनाने तथा स्वयं को उनका शुभचिंतक प्रमाणित करने की जबरदस्त होड लगी हुई है। इसी प्रकार एक बार चौ० देवी लाल की मंशा से केंद्र सरकार ने उस समय किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा की थी जबकि देवी लाल भारत के उप प्रधानमंत्री थे। भारत के वे किसान परिवार जिन्होंने इस घोषणा का उस समय लाभ उठाया था, उनके परिजन आज भी चौधरी देवी लाल के किसान हितैषी होने का दम भरते हैं तथा उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला को उसी आधार पर समर्थन भी देते आ रहे हैं।
  परन्तु क्या सरकारी कर्ज एक या दो बार माफ कर दिए जाने से देश का किसान हमेशा के लिए सुखी हो जाएगा? गैर सरकारी कर्ज के रूप में कितने किसान साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं, क्या कभी सरकार ने अथवा कथित किसान हितैषी नेताओं ने इस बात का अंदाजा लगाने की कोशिश की है? आमतौर पर तो यह भी देखा जाता है कि सम्पन्न किसान ही छोटे व गरीब किसानों के साहूकार बने बैठे होते हैं। और यही बडे किसान उन गरीब लोगों का उत्पीडन भी करते हैं जोकि आर्थिक कारणों से उनके अधीन रहते हैं। लिहाजा इन हालात के मद्देनजर यह तो कल्पना करना ही गलत है कि एक या दो बार की कर्ज माफी किसानों के लिए दीर्घकालीन राहत का सबब बन सकेगी।
  रहा सवाल किसानों को स्थाई राहत देने का तो इसके लिए राजनेताओं को पूरे दृढ संकल्प के साथ ठीक उसी प्रकार तथा उसी जोश, उत्साह व रणनीति के साथ वास्तव में किसानों के कल्याण हेतु आगे आना होगा जैसे कि वे किसान हितैषी प्रमाणित करने के अपने प्रदर्शन में लगे रहते हैं। इसके लिए एक सर्वदलीय समिति का पूरी ईमानदारी से गठन किया जाना चाहिए जोकि गरीब किसानों को आर्थिक संकट से उबारने के लिए हर संभव उपाय करे। सिर्फ खेती बाडी पर ही निर्भर न रखते हुए उन्हें हथकरधा, हैंडलूम, अन्य दस्तकारी वाले लघु उद्योग आदि की ओर भी आकर्षित करना चाहिए। सूखे की चपेट में आने वाले क्षेत्रों में बरसाती जल संग्रह करने हेतु गहरे तालाबों अथवा जोहडों का खनन किया जाना चाहिए। बाढ प्रभावित क्षेत्रों में नदियों के किनारे ऊंचे लंबे व मजबूत बांध यथाशीघ्र निर्मित किए जाने चाहिए तथा जल भराव वाले इलाकों में बरसाती जल की निकासी के समुचित उपाय किए जाने चाहिए। बंगलादेश के नोबल पुरस्कार विजेता प्रो. मोहम्मद यूनुस की तर्ज पर भारतीय किसानों को बडे पैमाने पर माइक्रोफाइनेंस प्रणाली की शुरुआत कर उससे भी जोडा जाना चाहिए। और इन सबके साथ-साथ इस श्रेणी के किसानों, मजदूरों व गरीब वर्ग के लोगों को समुचित चिकित्सा व्यवस्था भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसी के साथ-साथ इनके बच्चों को निःशुल्क शिक्षा भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  भले ही उपरोक्त उपायों को पूरा करने में कुछ अधिक समय क्यों न लगे परन्तु इतना जरूर है कि उपरोक्त समाधान किसानों के लिए सथाई समाधान के रूप में ऐसे वरदान साबित हो सकते हैं जिनसे कि इन गरीब किसानों को न तो कभी आत्महत्या जैसा भयानक कदम उठाना पडेगा, न ही गरीबी उनके घरों में स्थाई निवास कर सकेगी। परन्तु एक बार फिर इसके लिए जरूरत होगी आपसी राजनैतिक सूझ-बूझ व तालमेल की न कि किसानों के कर्ज माफ करने जैसे मुद्दे पर राजनैतिक श्रेय लेने का प्रयास करने वाली थोथी एवं खोखली मानसिकता की। 


Nirmal Rani  [email protected]