Sunday, 01 November 2020

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महिला सशक्तिकरण की राजनीति


चुनावों का दौर सामने है। राजनीतिक दल मतदाताओं की तरफ और मतदाता वर्ग असमंजस की स्थिति की तरफ मुखातिब हैं। लेकिन मतदाताओं के वर्ग मे महिलाओं की भागीदारी को लेकर उतने प्रश्न सामने नहीं नज़र आ रहे हैं जितना की हम विकास बनाम वृद्धि, सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता, और व्यक्तिगत राजनीति मे उठते देख रहे हैं। राजनीतिक दल भी उन्ही चेहरों को शामिल करते हैं जो जनता की भीड़ को आकर्षित कर सकें। और शायद राजनेतागण इसे ही महिला सशक्तिकरण का चेहरा मानते हैं। मगर इसका दूसरा पहलू भी देखना जरूरी है। 

आज यदि हम अपने आस-पास के शहरों और गाँव के बदलते परिवेश पर नज़र डालें और उसमे महिला की स्थिति पर विचार करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वो अपने सशक्तिकरण के दौर से गुज़र रही है। परंतु यदि हम इस आभासी प्रतिबिम्ब से बाहर आकर वास्तविकता का सही मायने मे विश्लेषण करें तो एक अलग और चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। 
सबसे पहला प्रश्न इस सन्दर्भ में ये उठता है की आखिर इस शब्द ‘महिला सशक्तिकरण’ की परिभाषा क्या है? और हम इसे किस तरह निर्धारित करते हैं? क्या इसके मापदंड परिमाणात्मक हैं, जो उनका प्रारम्भिक शिक्षा मे नामांकन, किसी उच्च शिक्षा संस्थान मे भर्ती, किसी तकनीकी या प्राविधिक कोर्स मे दाखिला या रोजगार इत्यादि मात्र से ही निर्धारित होता है? या फिर कुछ अन्य पहलुओं के मायने से भी इस चीज़ को देखा जाना चाहिए? दूसरा प्रश्न जो पहले प्रश्न से ही निकलकर आता है, वो ये की क्या एक दलित या पिछड़े वर्ग की महिला जो आर्थिक या सामाजिक दृष्टि से किसी उच्च आर्थिक या सामाजिक स्तर की महिला से नीचे है, के सशक्तिकरण के पैमाने और उनका तथाकथित मूल्यांकन अलग दृष्टिकोण से होना चाहिए? यदि नहीं, तो क्यों? और यदि हाँ तो कैसे? यदि हम इन दोनों प्रश्नो पे एक साथ विचार करेंगे तो पाएंगे की दोनों एक ही समस्या के दो पहलू होते हुए भी बहुत भिन्न हैं। और इसका निदान करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। 
पहले प्रश्न की बात करें तो इसके उत्तर मे सभी का मानना है कि बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, और उसके साथ साथ आर्थिक, सामाजिक एवम राजनीतिक भागीदारी मे मिले उच्च और सतत अवसरों से सशक्तिकरण होता है। ये बात नीति विशेषज्ञों से लेकर सामाजिक विज्ञान के तमाम पहलुओं से जुड़े लोग भी मानते हैं। ये यकीनन कहा जा सकता है की उनके साक्षारता स्तर मे बढ़ोतरी अवश्य हुई है, लेकिन वो भी प्राथमिक स्तर पर और उसमे भी शहरों मे निवास करने वाली महिलाओं का प्रतिशत अधिक है। भारतीय मानव विकास रिपोर्ट 2011 के अनुसार उच्च नामांकन दरें प्राप्त कर लेने के बावजूद निवल उपस्थिति दरें (एनएआर) कम रहीं हैं। एनआरएचएम के कार्यान्वयन के बाद भी, महिलाओं के स्वास्थ्य सूचकांक बहुत संतोषजनक नहीं हैं। मानव संसाधन रिपोर्ट के अनुसार मातृत्व मृत्यु दर(एमएमआर) अभी भी 212 प्रति एक लाख जिंदा दर पर है,और शिशु मृत्यु दर(आइएमआर)प्रति 1000 जीवित जन्म पर 47 है। जबकि सरकार ने समय समय पर कई महिला कल्याणकारी योजनाएँ जैसे कि एनआरएचएम, जननी सुरक्षा योजना,प्रारम्भिक स्तर पर राष्ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम इत्यादि का प्रावधान किया है। उसके अलावा रोजगार मे भी गैर-सरकारी, कृषि,या अन्य घरेलू उद्योग में उनका प्रतिशत अधिक है बनिस्बत के सरकारी, प्रशासनिक, उच्च तकनीकी क्षेत्रों की अपेक्षा, जैसा की सरकारी आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं।
राजनीतिक भागीदारी में भी बहुत अच्छी सूरत नहीं है। यदि हम चुनाव आयोग के आंकड़ों पे गौर करें तो प्रथम आम चुनाव जो कि 1952 मे हुए थे, उसमे कुल 22 महिलाएं निर्वाचित हुई थी, और पिछले आम चुनाव में जोकि 2009 मे हुए थे, महज़ 59 महिलाएं ही निर्वाचित हुई थीं।1957 के आम चुनाव में कुल 45 महिलाएं मैदान मे उतरी थीं और 2009 तक केवल 556 महिलाएं ही आगे बढ़ पायीं। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो संसद में महिला प्रतियोगियों कि संख्या के संदर्भ में रवांडा प्रथम स्थान पर है, जबकि भारत 108वें स्थान पर है। पड़ोसी देश चीन 56वें, पाकिस्तान 66वें एवं बांग्लादेश 71वें स्थान पर है। ये वृद्धि उनकी जनसंख्या,शिक्षा, जागरूकता के आयामों पर कहीं से भी खरी तो नहीं ही उतरती हैं। महिला प्रतिनिधियों का ये ठहराव चिंता का विषय है। 
यही नहीं,यदि हम आर्थिक भागीदारी एवम अवसर की बात करें तो इस संदर्भ में स्विट्ज़रलैंड की एक ग़ैर सरकारी संस्था विश्व आर्थिक मंच (WEF),द्वारा तैयार किए गए सूचकांक में भारत 136 देशों में 124वें स्थान पर है। और स्वास्थ्य क्षेत्र में देश नीचे से दूसरे स्थान यानि कि 135वें स्थान पर है। ये सारे आंकड़े तो यही साबित करते हैं हम शायद महिला सशक्तिकरण की परिभाषा समझ नहीं पाएँ हैं या फिर समझना नहीं चाह रहे हैं। दलितों या पिछड़े वर्ग की बात करें तो दूसरा प्रश्न उनकी भागीदारी को लेकर ही उठता है। क्योंकि उनके साथ और भी कई समस्याएँ जुड़ी हैं। आए दिन दलित एवं पिछड़ी जनजाति की महिलाओं पर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचारों को भला मूल्यांकन की किस कसौटी पे रखा जाये? अभी कुछ दिनों पहले बिहार के सारण जिले के नूननगर गाँव की एक दलित महिला की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गयी। पिछले साल सितंबर 2013 में ओडिशा में एक दलित महिला को कुएं से पानी लेने के लिए निर्ममता से पीटा गया। और भी ऐसी कितनी घटनाएँ हैं, जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में किए गए सारे प्रयासों को विफलता की ओर ले जाती है। नीतियों का लाभ तब तक नहीं हो पाएगा जब तक सरकारी, राजनीतिक, प्रशासनिक, और तमाम नीति बनाने वाली निकायों मे दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं की भागीदारी न बढ़ाई जाये। अन्यथा हम पहले प्रश्न कि सार्थकता मे दूसरे प्रश्न का उत्तर खो देंगे।