किसान सुखराम कई खेतों का मालिक था। उनमें स्वयं काम करता था। पूरे परिवार का गुजारा उन्हीं खेतों से होता था। पर जैसे-जैसे वह बूढा होने लगा, उसे चिंता सताने लगी कि उसके दोनो बेटों में से कौन उसका काम सही ढंग से संभाल पाएगा। बडा बेटा ’राम‘ या छोटा बेटा ’श्याम।‘ ऐसा ख्याल आते ही उसे एक उपाय सूझा। क्यों न दोनों बेटों की परीक्षा ली जाय। दोनों में से कौन ज्यादा योग्य और ईमानदार हैं?
सुखराम ने एक दिन दोनों बेटों को पास बुलाया और दोनों को अलग-अलग एक पोटली दी। फिर बोला-’बेटा राम! तुम यह पोटली खेत में ले जाओं और पूर्व दिशा में जो आम का पेड लगा है उसके नीचे गड्ढा खोदकर दबा देना। और श्याम तुम अपनी पोटली को पश्चिम में लगे आम के पेड के नीचे गड्ढा खोदकर दबा देना। हां एक बात का ध्यान रहे कि पोटली खोलकर मत देखना कि इसमे क्या हैं ?‘
’जी पिताजी!‘ कहकर दोनों अपनी-अपनी पोटली उठाकर चल पडे। रास्ते में राम अपनी एक ही धुन में मस्त था कि उसे पिताजी के कहे अनुसार पोटली को पूर्व दिशा में लगे आम के पेड के नीचे गाडना हैं। पर श्याम के मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे कि पिताजी ने पोटली खोलनें से मना क्यों किया हैं। ? उसने राम से पूछा -’भइया इसमें क्या होगा ?‘
’मुझे क्या पता, लौटकर पिताजी से ही पूछ लेना।‘ राम बोला।
’क्या इसमे सोना होगा जो हमें छिपाकर रखना हैं ?‘
’पता नहीं तुम तो चुपचाप वो करो पिताजी ने कहा है।‘
श्याम की बात अनसुनी कर वह फिर बोला-’नहीं सोना नही होगा, क्योंकि यह हल्की हैं। क्या इसमे पिताजी की सम्पति के कागजात होंगे ?‘
’मुझे नहीं मालूम।‘
’भइया जरा अपनी पोटली तो दिखाओ वह हल्की है या भारी?‘
’नहीं मैं नहीं दिखाऊंगा।‘ राम थोडा तेज आवाज में बोला।
’कही ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी पोटली में सोना हो और मेरी पोटली में कागजात!‘ श्याम उत्सुकता से बोला।
’पिताजी ने जैसा कहा है वैसा करों यह मत सोचों कि कहां क्या हैं? अब की बार राम थोडा नाराज होकर बोला। श्याम की बकबक से तंग आकर राम जल्दी-जल्दी चलने लगा। श्याम को अच्छा मौका मिल गया। उसने सोचा, भइया तो आगे बढ गए है, मैं चुफ से पोटली खोलकर देखता हूं कि उसमें क्या हैं ?
राम तो आगे बढकर पिताजी के बताए स्थान खोदने लगा और श्याम रास्ते में ही बैठकर पोटली खोलनें लगा। उसमे कुछ कागज के टुकडे और रूई थी। यह देखकर श्याम को गुस्सा आया। वो पिताजी की बात भूल उल्टे पैर घर की तरफ लौट पडा और घर पहुंचते ही गुस्से से बोला-’पिताजी,पिताजी!‘
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