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20
Dec
राजपूतो का गौरव पद्मिनी
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अलाउद्दिन अपने काका जलालुद्दीन की हत्या करके दिल्ली की गद्दी पर बैठा। वह खिलजी जाति का था तथा ऐसे कबिले का वंशज था जो सब तरह की दुष्टताओं और विनाश के लिए प्रसिद्व था उनमें से प्रत्येक ने सता प्राप्त करने के लिए खूनखराब किया अलाउदीन ने भी उसी रास्ते को अपनाया और जलालुदीन की हत्या कर तख्त हासिल किया।
सिवाय इसके वह सौन्दर्य का दिवाना तथा खुबसुरत औरतों का बडा शौकिन था खुबसुरत अलाई-दरवाजा बनाने के लिए उसने धन और किमती पत्थर एक राजा को लूटकर इक्टठे किये इसी प्रकार जब किसी खुबसुरत की खबर पाता तो उसे प्राप्त करने के लिए पागल हो उठता और उसके लिए कोई भी किमत देने के लिए तैयार रहता।
सुन्दरता के लिए पागलपन के सिवा अलाउदिन संकी और जिद्दी स्वभाव का भी था कभी वह सारी दुनिया को जीत कर दुसरा अलेग जेन्डर बनने का स्वपन देखता तो वह कभी वह पैगंबर बनने की इच्छाा रखता कभी वह धर्म की पालना करता कभी यह कहकर उसे ठुकरा देता कि वह मात्र सौदेबाजी व मनोरंजन का साधन है तथा इसका शासन से कोई तालुक नहीं राजनैतिक मशलों पर वह अपने दरबार के विद्वानों की सलाह कभी नहीं मानता था तथा यह कह कर उसे ठुकरा देता कि एक बुद्विमान राजकुमार की राय कई लोगों कि राय से ज्यादा अच्छी होती है।

इन्दि्रयलोलुपता
अलाउद्दिन वासनाप्रेमी अपने ढंग का एक ही आदमी था वह सदा सौन्दर्य एश आराम तथा वासना में डुबा रहता था सौन्दर्य के पीछे पागल प्रेम के परिणाम स्वरूप उसे कई बार मुसीबतों का सामना करना पडा किन्तु उसने अपनी जिद नहीं छोडी।
१४ वीं श्ताब्दी के आरम्भ में जब अलाउद्दीन जब अपने राज्य का विस्तार करने के लिए राजपूतों के राज्य पर हमला कर रहा था तब उसने मेवाड के राजा भीमसिंह की रानी पदमावति के अदित्य सौन्दर्य का समाचार सुना ऐसा कहा जाता था कि पुरे राजपूताने में पदमिनी के जैसी सुन्दर स्त्री और कोई नहीं थी। बस फिर क्या था अलाउदिन उसेदखने और प्राप्त करने के लिए दिवाना हो उठा।
सबसे पहले उसने पद्दिानी को छल से हरण करने के लिए बदले हुए वेष में गुप्त दूत भेजे जब उसमें उसे सफलता नहीं मिली तब कुटनी औरते सिधे पद्दमिनी के पास भेजी जो अलाउद्दीन की तारिफ करके पद्ानी को फुसलाने की कोशिश करती। किन्तु जब उन्हे भी मात खानी पडी तो अलाउद्दिन क्रोध से पागल हो उठा। वह पद्दिानी को प्राप्त करने के लिए आक्रमण की तैयारी करने लगा।

अलाउदीन की प्रतिज्ञा
उनदिनों मेंवाड की राजधानी चितौड में यद्यपि लकुमसि गदी पर बैठा था किन्तु चुंकि वह नाबालिंग था उसके काका भीम सेन उसके नाम पर राज्य का कार्य चलाया करते थे भीमसिंह एक बहादूर राजपूत था वह युद्व में जितना ही वीर था उतना ही राज्य के प्रति वफादार तथा मातृ भूमि का भक्त था।
अपुर्व सुन्दरी तथा बुद्धि ने तीक्ष्ण पद्दिानी उसकी प्रतिवता पत्नि थी वह लंका द्विप की निवासनी थी तथा अपने अद्वित्य सौन्दर्य एंव कौशाक बुद्वि के लिए प्रसिद्व थी उसकी बुद्धि न केवल मेवाड बल्कि देश के सुदुर प्रदेशों में फैल चुकी थी अंत में वह ख्याति दिल्ली के बादशाह अलाउद्दिन के कानों तक पहूचगई जो बडा ही जिद्दी व दुष्ट शासक था अपने अधिकार व सता के मत में वह प्रतिज्ञा कर बैठा वह पद्दिानी को पाकर रहेगा चाहे उसके लिए कोई भी किमत न चुकानी पडे।
अपने पागलपन में अलाउद्दिन यह भुल बैठा कि पद्दिानी का पा लेना इतना आसान काम नहीं राजपूत लडाई में अपनी बाहदुरी के लिए प्रसिद्व थे उनकी अपनी विशेषता अपनी आन ओर इज्जत पर मर मिटना था उसके लिए वह अपने जानों की बाजी लगा देना उनके लिए मामूली बात थी।
उनकी औरते भी बाहदूरी और साहस में उनसे किसी तरह कम नहीं थी अपने पतियों को विरता पूर्वक लडाई में भेज देने के बाद वे स्वयं चिता जलाकर उसमें झोड कर लिया करती थी कि ताकि उनके पति लडाई में काम आए तो दुश्मन उनके शरीर को हाथ न लगा सके।
चितौड की और प्रस्थान
शक्ति के जोर से पद्दिानी को पाने का स्वप्न देखते हुए अलाउद्दिन ने अपनी विशाल सेना लेकर चितौड की और प्रस्थान किया वह महिनों शहर के आसपास सेना घेर कर डेरा डाले रहा किन्तु अभेध चटानों के कारण चितौड उसके कब्जे में नहीं आया अन्त में उसने लडाई छेड दि दिन और रात भंयकर आक्रमण होने लगे। रात को भी चुप न बैठे ईंट का जवाब पत्थर से देने लगे दोनो और धन और जन की अपार हानि हुई किन्तु कोई निर्णय न हो सका इतने लम्बे काल तक चलता रहा कि अलाउद्दिन थक गया और पद्दिानी को पाने की उसकी आशा निराशा में बदलती दिखाई देने लगी।

क्रमशः




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