गंताक से आगे...
कभी कभी वह पछताने लगता कि वह किसी भी किमत पर पद्दिानी को पाने की व्यर्थ की प्रतिज्ञा कर ली झुठी आशाओं और कठिनाई के इस जीवन से उबर कर कभी कभी वह दिल्ली के अश और आराम को याद करता और सोचता कि अभि भी कितनी सुन्दर स्त्रियां उस पर अपना सब कुछ देने के लिए तैयार होगी फिर किसी चालाक और बुद्विमान मुसल मान ने उसे सलाह कि पद्दिानी अगर शक्ति से प्राप्त नहीं कि जा सकती तो उसे धोखे से प्राप्त किया जावे उसने तरकीब सुझाई बस फिर क्या था एक दूत मेवाड के शासक के पास इस आशय का संदेश देकर भेजा गया कि अलाउदिन लडाई समाप्त करने के लिए तैयार है केवल एक शर्त पर कि उसे एकबार अदित्य सुन्दरी पद्दिानी को दिखा दिया जाए।
सन्देश सुनकर भीमसिंह क्रोध से पागल हो उठा उसकी आखों से चिंगारीया निकलने लगी और वह तलवार लेकर उठ खडा हुआ-उस जबान को काट डालने के लिए जिसने ऐसे अपमान जनक शब्दों का उच्चारण करने का दुसाहस किया प्रत्येक राजपूत जिसने यह संन्देश सुना अपने सर्देह स्वामिनी के अपमान की कल्पना मात्र से क्रोध से आगबबूला हो उठा और अलाउद्दिन को मारने के लिए उतावला हो उठा।
फिर किसी समझदार और धैर्यवान बुजुर्गरातपुत ने एक चाल सुझााई और तुरन्त बादशाह के पास सन्देश भेजा गया आप बिना हथियार के अकेले आए। और आपकी इच्क्षा पूरी की जाएगी। ’’बादशाह खुशी से उछल पडा। उसने बशकीमती कपडे पहने तथा हीरे जवाहरात के आभुषणो से अपने को सुसज्जित किया। फिर उसने आइने में अपना चेहरा देखा पहली बार उसे लगा जैसे कि वह पहले से बहुत ज्यादा तन्दुरस्त तथा खुबसुरत है। वह गर्व के साथ अकेला ही भीमसिंह के महल की और चल पडा पूरे विश्वाश के साथ कि राजपुत अपने वचन के पक्के होते है तथा दुश्मन को भी कभी धोखे से नही मारते जब पह अपने खेमे से बाहर जाने लगा तो उसके सैनिको ने उसकी सुरक्षा के लिए भीमसिंह के महल तक उसके साथ जाने के आग्रह किया किन्तु अलाउद्दिन ने यह कहकर उन्हें यह कहकर रोक दिया कि’’राजपुत अपने अतिथी के साथ कभी विश्वासघात नही करते।’’
आइने में पद्दिनी का प्रतिबिम्ब
जैसे ही अलाउद्दिन भीमसिंह के महल के दरवाजे पर पहुंचा संतरियों ने उसे सलाम किया तथा भीमसिंह ने सम्मान पुर्वक, किन्तु गम्भीरता से, उसका स्वागत किया तथा भीमसिंह ने सम्मानपुर्वक, किन्तु गम्भीरता से, उसका स्वागत किया महल में सभी ओर अजीब खामोशी तथा गम्भीरता छाई हुई थी। अलाउद्दिन को दरबार हाल में बिठाया गया। फिर अग्नि परीक्षा का समय आया और अलाउद्दिन ने आईने में पदिनी को देखा प्रत्यक्ष नहीं बल्कि उसका प्रतिबिम्ब मात्र जो बाहर बार प्रतिबिम्बित होकर उसके सामने लाया गया था। बादशाह क्षणभर के लिए स्तम्भित रह गया वह आईने की ओर एकटक देखता रहा पद्दिानी सचमुच अपूर्वसुन्दरी है रूप और सौन्दर्य में उसकी बराबरी करनेवाला इस पृथ्वी पर कोई दूसरा नहीं। उसे पाना ही होगा चाहे उसके लिए कोई भी कीमत क्यों न देना पडे अलाउद्दीन सोचना लगा।
कुट परीक्षा समाप्त हुई और पदिनी क्रोध और अपमान से आहत फर्श पर गिर पडी। वह बार बार लपने और उस सौन्दर्य को धिक्कारने लगी जिसके कारण उसे अपमानित होना पडा। जब भी वह अलाउदीन की उस क्रुर घृणित दृष्टि का स्मरण करती, वह बेहोश हो जाती। उसे ऐसा लगा जैसे किसन उसके पावन पुनीत चेहरे पर कंलक की कालिमा पोत दी हो। वह फूट-फूटकर रोने लगी और यह सोचकर कि अपने देवतुल्य पति को अपना कलंकित चेहरा कैसे दिखाएगी, वह शोक से विहल हो उठी।
भीमसिंह कैद में
भीमसिंह कुछ दुर तक अलाउद्दीन को विदा करने गए। अलाउद्दीन ने उसे बातों में इसतरह उलझाया कि पता ही नहीं चला कि कब मुसलमानी खेमा आ गया। अपने को मुसलमानों के बीच पाकर भी भीमसिंह ने उनपर अविश्वास नहीं किया कारण उन्हें बादशाह का इशारा पाकर मुसलमान सैनिकों को भीमसिंह को घेरकर कैद कर लिया।
भीमसिंह ने एक तीखी घृणित नजर बादशाह पर डाली किंतु उसने बेशर्मी से कहा, ’’पद्दिानी को एक बार देखने का मेरा उदेश्य यह जानना था कि क्या सुचमुच में वह अपूर्व सून्दरी तथा प्राप्त करने योग्य है। अब मैं कहता हूं कि वह ऐसी ही है और मैं, दिल्ली का बादशाह आज फिर इस बात की प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं उस समय तक चैन न लूंगा। जब तक उस अद्वितीय सून्दरी को न पा लूं।‘‘ भीमसिंह क्रोध से उसपर टूट पडना चाहता था, किन्तु उसे वहंा से हटा लिया गया और कडे पहरे के अन्दर रखा गया।
चितौड मे सनसनी छा गई। भीमसिंह के कैद की खबर सारे मेवाड में आग की तरह फैल गई। वे सब एक स्थान पर इकट्ठे हुए और बडे वाद विवाद के बाद उन्होंने यह तय किया कि एक दूत बादशाह के पास भेजकर उससे यह पूछा जाए कि वह भीमसिंह को मुक्त करने के बदले में क्या चाहता हैं।
हत्या की धमकी
तुरन्त उतर मिला, ’’बादशाह भिमसिंह के बदल में अपूर्व सून्दरी पदिनी को चाहते है उसे तुरन्त भेज दिया जाए अन्यथा भिमसिंह की हत्या कर दि जाएगी और युद्व फिर शुरू कर दिया जाएगा।‘‘
करीब एक सप्ताह तक चितौड में शान्ति छाई रही हर कोई बडी दुविधा में दिखाई देता था किन्तु कोई भी निर्णय नहीं किया जा सका। पद्दिानी दुःख से कातर बार-बार अपने सौन्दर्य को धिक्कारती, जिसके कारण सारे चितौड पर यह मुसीबत आई। दिन और रात वह यह सोचती कि कैसे राजपूती इज्जत की रक्षा कि जा सकती है अन्त में उसे एक तरकीब सूझ आई उसने तुरन्त अपने सरदारों और जवानों को बुलाया और अपनी योजना उनके सामने रखी।
’’योजना तो बेशक बहुत अच्छी है किन्तु उसे कार्यान्वित करना खतरे से खाली नहीं है,‘‘ सभीने एकमत होकर कहा एक क्षण के लिए वे हिचकिचाए, किन्तु पद्दिानी के अपूर्व जोश शक्ति तथा साहस को देखते हुए ’नही‘ं कहने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। अन्ततः बादशाह के पास सन्देशा भेजा गया ’’पद्दिानी आफ पास आएगी एक शर्त पर यदि भीमसिंह को सुरक्षित वापस भेज दिया जाए। साथ ही पद्दिानी की एक प्रार्थना है- वह अपनी उन सारी बांदिया को अपने साथ लाना चाहती है जिनके बगैर वह नहीं रह सकती।‘‘
अलाउद्दीन तो खुशी से पागल हो रहा था उसने तुरन्त उतर भेज दिया, ’’पद्दिानी जिस तरह चाहे आ सकती है बस देर भर न हो गोरासिंह जो सेनापति तथा पदिनी के काका थे, मुसलमानी खेमें में पद्दिानी के स्वागत की व्यवस्था करने गए। उन्होंने बादशाह से पूछा क्या पदिनी अपने साथ कुछ सशस्त्र सैनिक ला सकती है ताकि उसकी बांदिया सुरक्षित रहे?‘‘
’’नहीं, नहीं।‘‘ बादशाह ने कहा,’’ मै केवल इतना आश्वासन दे सकता हूं कि मेरा कोई भी आदमी उनके रस्ते में नहीं आएगा। भावी सम्राज्ञी की बांदिया पूरी तरह से स्वतंत्र रहेंगी तथा उनकी सुरक्षा व इज्जत का पूरा पूरा ख्याल रखा जाएगा।‘‘
मुसलमान सैनिकों की खुशियां
गोरा के वापस होती ही बादशाह ने सैनिकों को हुक्म दे दिया कि वे अपने हथियार एक ओर रख दें तथा पूरी तरह से आराम करें। पद्दिानी के आने की खुशी में उसने वह दिन सैनिकों को राग-रंग तथा खुशियां मनाने के लिए खाली घोषित कर दिया। फिर उसने नौकरों को बुलाकर उसे अच्छे कपडों तथा गहनों से सुसज्जित करने के लिए कहा। इसके बाद उन्हें आदेश दिया गया कि सौन्दर्य की रानी भावी सम्राज्ञी के स्वागत के लिए उसके खेमे में हर तरह की व्यवस्था ठीक रखी जाए।
चितौड में सर्वत्र भयानक शांति थी। यद्यपि पदिनी और उसकी बांदियो को ले जाने के लिए असंख्य डोलियां तैयार हो रही थी किन्तु यह सब अजीब खामोशी तथा गम्भीर शांति के साथ ही रहा था। अंत मे पदिनी आई और एक सुसज्जित डोली में, जिसके चारों ओर कीमती गहरे परदे डाले गए थे, बैठ गई।
जैसे ही पदिनी को लेकर राजकीय डोली उठ राजपूत सिर झुकाए खामोश खडे हो गए। अपनी प्यारी रानी पद्दिानी की कठिन अग्नि परीक्षा की कल्पना कर उनके हदय रो पडे। फिर धीरे से एक बाद एक डोली उठी ओर आगे बढने लगी ऐसी सात सौ डोलियां मुसलमानी खेमों की ओर चल पडी। उनमे से हर एक साथ छे-छे मजबूत कहार लगे थे। पद्दिानी की डोली के साथ वे सारी डोलियंा बादशाह के सुसज्जित खेमे के पास उतार दी गई।
भीमसिंह की मुक्ति की मांग
गोरासिंह सबसे पहले बादशाह के पास पहुंचा और उसने भीमसिंह की मुक्ति की मांग की। नहीं नहीं इतनी जल्दी नहीं पहले मुझे पदिनी के साथ विवाह कर लेने दीजिए फिर भीमसिंह को छोड दिया जाएगा। बादशाह ने अपनी मुंछ मरोडते हुए कहा।
गोरा क्षण-भर के लिए रूका फिर उसने प्रार्थना कि रानी अपने जीवन देवता राणा भीमसिंह के अन्तिम बार दर्शन करना चाहती है।
हां हां वे जा सकती है किन्तु शीघ्रता कीजिए। मै और अधिक देर अब नहीं सह सकता। अपनी विजय की खुशी में मदहोश बादशाह ने उतर दिया। जैसे ही डोलियां उठकर एक के बाद एक भीमसिंह के खेमे की ओर जाने लगी, अलाउदीन पदिनी की पहली डोली की ओर ललचाई नजर से एकटक देखता रहा। वह पदिनी को अपने बाजू से देखने के लिए अब आतुर हो उठा। पदिनी की डोली भीमसिंह के खेमे पर उतार दी गई, तथा बाकी सभी डोलियां खेमे के चारो ओर उतर पडी। खेमे पर तैनात पहरेदार मुसलमान सैनिक पदिनी बिजली कीतरह तेजी से खेमे में घुस गई। भीमसिंह अवाक रह गया। तुम और यंहा इस मुसलमानी खेमे में क्षणभर के लिए वह क्रोध से लाल हो उठा। किन्तु पदिनी न उसे इशारा किया फिर धीरेसे कान में कहा, जल्दी कीजिए बाहर आइए। घोडे तैयार हैं।
भीमसिंह का भाग खडा होना
भीमसिंह सब कुछ समझ गया। वह तेजी से बाहर निकला। दो घ तैयार खडे थे उनके सवार बारह से वेशभुषा से मुसलमान प्रतितहो रहे थे। पदिमी और भीमसिंह बिजली की गति से उनपर सवार हुए और भाग खडे हुए। लोग सोच भी न सके कि क्या हो गया।
भीमसिंह के खेमे के पास कुछ हलचल देख बादशाह को संदहेह हुआ। उसे शंका हो गई कि कहीं कुछ गडबडी है अतः वह तेजी से उस ओर बढा बादशाह को जाते देख उसके अंगरक्षक भी उसके पीछे दौडे। इसी समय डोलियों के परदे उठे और प्रत्येक में से सशस्त्र राजपुत बाहर निकल आए। साथ कहारों के वेश में राजपूत सैनिक दौड पड। अजीब-सी गडबड मच गई। मुसलमान रक्षकों ने बडी कठिनाई से बादशाह को भीड से निकालकर उसके खेमे तक पहुंचाया।
मुसलमान सैनिक जो राग-रंग में मदहोश थे, अचानक इस परिवर्तन को देख भौचक्के-से रह गए। उन्होंने शीघ्रता से हथियार उठाए और भागे, किन्तु अब क्या था। सुन्दरता की देवी पदिनी तो बहुत दूर जा चुकी थी। बादशाह क्रोध से दांत पीसने लगा, किन्तु अब हो ही क्या सकता था। अन्त में निराश होकर तथा लगातार युद्ध से ऊबकर उसने अपनी सेना को दिल्ली कूच करने का आदेश दे दिया। इस प्रकार सौन्दर्य का दीवाना अलाउद्दीन मुंह की खाकर चितौड से वापस चला गया।
कुछ वर्षो तक चितौड में पूर्ण शांति रही। इसी बीच राजपू मुसलमान संघर्ष में हुई अपार धन और जन की क्षतिपूर्ति की गई। पद्दिानी के अब पुत्र थे तथा प्रत्येक शूरवीर योद्धा था। दर्पण पर अलाउद्दीन की उस घृणित दृष्टि की कटु याद अब धीरे-धीरे धुंधली हो रही थी। तथा चितौड के लोग अलाउद्दीन को करीब करीब से भूलसे गए थे।
किन्तु अलाउद्दीन पद्दिानी को, जो बढती हुई उम्र के बावजूद भी बडी खूबसूरत लगती थी, नहीं भूल सका था। कुछ बुद्धिमान मुसलमानों ने उसे सलाह दी की वह पद्दिानी को पाने का विचार छोड दे किन्तु वह तपात से उतर देता नहीं नहीं पद्दिानी तो मै पाकर रहूंगा चाहे उसके लिए मुझे साम्राज्य क्यों न छोडना पडे अतः वह एक बार फिर भारी सेना लेकर चितौड की और चल पडा भीमसिंह को बडा दुख हुआ अभी पिछले युद्ध में उन्हे धन और जन की असहाय क्षति उठानी पडी थी तथा उसकी पूर्ति कर वे किसी जनता को संतुष्ट कर पाए थे कि ये दूसरा आक्रमण हो गया फिर दुश्मन इससमय अपनी कई गुनी अधिक सेना के साथ आया था ऐसा प्रतित होता था कि मानो मधुमक्ख्यिां चारो और छा गई है इस समय आक्रमण भी सीधा और भयानक था किन्तु राजपूत इससे विचलित नहीं होने वाले थे और ना ही वे झुकने के लिए तैयार थे यह कल्पना मात्र की दुश्मन उसकी सर्द्ध प्रिय रानी को छिनने के उदे्श्य से आया है प्रत्येक राजपूत को अपमान और क्रोध से पागल कर देने के लिए प्राप्त था उनमें से हर एक ने प्रतिज्ञा कि वे अपना सबकुछ बलिदान कर देंगे किन्तु अपनी रानी पद्दिानी को दुश्मनों के हाथ नहीं लगने देंगे इसी प्रेरणा से अभीभूत हो वे इतनी बाहदूरी से लडे कि वे कुछ समय तक मुसलमान पीछे भागते नजर आए
लगातार युद्ध
युद्व लगातार चलता रहा मुसलमानों के द्वारा धीरे धीरे किन्तु लगातार आक्रमण का मतलब था कि वे लम्बे अर्से तक संघर्ष जारी रखेंगे यद्यपि सारे राजपूताने से राजपूत इक्टठे हो गये थे फिर भी वे मुसलमानों से संख्या में कम ही थे राजपूतों का गौरव पदमिनी खतरें में थी तथा राजपूती शक्ति साहस की परीक्षा का अवसर था।
चितौड के पतन का भय कभी कभी पदमिनी को जख जोर कर देता किन्तु इतना उसे दृढ विश्वास था कि दुश्मन उसे जी नहीं सकते और न ही वे बादशाह के हाथ लग सकती हैं। और चाहे जो भी परिणाम हो युद्ध के समय वह राजपूत सैनिकों के लिए शक्ति साहस और प्रेरणा का केन्द्र बनी रही वहन केवल उन्हें उत्साह और हिम्मत देती बल्कि घायलों के सावधानी पूर्वक चिकित्सा भी करती उसकी स्नेह पूर्व सेवा और बुद्धिमता सलाह के परिणाम स्वरूप राजपूत सैना बहुत समय तक मैदान पर अटल बनी रही किन्तु अन्त में असंख्य मुसलमान सेना चितौड के दक्षिणी भाग को हस्तगत करने में सफल हो गई।
क्रमशः |