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राजकुमारी गुलनार और हुमायूं

28 Dec 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

भारतीय काफीले की प्रेमगाथाए काबुल के बाजार में आम लोगो की जबान पर रहा करती थी ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार शीत ऋतु के आगमन पर आम लोग उसकी बातें किया करते । सुबह से लेकर शाम तक आलमखान लोधी की जो भारत के बादशाह इब्राहीम लोधी के चाचा सडको पर हुआ करती । भारत की राजनीतिक एंव सामाजिक स्थिती दिन पर दिन खराब हो रही थी। भारत के शांहशाह का हदय खूबसूरत औरतों की जुल्फों मे फंसा हुआ था। उन दिनों भारत की हुकुमत मर्दो के नहीं, बल्कि औरतों के इशारों पर चलती थी। भारत का सुल्तान पूरे वक्त ऐशआराम और विलास में डुबा रहता था तथा सल्तनत की उसे जरा भी परवाह न रहती थी।
राजमहल और दरबार गुप्त षड््यन्त्र और विद्रोह के केन्द्र हो रहे थे। दरबार-नर्तकी नगीना बादशाह पर हावी थी तथा उसीने आलमखान लोधी को काबुल जाने तथा राजकुमारी गुलनार को तलाक देने के लिए मजबूर किया था।
सहायता की मांग
भारत की गिरती हुई हालत तथा अपने स्वाभिमान के हनन से पीडीत आलमखान काबुल जाने को मजबूर हो गया, ताकि वह वहंा के बहादुर जहीरूदीन मुहम्मद बाबर की मदद से भारत को दिल्ली के सुल्तान के पंजे से मुक्त करे। मेवाड के राणा सांगा ने भी काबुल के शासक से प्रार्थना की थी कि वह दिल्ली के सुल्तान के खिलाफ कार्यवाई करे। पंजाब के सूबेदार दौलतखान लोधी ने भ्ज्ञी इसी काम के लिए अपनी सेवाएं देना स्वीकार कर लिया था। इस प्रकार भारत पर आक्रमण अब करीब-करीब निश्चित ही था।
भारत की राजनीतिक सिथती की बातें केा जानने के सिवाय भरतीय हाथियो को देखने की उत्सुकता से भी लोग भारी तादाद में काबुल के किले पहूंचते उस भारी भरकम काले जानवर को देखकर लोग अचरज में पड जाते है और भगवान की इस विचित्र कारीगरीके लिइ उसकी प्रशंसा करते इन सब चीजों के बीच जेंा सबसे दिलचस्प बातों लोगों की जबान पर रहती वह थी राजकुमार के सम्बन्ध में लोग कहते ’’कैसी विचित्र बात है कि हमारे राजकुमार भारतीय राजकुमारी के प्रेमपाश में बंध गए हैं।‘‘
राजकुमार हुमायुंपर प्रेम का जादु चल गया था और वे खुबसुरती के शिकार हो गये थे कौन इस सच्चाई से इंकार कर सकता था कि किले असैर राजमहल के भीतर जो कुछ छिपे तौर पर हो सकता उसकी हवा बाजारो और आम सडको तक उड चुकी है जिस शाही हूक्म के अनुसार हुमायूं ने आलमखान के राजमहल में प्रमुख अतिथि रुप में स्वागत किया उसका हदय दो चमकती हुई आंॅखों का शिकार हो गयाा।
बाबर ने हुमायूं को व्यक्तिगत रुप से शाही मेहमानों का स्वागत किया तथा उनका सारा इंतजाम करने के लिए तैनात किया था अत वह न केवल उनकी अगवानी करने पहुंचे वरन वहां उस समय तक हाजिर रहा जब तक कि आलमखान के हरम की औरते परदे की आड में हाथियो पर से उतरकर राजमहल के अपने विश्राम भवन में नहीं पहुंच गई । गुलाम लडकियो और बांदियो हाथियो से उतरती हुई औरतो के सामने परदा पकड के खडी हुई थी । जिस समय राजकुमारी गुलनार हाथी पर से नीचे उतर रही थी अचानक एक गुलाम लडकी के हाथ से परदे का कपडा नीचे गिर गया और गुलनार ने घबराकर अपनी बडी-बडी आंखो से देखा कि सामने किसी अपरिचीत मर्द की दो आंखे बडें अचरज से भरकर गौर से राजकुमारी गुलनार को देख रही है राजकुमारी ने शर्म से आखे नीचे झुका ली उसी समय राजकुमार हुमायु को ऐसा लगा मानो किसी ने उसका दिल चुरा लिया हो ।
छोटी -सी बात एक अफसाना बन गई
बात बहुत छोटी सी थी किन्तु वही राजकुमार के जीवन के लिए एक बहुत बडी घटना हो गई राजकुमारी गुलनार को पाने के लिए हुमायु का मन चल उठा । यह सब राजमहल में हो रहा था लेकिन इसकी चर्चा काबुल की सडको पर आम लोगो की जुबान पर होने लगी हुमायु में मुगलो के सारे गुण मौजूद थे खानदानो तोर पर हुमायु मे तलवार की तेजी थी लेकिन उसका दिल बडा नरम और इश्क से भरा थ्ंाा जव से गुलजार से उसकी आंखे चार हुई थी वह बडी बेचैनी महसूस करने लगा वह हमेशा खोया खोया सा और खामेश रहता । स्वभाव के विरूद्ध उसकी इस अचानक चुप्पी को देख उसकी गुलाम बांदी नादिरा ने एक दिन उससे इसका कारण पूछा किन्तु हुमंायु ने उसे टाल दिया ।
कुछ दिन बीतने पर एक दिन फिर नादिरा ने हुमांयु को छोडा और बोली-’’आप दिल के राज को जितना ही दबाएंगे, आफ दिल की बेचैनी उसे उतना ही ज्यादा जाहिर करेगी।‘‘
नादिरा ने बात कुछ ऐसा बुद्धिमानी से बढाई कि हुमांयु अपने दिल के राज को न छिपा सका और उसके सामने सब कुछ जाहिर कर दिया। फिर दर्द से भरकर उसने कहा-’’नादिरा ! अब चूंकि तुम्हें मेरे दिल का राज मालूम हो गया है, तुम्हें मेरी मदद करनी होगी।‘‘
’’मै पूरी तौर से आपकी मदद करूंगी, आप हुक्म दीजिए।‘‘
नादिरा ने कहा।
’’मैं अभी केवल यह जानना चाहता हूं कि राजकुमारी गुल नार मेरे बारे में क्या सोचती है?‘‘
’’मैं पूरी कोशिश करूंगी।‘‘ नादिरा ने जवाब दिया।
नादिरा मुश्किल में
हुमायूं तो खुश हुआ, लेकिन नादिरा मुश्किल में पड गई। उसे समझ में नहीं आता था कि किस प्रकार वह गुलनार के दिल का हाल जाने। वह जानती थी कि उसकी जरा-सी गलती काबुल के बादशाह के क्रोध का कारण बन सकती हैं। वह यह भी जानती थी कि बादशाह ने आलमखान लोधी का एक शरणार्थी के रूप में नहीं, अपितु अपने सगे भाई के रूप में उसका स्वागत किया है। सभी जानते थे कि आलमखान लोधी को बडी इज्जत और मान दिया गया हैं।
किन्तु एक औरत होने के नाते, नादिरा भी इश्क में दिलचस्पी रखती थी। वह लगातार सोचती रही और आखिर उसे एक तरकीब सूझ ही आई। दूसरे दिन वह फूलों का एक खूबसूरत गुलदस्ता लेकर गुलनार के पास पहुंची और बडे अदब से उसे भेंट किया। गुलनार ने बांदी की खुशी के लिए उसे बडे प्रेम से स्वीकार कर लिया।
दूसरे दिन फिर वह फूलों का खूबसूरत गुलदस्ता लेकर गुलनार के पास पहुंची और बोली-’’हुजुर की मेहरबानी देख आज मैं अपने राजकुमार हुमांयू की तरफ से आपको यह गुलदस्ता भेंट करने की हिम्मत कर रही हूं। उम्मीद है, आप इसे कुबूल फरमाएंगी।‘‘
नादिरा के ये शब्द सुनते ही गुलनार घडी-भर के लिए घबरासी गई। वह अचरज से भरकर नादिरा की ओर देखने लगी और उसका गुलाबी चेहरा शर्म से लाल हो उठा। वह समझ गई कि नादिरा का मतलब क्या है, और बोली-’’मैं जानती हूं कि राज कुमार ने न केवल हमारा इस्तकबाल कर हमें इज्जत दी है बल्कि हमें अपने दिल में भी जगह दी है।‘‘ इतना कहकर राजकुमारी गुलनार घबराकर दूसरी तरफ देखने लगी, इस डर से कि कहीं नादिरा उसके दिल का राज न जान जाए।
लेकिन नादिरा भी आखिरकार एक औरत ही थी और वह एक दूसरी औरत के दिल को पहचान सकती थी। गुलनार के चेहरे के बदलते हुए रंग ने उसके दिल का राज खोल दिया और नादिरा को उसे पहचानने में देर नहीं लगी। वह बेहद खुश हुई और तुरन्त राजकुमार हुमायूं के पास दौडी गई। उसने राजकुमार के सामने पूरा किस्सा बयान कर दिया। हुमायूं की खुशी का ठिकाना न रहा। वह जानता चाहता था कि राजकुमारी गुलनार उसके बारे में क्या सोचती है और अब सारा किस्सा सुन उसे बडी राहत मिली। वह बार-बार नादिरा का शुक्रिया अदा करने लगा।
हुमायूं की चिन्ता
अब तक हुमायूं केवल गुलनार के दिल का हाल जानने के लिए उत्सुक था; उसे जान लेने पर अब वह उससे मिलने के लिए बेचैन हो उठा। वह फिर नादिरा को इस मुलाकात के लिए बाध्य करने लगा। नादिरा इसे नामुमकिन कहती, लेकिन राजकुमार हुमायूं किसी भी बात को नामुमकिन मानने के लिए तैयार न था।
अंत में भोज का दिन आया जब काबूल के बादशाह ने आलमखान लोधी को जिसका उसने अपने भाई के जैसा स्वागत किया था, दावत दी। दावत का सारा इंतजाम हुमायूं के जिम्मे था। उस समय नादिरा भी वहंा हाजिर थी। राजकुमार ने उसे बुलाया और फिर पूछा कि क्या गुलनार से उसकी मुलाकात हो सकती है। नादिरा ने वायदा किया कि वह मौके की तलाश में रहेगी।
काबुल का किला रोशनी से जगमगा रहा था। राज्य के सरदार और ओहदेदार अपने दर्जे के अनुसार महल के बडे हाल में बैहाए जा रहे थे। भोज समाप्त होने के बाद नृत्य और संगीत का कार्यक्रम शुरू हुआ और राजनर्तकी पूरे जोश के साथ अपनी कला का प्रदर्शन करने में लग गई।
बादशाह और आलमखान लोधी लोधी खुशी-खुशी बातों में मशगूल थे। शराब के दौर चल रहे थे। इसी बीच हुमायूं ने इधर-उधर नजर डाली और धीरे से वहंा से खिसक गया। वह राजमहल की ओर गया जहां नादिरा पहले ही पहुंच चुकी थी। उसका दिल जोरों से धडक रहा था। नादिरा तेजी से आई और उसने धीरे से कहा-’’मैं राजकुमारी गुलनार को शाही बगीचे में ले आई हूं। आप चुफ से वहां आ जाइए !‘‘ कहकर नादिरा तेजी से गुलनार के पास पहुंच गई। गुलनार ने पूछा-’’तुम कहा चली गई थी?‘‘
’’मुझे माफ किया जाए,‘‘ नादिरा ने मुस्कराते हुए जवाब दिया और बोली ’’राजकुमारी का हुक्म था कि मैं इस बात ख्याल रखूं कि शाही मेहमानों के इंतजाम में कोई कमी न रहे और मैं बीच बीच में उन्हें इसकी खबर देती रहूं।‘‘ नादिरा ने फिर राजकुमारी से आग्रह किया -’’आइए राजकुमारी हम उन सदाबहार फूलों को देखने चलें‘‘
जैसे ही गुलनार आगे बढ दो मुस्कुराती हुई आखों को अपनी ओर एकटक देखते हुए वह अचरज में पड गई। उसे यह जानते हुए देर नहीं लगी कि राजकुमार हुमायूं सामने खडे हैं। वह शर्म से लाल हो गई और तुरन्त मुडकर राजमहल की ओर भागी जहां  उसकी मां अफगान लडकी का नृत्य देखने में मस्त थी।
अनिश्चतता
राजकुमार हुमायूं गुलनार को देख बडे खुश हुए, लेकिन उससे बात करने का मौका न पा एक बार फिर वे अनिश्चितता के सागर में डूबने उतराने लगे। राजकुमारी की रात भी बडी बेचैनी में कटी। वह जानती थी कि इश्क की राह खतरे से खाली नहीं है और जिस तरह से उसका और राजकुमार का इश्क बढ रहा है और जिस तरह से उसका और राजकुमार का इश्क बढ रहा है उसका आखिरी अंजाम क्या होगा, यही उसकी बेचैनी का कारण था।
दूसरे दिन फिर नादिरा फूलों का गुलदस्ता लेकर राजकुमारी के पास पहुंची। गुलनार ने अब समझ लिया कि दिल पर काबू पाना कठिन हैं। वह राजकुमार के पास संदेशा भेजना चाहती थी, किन्तु उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह उसे किस प्रकार भेजे। वह गहरी सोच में पड गई। दूसरे दिन फिर जब नादिरा ने ताजा गुलदस्ता लाकर राजकुमारी को भेंट किया तो गुलनार ने भी एक मखमल का फूल देते हुए कहा कि वह इसे राजकुमारी की ओर से अपने राजकुमार  को दे दे।
नादिरा ने फूल ले लिया और उसे ले जाकर हिमायूं को देते हुए कहा ’’मेरे दुआए आफ साथ है राजकुमार लिजिए राजकुमारी की ओर से उनकी प्रेम निशानी यह फुल कबुल फरमाइये‘‘ राजकुमार ने बडी खुशी से फूल ले लिया वह मखमल का बनावटी फूल था लेकिन पूरा खिला हुआ निहायत खूबसूरत दिख रहा था। फूल दो पत्तियों के बीच फूला हुआ था।
राजकुमार फूल की खूबसूरती को देख भारतीय कला की मन में प्रशंसा कर रहा था कि अचानक उसकी नजर फूल की पंखूडयों पर पडी उसने गौर से देखा तो उन पर कुछ लिखा हुआ नजर आया। फारसी भाषा में उस पर कोई नज्म की पंक्तियां थी उसने ध्यान से पढा वह राजकुमारी की ओर से उसके लिए संदेश था -’’मोहब्बत रूस्वाई नहीं जाती। ओर न किसी की रूस्वाई उसे गवारा हैं।‘‘
राजकुमार ने फूल को चूम लिया ओर इस बात सहमत हुआ कि मुहब्बत ने जाती कि उसके पवित्रता पर किसी भी तरह की आंच आए और न किसी की बदनामी बरदास कर सकती हैं वह अपनी मुहब्बत के सम्बन्ध में सोचने लगा और अपने आप से बोला कि यदि वह सचमुच राजकुमारी से मोहब्बत करता है तो वह ऐसा रास्ता अपनाएगा कि जिससे राजकुमारी की इज्जत पर जरा भी धब्बा लगने न पाए। ओर यही राजकुमारी गुलजार की दिली मुराद थी।
गुलनार को यह जानकर बडी खुशी हुई कि राजकुमार हिमायूं ने उसकी बात मान ली हैं। नादिरा की मदद से गुलनार ने फूलों के जरिये हिमायूं के मन को परख लिया इस प्रकार हिमायूं और गुलनार का पवित्र प्रेम दिनो दिन फूलने और फलने लगा यह उसी प्रकार फैलने लगा जैसे बसन्त के आते ही फूलों की महक चारों और फैलने लगती है और हर तरफ वातावरण सुगन्धित हो उठता है।
हिमायूं के पास राजकुमारी के प्रेम की निशानी व मखमल का फूल था जिसे वह बडे प्यार से अपने पास रखता वह उसी के जरिये अपनी प्रेमिका कि याद हमेशा ताजी बनाए रखता और उसे क्षण भर के लिए भी दुर न रहता यह था हिमायूं और गुलनार का वह पवित्र प्रेम जो इतिहास में सदा अमर रहेगा।

 




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