रजिया सुल्ताना का करूण अंत
’’रजिया सुल्ताना एक महान सम्राज्ञी, बुद्धिमान, न्यायप्रिय, उदार, राज्य की भलाई चाहने वाली, सबको समान दृष्टि से देखने वाली तथा अपनीसेना की अगुवा थी; उसमें लिंग को छोडकर बाकी एक राजा के सभी गुण मौजूद थे; और इसी लिंग के कारण उसके सारे गुण लोगों की नजरों में व्यर्थ हो गए।‘‘ संक्षेप में, महिला मुसलमान शासक रजया सुल्ताना का पूरा चित्र यही है। सन् १२६३ में अल्तमश की मृत्यु के बाद, उसके पुत्रों की कम-जोरी एवं नैतिक पतन के कारण उसके राज्य की हालत बहुत बुरी थी। उसका प्रथम पुत्र रुकनुद्दीन फिरोजशाह एक खूबसूरत, उदार तथा कोमलहृदय जवान आदमी था; किन्तु वह कमजोर व्यक्तित्व वाला तथा मूर्ख भी था। पिता के बाद वह राजा बना किन्तु अपनी स्वयं की शक्ति एवं बुद्धि के अभाव में वह अपनी मां, जो तुर्की गुलाम थी, के हाथ का खिलौना बन गया। वास्तव में शासन वह करती और रुकनुद्दीन खाता, पीता और मौज उडाता। वह गाने और नाचने वाली औरतोंपर धन और आभूषण लुटाया करता।
वह मसखरों को भी पैसे लुटाता तथा शराब में मदहोश हो, हाथी पर बैठ झूमता हुआ धुमने जाता। रास्ते में इकट्ठी होनेवाली भीड में अपने प्रशंसकों को वह सोना दिया करता। वह कामुकता, मूर्खता तथा नीचों की संगति का शिकार था। असकी मां भी बडी दुष्ट एवं कठोर थी। इन्हीं सब कारणों से राज्य में विद्रोह हुआ और रुकनुद्दीन फिरोजशाह सात माह के अल्पकाल के बाद ही गद्दी से उतार दिया गया। उसकी मां समेत उसे कैद कर लिया गया तथा मार डाला गया।
रजया का गद्दी के लिए चुनाव
अब प्रश्न उटा-शासक कौन हो ? चूंकि अल्तमश का कोई भी पुत्र शासक बनने योग्य नहीं था, सबकी आंखें रजया की ओर गईं, जो दिल और दिमाग से अपने पिता के ही अनुरूप थी। रजया का सौन्दर्य भी अनुपम एवं अद्वितीय था। वह बुद्विमान तथा विद्वान थी। उसके पिता ने उसे शिक्षा दी और वह स्वयं कुरान पढ लेती थी। उसके पिता ने उसे राजनीति का भी ज्ञान दे दिया था। वास्तव में अल्तमश को अपनी इस प्रतिभावान लडकी पर बडा गर्व था और वे उसकी योग्यता पर बडा विश्वास रखते थे।
एक बार सन् १२२६ में जब अल्तमश दक्षिण में युद्ध के लिए गया था तो वह शासन का कार्य रजया को सैंप गया था। उसने अपने दरबार के लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, ’’शासन का यह भार मेरे लडकों की शक्ति के बाहर है यद्यपि वे संख्या में बीस हैं, किन्तु नाजुक रजया के लिए यह कुछ भी नहीं है। उसमें उन सबसे ज्यादा शक्ति एवं उत्साह है।‘‘ रजया ने पिता के द्वारा सौंपे गए शासन-कार्य को बडी चतुराई एवं बुद्विमत्ता से चलाया। वास्तव में यह उसकी योग्यता की परीक्षा ही थी। कारण, उसके मार्ग में बाधाएं डालने वाले उसके उद्दण्ड भाई तथा दुष्ट एवं विवेक-हीन मां थी। सिवाय इसके राज्य में दो गुट थे, जिनके द्वारा कभी भी खुलेआम उपद्रव की अग्नि भडक सकती थी। इन सारी कठि-नाइयों के बावजूद भी, रजया ने शासन इतनी दृढता एवं बुद्धि-मानी से चलाया कि उसके भाइयों ने भी उसकी प्रशंसा की। अल्तमश लौटने पर अपनी चतुर लडकी के काम को देख, बडा प्रसन्न हुआ था।
इस प्रकार राजगद्दी के लिए रजया से बढकर और कोई दूसरा उपयुक्त अधिकारी नहीं था। फरिश्ता के अनुसार, ‘‘रजया सभी राजकीय गुणों से सम्पन्न थी और यदि कोई बारीकी से उसमें दोष ढूंढना चाहे तो उसे दोष नहीं मिलेगा, सिवाय इसके कि वह एक औरत थी।‘‘
रजया का सिंहासनारूढ होना
रजया के सिंहासन पर बैठने से सभीको बडी प्रसन्नता हुई। केवल कुछ पुराने विचारों के लोग थे, जो नहीं चाहते थे कि एक औरत के आगे वे अपना सिर झुकाएं। उसने ऐसी योग्यता और निपुणता से शासन- कार्य चलाया कि शीघ्र ही विरोधियों और गुट-बंदी करने वालों को अपने वश में कर लिया। रजया राज्य के महत्त्वपूर्ण कार्यों में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेती तथा प्रत्येक दिन सिंहासन पर बैठी हुई दिखाई देती तथा अपनी सूझबूझ एवं शीघ्र निर्णय करने की शक्ति के द्वारा जनता के कष्टों को दूर कर, उन्हें राहत देती। प्रजा का रजया में अगाध विश्वास था तथा वह उसके राज्य में सुरक्षितता का अनुभव करती थी। ऐसा प्रतीत होता था कि रजया का शासन दिनोंदिन तरक्की करते हुए, लम्बे समय तक स्थायी रहेगा, किन्तु भाग्य की बात थी-रजया ‘औरत‘ की कमजोरी का शिकार बन गई। अरब के एक भविष्यवक्ता ने ठीक ही कहा था, ‘‘सती स्त्री संसार में सबसे महान होती है,‘‘ किन्तु उसने यह भी कहा था, ’’जो रजया सुल्ताना के सम्बन्ध में यह बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई। एक रानी और शासक के नाते यद्यपि रजया दरबार में अत्यधिक व्यस्त रहती तथा बडे-बडे मामलों को सुलझाने में पूरा-पूरा समय और ध्यान देती; किन्तु आखिरकार वह एक औरत थी और उसे बातचीत करने तथा मन बहलाने के लिए किसी आदमी की आव-श्यकता महसूस होती थी। यद्यपि उसके सामने उसकी प्रजा थी जिसपर वह अपना सारा स्नेह बरसाती तथा जिसकी भलाई के लिए वह अपना सारा समय व ध्यान देती और बदले में प्रजा भी उसे स्नेह तथा सम्मान देती; किन्तु फिर भी कभी-कभी वह अनुभव करती कि कोई उसके बहुत नजदीक, बहुत करीब होता, जिसे वह अपना कह सकती और जो अपना सारा प्यार, सारा स्नेह उसपर उंडेल देता।
सूनेपन के क्षण
खाली वक्त में रजया एक विचित्र सूनेपन का अनुभव करती तथा निराश एवं उदास रहती। जीवन के इन्हीं क्षणों में रजया का एक अबीसीनियन युवक जमालुद्दीन याकूत से सम्फ हुआ। वह खूबसूरत आकर्षक जवान था। उसका स्वभाव इतना भोला तथा व्यवहार इतना सभ्य था कि रजया उसके प्रति अपने आकर्षक को न रोक सकी। वह क्रमशः उसके करीब-बहुत करीब आती गई। वह केवल घुडसवारों का मालिक था। वह अक्सर रजय को घोडे पर बैठाकर सैर के लिए ले जाता तथा जब रजया थक जाती तो वह उतरकर शहर से बाहर किसी जगह पर बैठ, याकूत से बातें करती और मन बहलाती। उसे उसके साथ बडा सुख और आनन्द मिलता।
इस प्रकार धीरे-धीरे उनकी मित्रता की जडें गहरी होती गई तथा अंत में वे एक-दूसरे को प्यार करने लगे। याकूत रजया की प्रशंसा करता तथा उसके प्रति अपनी अनन्य भक्ति प्रकट करता। रजया भी उससे बहुत प्रभावित थी। उसने अबीसीनियन जवान का ओहदा बढाकर उसे एडमिरल उमराव या सेनापति बना दिया। एक शाम जब रजया और याकूल शहर से दूर सैर केा गए हुए थे, वे थककर एक बडी चट्रान पर बैठ गए। रजिया को उदास और गम्भीर विचारो में मग्न देख, याकूत ने स्नेह भरे स्वर में पूछा--
उदासी का कारण
’’रानी ! आप खुश नजर नहीं आतीं ! क्या मै आपकी उदासी का कारण जान सकता हूं?‘‘
’’मैं सोचती हूं, याकूत ! मैं तुम्हें बहुत ज्यादा प्यार करने लगी हूं ! कभी-कभी मैं तुम्हारे बिना बेचैन हो उठती हूं।‘‘ रजिया ने धीमी आवाज में कहा।
’’इसके लिए मैं आपका बडा आभारी हूं ! लेकिन यह मेरी समझ में नहीं आता कि इससे आप उदास क्यों होती हैं। आपको तो खुश होना चाहिए, क्योंकि मैं हर वक्त आपकी खिदमत में हाजिर रहता हूं।‘‘ याकूत ने नम्रतापूर्वक कहा।
’’इससे मैं खुश हूं, याकूत ! लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि दरबार के लोग हमारे सम्बन्धों से खुश नहीं है।‘‘ रजिया ने कहा।
’’हमारे सम्बन्धों से उन्हें क्या एतराज है? जहां तक राज-काज के दूसरे मामले हैं, उन्हें समय पर पूरा करने तथा जनता की भलाई करने में तो आपने कोई कसर नहीं उठा रखी है।‘‘ याकूत ने भोलेपन के साथ कहा।
’’मेरे अमीर नाखुश है, क्योंकि मैंने उन सबके ऊपर तुम्हारा ओहदा बढा दिया है। मुझे ऐसा लगता है, वे मेरे खिलाफ बगावत करने की तैयारी में हैं।‘‘ रजया ने गम्भीर स्वर में कहा।
’’जो भी हो, आप चिन्ता न करें। इस नाचीज पर भरोसा रखें जो आफ लिए अपना सब कुछ-यहां तक कि यह जीवन भी कुर-बान करने के लिये तैयार है।‘‘ याकूत ने समझज्ञते हुए कहा।
’’इसमें कोई शक नहीं, याकूत, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। वास्तव में जब मैं तुम्हारे साथ रहती हूं, सब कुछ भूल जाती हूं और बडी खुश और बेफिकर रहती हूं। ऐसे समय मैं सोचती हूं, मैं रानी क्यों हुई ? काश ! मैं एक मामूली औरत होती!‘‘ रजिया ने मुहब्बत-भरी आवाज में कहा।
’’आप रानी रहें या मामूली औरत, इसमें फर्क ही क्या पडता है ? आखिर दोनों इन्सान ही तो है !‘‘ याकूत ने फिर भोलेपन के साथ कहा।
फर्क
’’बडा फर्क होता है, याकूत ! जब मैं दरबार में बैठकर राज-काज के काम करती हूं तब मैं ’औरत’ नहीं होती केवल शासक होती हूं। उस समय में जनता की रक्षा करने वाली तथा उनकी भलाई चाहने वाली होती हूं और मुझमे जो ’औरत’ है चह छिपी रहती है। जब तक मैं व्यस्त रहती हूं मुझे इसका कुछ भी एहसास नहीं होता; लेकिन जैसे ही मुझे फुरसत मिलती है, वह औरत मचल उठती है और किसी की बांहों म समा जाना चाहती है ।’’ कहते हुए रजिया ने याकूत का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए अपना सिर उसके कधें पर धीरे से झुका दिया।
याकूत म भी छिपी हूई इच्छा का आवेश जाग उठा और अपने रजिया को अपनी मजबूत बांहों में भर लिया-उसने अपना सारा प्यार उस प्यासी ’औरत’ पर बरसा दिया-फिर बढता हुंआ अंधेरा देख रजिया उठ खडी हुई और वे दोनों तेजी से शहर को ओर चल पडे।
अफवाहें फैलने लगीं
शहर में अफवाहें फेलने लग कि रजिया और याकूत की दोस्ती गहरी हो रही है और वे दो शरीर लेकिन एक आत्मा है। वे एक दूसरे में मिल गए हैं-कुछ लोगों ने यहां तक कहना शुरू कर दिया कि वे शीघ्र ही शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं।
अफवाह शाही दरबार तक पहुंची। अमीर, जो पहले से ही अपने ऊपर याकूत को रखे जाने के कारण जले हुए बैठे थे, क्रोध से भडक उठे। उनकी नजरों में यह अपराध अक्षम्य था। इसके पहले उन्होंने रजया और तुर्की अमीर अलनूनिया की बढती हुई दोस्ती के सम्बन्ध में भी सुना था। उनके बार-बार मिलने तथा के सम्बन्धों ने अमीरों के मन में द्वेष भर दिया था। लेकिन चूंकि रजया और अलतूनिया-दोनों ही गुलाम वंश के थे, उन्हें उनके मिलन पर उतनी आपत्ति नहीं थी; किन्तु रजया के साथ याकूत का सम्बन्ध, जो नीच अफ्रीकी गुलाम था, उन्हें बरदाश्त के बाहर हो गया। वे आपस में बहस करने और फूटने लगे।
अलनूनिया की बगावत
अलतूनिया ने, जो भटिंडा का गवर्नर था, सबसे पहले रजया के खिलाफ बगावत की। जब रजया को इसका पता चला तो उसने उससे तुरन्त मिलने का निर्णय किया उसे पूरा विश्वास था कि वह अलतूनिया को समझाने में सफल हो जाएगी। क्षण-भर के लिए वह पुरानी बातों में खो गई। उस समय अलतूनिया दिल्ली में था। उसकी योग्यता, बुद्धिमत्ता, महत्त्वाकांक्षा तथा कठिन से कठिन समस्या को सुलझा लेने की शक्ति-और इन सबसे ज्यादा रजया के लिए उसके ह्वदय में गहरा प्रेम-सारी बातें रजया के सामने उभर आई। अलतूनिया और रजया ! दोनों का जोडा कितना अच्छा होगा-कई बार रजिया ने सोचा था और दरबार के लोग भी सोचने लगे थे कि वे दोनों शीघ्र विवाह-बंधन में बंध जाएंगे।
इससे लोगों में इतना विरोध न होता और न ही इतनी समस्याएं उठ खडी होतीं जितनी कि आज उठी हैं। उस समय मामले को सुलझाना ज्यादा आसान होता। घडी-भर के लिए रजिया के सामने अलतूनिया और याकूत दोनों आ गए और वह विचित्र अन्तर्द्वन्द्व में डूब गई-अलतूनिया बहादुर, सज्जन, योग्य एवं सूझबूझ वाला है। वह मेरे मस्तिष्क को प्रभावित करता है और मेरे मन में उसके प्रति श्रद्धा और ही है! वह एक खूबसूरत, खुशमिजाज आकर्षक जवान है। उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी विशेषता है कि उसे देखते ही मेरा रोम-रोम उठ खडा होता है। वह मेरे ह्वदय को प्रभावित करता है, इतना ही नहीं, मदहोश कर देता है ! मैं याकूत के साथ परिंदे की तरह आजाद अनुभव करती हूं, लेकिन अलतूनिया ! उसके साथ सारे सम्बन्धों के बावजूद भी एक दूरी, एक बन्धन और रुकावट का आभास होता है, जो जायज भले ही हो लेकिन दिल उसे नहीं चाहता। यदि दिमाग से काम लिया जाए तो अलतूनिया को पहला स्थान मिलता है, लेकिन दिल से पूछा जाए तो याकूत की बराबरी कोई नहीं कर सकता ।
विद्रोह की अग्नि
अचानक याकूत के आने और यह समाचार देने से कि राज्य में विद्रोह की अग्नि भडक उठी है, रजिया की तन्द्रा टूटी और वह कल्पना के संसार से वास्तविक जगत् में आई। खबर मिलते ही वह एक पल भी खोए बगैर तुरन्त तैयारी में जुट गई और एक बडी सेना लेकर अलतूनिया से मिलने भटिंडा की ओर रवाना हो गई। याकूत भी उसके साथ हो लिया; किन्तु दुर्भाग्यवश सेना में फूट पढ गई और रास्तें में ही उन्होंने बगावत कर दी। उन्होंने याकूत को कैद कर मार डाला और रजिया अकेली निःसहाय रह गई। फिर उसकी सेना के सरदारों ने उसे पकडकर अलनूनिया के हवाले कर दिया और वे तुरन्त दिल्ली वापस आ गए जहंा उन्होंने रजिया के भाई बहराम को गद्दी पर बिठा दिया।
अलतूनिया ने पहले रजिया को कैद करके रखा, लेकिन बाद में उसकी खूबसूरती और आकर्षक व्यवहार से प्रभावित होकर उससे विवाह कर लिया। किन्तु यही पर्याप्त न था । भाग्य ने कुछ और ही तय किया था। पदच्युत रजिया पर दुर्भाग्य की काली घटा छा रही थी। अलनूनिया की महत्त्वाकांक्षा जागी और वह एक बडी सेना ले रजिया सहित दिल्ली की ओर बढा, ताकि खोया हुआ राज्य प्राप्त किया जा सके।
भाग्य उनके विपरीत था। दो बार उनकी सेना को मात खाकर पीछे हटना पडा। तीसरी बार गुलाम राजा की सेना ने ऐसी करारी मात दी कि अलतूनिया की सारी सेना बिखर गई और रजिया और अलतुनिया कैद कर लिए गए। और फिर न तो उसकी खूबसूरती और गुण, और न ही प्रजा के प्रति किए गए उसके भलाई के कार्य उसके भयानक अंत को रोक सके । रजिया और अलतूनिया की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी गई, और इस तरह भारत में गुलाम वंश के शासन का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया। |