एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक पंडित आया। उसने यह घोषणा की कि यदि राजा उसके कहने पर एक महल का निर्माण करेगा तो उसका यश चारो ओर फैलेगा राजा ने पंडित से शुभ मुहूर्त पूछा पंडित ने कहा कि तुला लग्न में यह महल तैयार हो जाना चाहिए। तुला लग्न मे बने महल का कोष कभी खत्म नही होगा वहंा से लक्ष्मी कभी नही जाएगी यह सुनकर राजा ने तुरंत महामंत्री को बुलाकर महल को तुला लग्न तक तैयार होने का समय दिया। शुभ लग्न में महल की नींव रखी गई तथा बडे से बडा कारीगर महल बनवाने के लिये बुलाया गया। महल में जगह-जगह चांदी,सोने,हीरे,नीलम की जडाई हुई।एक दिन तुला लग्न पर महल बनकर तैयार हो गया। राजा पंडित के साथ महल देखने पहुंचे महल ऐसा कि किसी ने ना सुना ना देखा। पंडित के तो अचंभे का कोई ठिकाना नही रहा वह दबी आवाज में बोला यदि यह महल मुझे मिल जाए तो मै तो इन्द्र जैसा भाग्यवान बन जाऊं। पंडित जी की ऐसी अभिलाषा सुनकर महारानी व राजा कैसे उसे ठुकरा सकते थे। उन्होने उसी समय वह महल दान मे पंडित जी को दे दिया।
महल पाकर पंडितजी की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। मानो कि उन्हें इन्द्रासन मिल गया। वे परिवार समेत महल मे आ गये। एक पहर बीत जाने पर लक्ष्मी पंडित के सामने उपस्थित हुई और बोली-बेटा आज्ञा दो मै तेरा घर-बार और भंडार भर दू। अचानक घटी घटना से पंडित इतना घबरा गया कि उससे बोलते ना बना। नतीजा यह हुआ कि लक्ष्मी लौट गई। दो पहर बीत जाने पर लक्ष्मी फिर प्रकट हुई और बोली कि तुम्हें क्या चाहिए अब पंडित और डर गया उसका सारा सपना हिरन हो गया और किसी तरह रात बिताई। सुबह होते ही उसने डरते हुए महाराज से कहा कि दान में मिले इस महल मे पता नही कि भूत है या पिशाच। सारी रात उसने सोने ना दिया म तो बीवी बच्चो समेत बच गया मुझे क्षमा करे मै इस महल मे ना रहूंगा मैं तो बीवी बच्चो सहित भिक्षा मांगकर रह लूंगा मुझसे इस महल मे ना रहा जाएगा।
राजा को भोले पंडित की बातो पर दया आ गई। उसने पंडित को महल की जो कीमत थी वह देकर उसे विदा किया। और शुभ मुहूर्त निकलवाकर महल मे प्रवेश किया।
रात को राजा पलंग पर लेटे हुए कुछ सोच रहे थे कि अचानक लक्ष्मी प्रकट हुई और बोली राजा आप धन्य है आपका धर्म भी धन्य है यह कहकर लक्ष्मी अंतर्धान हो गई। पहर रात बीत जाने पर वह फिर प्रकट हुई और बोली - मै कहंा बरसू? राजा ने कहा यदि बरसना है मेरे पलंग को छोडकर कही भी बरसो उस रात राजा के रातधानी मे सोने की ईंटे बरसी। राजा ने यह मुनादी करवा दी कि जिसके घर जितना सोना है वह उसी का है और किसी को सोना उठाने से मना नही करेगा इस तरह वह नादान पंडित जो अपने ही मुहूर्त को समझ ना पाया वह भी खुशी से सोना समेटने लगौ
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