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राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दल

06 Oct 2006      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

Shyam Narayan Rangaलोकतंत्रात्मक पद्धति दलीय व्यवस्था पर आधारित है। इंग्लैड सहित विश्व के कुछ देशों ने जहाँ द्विदलीय लोकतन्त्रात्मक पद्धति को आपनाया हुआ है वहीं भारत जैसे विश्व के सबसे बडे लोकतन्त्रात्मक में बहुदलीय पद्धति है। भारत, पकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, नेपाल आदि विश्व के ऐसे बहुत से लोकतन्त्रात्मक देश हैं जहाँ बहुदलीय व्यवस्था है। भारत में राष्ट्रीय दल व क्षेत्रीय दल के रुप में दलों का विभाजन भी किया गया है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनत पार्टी, जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल जैसे कई राष्ट्रीय दल है तो तृणमूल कांग्रेस, डी एम के, असम गण परिषद, महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी, हरियाणा विकास पार्टी, अकाली दल, तेलगुदेशम् पार्टी, तमिल मनीला कांग्रेस जैसे कई क्षेत्रीय दल भी आज अपना अस्तित्व बरकरार रखे हुए है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरुरी है कि कई ऐसे राष्ट्रीय दल हैं जो कानूनन राश्ट्रीय दल हैं परन्तु वास्तव में उनकी हैसियत एक क्षेत्रीय दल जितनी है। अत: उन दलों को भी साधारण विवेक की दृष्टि से क्षेत्रीय दल समझें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति क्षेत्रीय स्वार्थों व हितों की पूर्ति हेतु हुई है। वास्तव में क्षेत्र विशेष के लोकप्रीय नेता करते हैं। मगर कई बार तो किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता को पार्टी से निष्कासित कर दिया जाए या अपनी ही पार्टी के नेता से अनबन हो जाए तो अमुक नेता अपने क्षेत्र से अपनी पकड के आधार पर अपने व्यक्तिगत कार्यकर्ता इकट्ठे कर् क्षेत्रीय दलों का निर्माण कर डालते है। इस तरह बने क्षेत्रीय दलों का सबसे अच्छा उदाहरण तृणमूल कांग्रेस, तमिल मनीला कांग्रेस, बीजू जनता दल, हिमाचल विकास कांग्रेस आदि हैं। अत: यह तरीका तो क्षेत्रीय दलों को निर्माण का सर्वाधिक लोकप्रीय तरीका है। वहीं दूसरी तरफ क्षेत्र विशेष के लोकप्रीय नेता, जो अपने क्षेत्र का विकास करना चाहते हैं, वे भी जन हितार्थ क्षेत्र दलों का गठन कर लेते है। उदाहारण के रुप में लें तो छात्र हितों की रक्षा के लिए एक दल आसाम में बना, उस दल ने छात्र हितों के लिए आंदोलन किये और उस दल के नेता लोकप्रीय होते गये और समय ऐस आया कि इस दल ने आसाम में अपनी सरकार बनाई। यह दल है असम गण परिषद।
वर्तमान में इन क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय राजनीति में अहम् स्थान बनता जा रहा है। बडे-बडे राष्ट्रीय दल सरकार बनाने के लिए इन क्षेत्रीय दलों की गुहार करते नजर आते हैं। वर्तमान में चल रही केन्द्रीय सरकार भी इन क्षेत्रीय दलों पर निर्भर है। इससे पहले की संयुक्त मोर्चा सरकार में भी क्षेत्रीय दलों की अहम् भुमिका थी। नरसिम्हा राव के नेतृत्व की कांग्रेस सरकार ने भी अपने पाँच साल इन्हीं क्षेत्रीय दलों के आसरे पूरे किये थे। इस तरह पिछले काफी समय से ये क्षेत्रीय दल केन्द्रीय राजनीति में अपनी महान् भूमिका निभाते चले आ रहे है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्षेत्रीय दलों की राष्ट्रीय राजनीति में यह स्थिति कितनी सार्थक है। हर सिक्के के दो पहलू होते है उसी प्रकार इस प्रश्न के भी दो पहलू हैं व दोनों पहलूओं पर विचार किया जाए तो हो सकता है कि वास्तविक स्थिति प्रकट हो। सर्वप्रथम हम क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय राजनीति में सार्थक पहलू पर गौर करें। क्षेत्रीय दलों के गठन के समय जो उद्देश्य रखे जाते हैं या जिन कारणों से क्षेत्रीय दल में आते हैं वे कारण वास्तव में प्रभावकारी होते है।

 क्षेत्रीय दल के नेता क्षेत्रीय होते है इसी कारण उनमें राष्ट्रीय सोच पनप नही सकती तथा वे सिर्फ अपना हित साधते हैं। उदाहरण के लिए अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता व तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी केंद्रीय सरकार पर भारी दबाव बनाये हुए हैं। जय् ललिता जहाँ द्रमुक सरकार की बर्खास्तगी चाहती है वहीं ममता बेनर्जी बंगाल हित के नाम पर आये दिन सरकार को आडे हाथों लेती रहती है। कभी अकाली दल के नेता अपनी माँगों पर अड जाते हैं। इस तरह केन्द्र सरकार में शामिल प्रत्येक छोटा दल अपना हित सर्वोपरि रखता है व राष्ट्रहित ताक पर अपने हितों पर कुठाराघात होते देख यह दल केन्द्र सरकार कभी भी गिरा सकते हैं। इसके दुष्परिणाम यह होता है कि केन्द्र सरकार अपना अधिकांश समय इन्हीं पर जाया कर देती है व बाद झारखन्ड मुक्ति मोर्चा के नेताओं जैसे कांड् सामने आते हैं। अब हम बिहार या उत्तर प्रदेश में देखें तो वहाँ नाम तो राष्ट्रीय दलों का है परन्तु वास्तव में वहाँ के नेताओं का आधार क्षेत्रीय दलों जितना ही है। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह, काशीराम, मायावती आदि ऐसे नेता हैं जिनकी बिहार या उत्तर प्रदेश की स्थिति आए दिन पत्र-पत्रीकाओं के माद्यम से पता चलती है। परन्तु वहाँ के नेता क्षेत्रीय सोच के कारण उन समस्यओं को हल नहीं कर पा रहे हैं। यही स्थिति पन्जाब में हैं। एक धर्म विशेष से सम्बन्धित दल केन्द्र सरकार में है। इनकी सोच उन अपने व्यक्तियों के प्रति या पन्जाब तक है परन्तु यह दल केन्द्र में है। यहाँ कहने का मतलब यह है कि केन्द्र स्तर पर क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय दलों पर हावी होना देश के लिए अच्छा नहीं हैं। इससे क्षेत्रीय हित तो सध जाएंगे पर राष्ट्रीय हितों की अनदेखी हो जाएगी। इससे राजनीति में भ्रष्टाचार फैलता है। इस समस्या का एक उपाय यह है कि क्षेत्रीय दलों को क्षेत्र विशेष तक सीमित रखा जाए। इन्हें विधानसभा चुनाव लडने की इजाजत ही दी जाए। लोकसभा चुनावों से क्षेत्रीय दलों को दूर रखा जाए। इससे राष्ट्रीय दल शक्तिशाली बनेंगे व राष्ट्र हित सुरक्षित होंगे। क्षेत्रीय दल के नेता अपना काम, अपनी सरकार प्रदेश में बनाकर व अपना मुख्यमन्त्री बनाकर कर सकते हैं। उन्हें ऐसा करने से क्षेत्रीय हित भी संरक्षित होंगे वे राष्ट्रहित भी सर्वोपरि हो जांएगे।क्षेत्रीय दलों का संसद तक पहुंचना एक हद तक काफी अच्छा है क्योंकि इससे स्वस्थ व मजबूत लोकतंत्र का आधार पैदा होता है। क्षेत्र विशेष का नेता अपने क्षेत्र के बारे में ज्यादा जानता है, वह राष्ट्रीय नेता की अपेक्षाकृत जनता के ज्यादा करीब होता है। इसी कारण वह जन आकांक्षाओं व जन भावनाओं को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकता है व जन समस्याओं का सही ढंग से निपटारा करने में सहायक सिद्घ हो सकता है। यही कारण है कि आसाम व जम्मू कश्मीर व अन्य कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें है। इससे कमजोर से कमजोर आदमी की आवाज संसद तक है। शिक्षाविदों का यह भी मानना है कि क्षेत्रीय दलों के संसद तक पहुंचने का अर्थ है कि भारत में लोकतंत्र की जडे काफी गहरी है। क्षेत्रीय दलों के नेता यह भी दलील देते हैं कि क्षेत्र विशेष में उनके जितनी पकड राष्ट्रीय दलों की भी नहीं हैं। उनका कहना है कि क्षेत्रीय हितों की छोटी-छोटी बातों के लिए राष्ट्रीय नेता समय नहीं निकाल सकता क्योंकि वह पूरे देश की सोचता है। क्षेत्रीय दल क्षेत्र विशेष की सोचता है और क्षेत्रीय दल ही अपना समय व श्रम क्षेत्र विशेष में देकर क्षेत्र का विकास कर् सकता है। अत: यह कहना कि क्षेत्रीय दल जन समस्याओं को बेह्तर तरीके से हल कर सकते हैं, गलत नहीं हैं। अब हम सिक्के के दूसरे पहलू की तरफ गौर करें तो पता चलेगा कि पहला पहलू अपनी जगह कितना सही है? वास्तविकता यह है कि क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश राष्ट्र के लिए घातक हो सकता है। क्षेत्रीय दलों के नेता जब सांसद बन जाते है तो वे अपना मूल उद्देश्य भूल जाते हैं व सत्ता प्राप्ति में लग जाते हैं। वे येन केन प्रकरेण सत्ता प्राप्ति में लग जाते हैं। क्षेत्रीय दल के नेताओं की सोच क्षेत्रीय दल के नेता स्वार्थी बन जाते हैं वे अपने क्षेत्र की या अपने दल मात्र दी ही सोच रखते हैं। चूंकि वर्तमान में बन रही सरकारों क्षेत्रीय दलों पर टिकी हैं। अत: इन नेताओं का महत्व बढा हुआ है। ये नेता अपने दल हित व क्षेत्र हित को ताक पर रख देते हैं। क्षेत्रीय दलों के नेता जब सांसद बन जाते है तो वे अपना मूल उद्देश्य भूल जाते हैं व सत्ता प्राप्ति में लग जाते हैं। वे येन केन प्रकरेण सत्ता प्राप्ति में लग जाते हैं। क्षेत्रीय दल के नेताओं की सोच क्षेत्रीय दल के नेता स्वार्थी बन जाते हैं वे अपने क्षेत्र की या अपने दल मात्र दी ही सोच रखते हैं। चूंकि वर्तमान में बन रही सरकारों क्षेत्रीय दलों पर टिकी हैं। अत: इन नेताओं का महत्व बढा हुआ है। ये नेता अपने दल हित व क्षेत्र हित को ताक पर रख देते हैं।

 

Article by :  Shyam Narayan Ranga 




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