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रेगिस्तान में स्वर्ग की यात्राा कराती हवेलियां : एक दास्तान

02 Oct 2006      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

U C Koacherप्रत्येक जगह की अपनी अस्मिता, अपना गौरव व अपनी किस्म सौन्दर्य बोध होता हैं। कला किसी जातीय परम्परा के परिष्कार का नमूना नहीं होती वरन् कला अपने दुदान्त प्रसा चक्षुओं से ज्ञान व सौन्दर्य अनुकृति का एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलते हुए कलाकार अपरिमित आनंद का अनुभव तो करता ही है साथ ही देखने वाले भी उसकी कलात्मकता के कायल होकर अभिभूत हो जाते हैं।


 हवेलियां दिल्ली में भी है, जैसलमेर में भी हैं। बीकानेर की हवेलियों से ज्यादा प्रसिद्ध भी है पर बीकानेर की हवेलियां अपने आप में नायाब हैं। लाल पत्थर में उनका खिला-खिला रूप, उनकी विशिष्ट स्थापत्य कला, उनके पत्थरों की बोलती कोरनी, उनके शानदार दीवान-खाने, उनके खुले व हवादार ऊँची छतों वाले कमरे, उनके बेल-बूंटे, उनकी सजावट, उनकी साळ व बरसाली, उनकी लकडी की सुन्दर छतें सब विलक्षण हैं। उनके तहखाने, उनकी घोडी-मोडा, उनकी मेहराबियां सब बीकानेर के विश्वकर्माओं, उस्तो और चूनगरो की काल्पनिकता कलात्मक और निर्माण कुशलता की गौरवपूर्ण कहानी कहते हैं। ये हवेलियां ज्यादातर शहर के चौकों में स्थित है, कुछ दिल्ली की तरह तंग गलियों में है, कुछ इधर-उधर उखडी अवस्था पडी हैं। कुछ आज भी अपना सीस ऊँचा कियो सीमा ताने खडी हैं पर अधिकांश हवेलियां अपने बुरे दिन गिन रही है, तेजी से नष्ट हो रही है और जर्जर अवस्था में हैं। कुछ में आज भी रिहायश है, कुछ बन्द पडी है और कुछ को उनके प्रवासी मालिक आकर संभालते भी नही हैं।
 रामपुरियों की हवेलियां सबसे प्रसिद्ध हैं। रिखजी बागडी की हवेली सबसे कम जानी जाती है और कुछ छोटी है पर इसकी पत्थर की नक्काशी लाजवाब हैं।  भैरोंदान जी कोठारी की हवेली, पूनम चन्द कोठारी की हवेली, डागों की हवेलीयां, मोहता चौक और मावा पट्टी के आस-पास की हवेलीयां, चांदमल ढ्ढढा की हवेली आदि हवेलियां अपनी अलग रंगत और पहचान रखती हैं। हर हवेली की अपनी दास्तान है, ज्यादातर हवेलियां अकाल के दिनों में काम देने की नीयत से बनाई गई थी। महाराजा गंगासिंह के जमाने में या पिछले सौ-सवा सौ साल में बनी हवेलियां अकाल से लडने का एक तरीके के रूप में सामने आई है पर कई हवेलियां इससे काफी पुरानी हैं। वे कब बनी, किसने बनाई, उसके पीछे किसकी प्रेरणा थी यह सब अब इतिहास के पन्नों में लुप्त हो गया हैं। हवेलियों की महत्ता अब उनके वर्तमान स्वरूप में ही निहित हैं।
 हवेलियां कुछ इस तरह बनाई जाती थी कि गर्मी में ठंडी रहे और सर्दी में गर्म रहे। तहखाने तो खूब ठंडे और अधिकांशतः हवादार होते थे। भरपूर गर्मी में उनमें बैठना, सोना, शतरंज-ताश-चौपड खेलना, बैठकबाजी करना, शर्बत की बहार का आनंद लेना एक अत्यंत आनंददायक दैनिकचर्या थी। तहखानों जिन्हें गुम्हारियें कहते थे, के दरवाजे छोटे होते थे पर अन्दर प्रवेश करते ही मई के माह में भी शिमला की ठंडक मिलती थी।
 हर हवेली में घुसने के लिए प्रवेश द्वारा तक पहुंचने के लिए कुछ सीढया चढनी पडती थी-साधारणतः पाँच से दस। सब प्रवेश द्वार मेहराबदार होते थे जिन पर नक्काशी की हुई होती थी, पत्थर पर भी नक्काशी, लकडी पर नक्काशी। हर हवेली में आंगन होता था जिसे चौक कहा जाता था। आंगन में पहुंचने के लिए बरसाली होती थी और इसी आंगन के चारो तरफ हवेली के निवासियों का जीवन घूमता रहता था। इसी के एक तरफ चौका होता था जिसमें रसोई बनती थी, दूसरी तरफ पीने के पानी की स्थान होती थी। जिसे ’पणिता‘ कहते ह। इसी में मंदिर या पूजा-स्थल होता था जिसे ’मिन्दरी‘ कहा जाता था। उस वक्त बाग-बगीचों की जगह पत्थर और लकडी पर फूल, पत्तियाँ तराशें जाते थ। क्योंकि रेगिस्तान में इतना पानी कहाँ से मिलता कि बाग-बगीचे हवेलियों में विकसित हो सकें। उसके लिए कोटरियों थी जहाँ कुछ हरियाली के दर्शन होते थे। हर हवेली में पानी एकत्रा करने के लिए कुंड होते थे और कोटरियों में तो बडे-बडे कुंड होते थें। उस वक्त पानी बहुमूल्य था और उसे एकत्रिात करने के नायाब और विश्वसनीय तरीके थें। पानी बचाना हर एक का धर्म था और इसका पूरा पालन किया जाता था।
 धीरे-धीरे यह सब जीवन पद्धति समाप्त हो गई, हवेलियाँ तोडी जाने लगी और कंकरीट, लोहा, सीमेंट की इमारतें बदसूरती को बडे-बडे रूपों में परोसने लगी है। प्रकृति के स्वाभाविक स्वरूप की जगह मानव निर्मित यंत्रों ने ले ली है पर न ठंडक है, न वह आनंद, न वह उनमुक्त पारिवारिक संदर्भ। हवेलियों में परिवार समाया रहता था, अब उसका लघू रूप कमरों में बन्द रहता हैं। नक्काशी, सौन्दर्य सृष्टि की जगह मंहगे पत्थरों की भौंडी होड ने ले ली हैं। हवेली कला अन्तिम सांसे गिन रही है। विशिष्टता की जगह एकरूपता आ रही हैं। चकाचौंध को ही सौन्दर्य का पर्याय बना दिया गया हैं। सुविधाएं बढ गई है पर आत्मीयता की खुशबु विलीन हो रही है। ऐसे में पत्थरों पर कोरनी के काव्य की रचना कैसे रचा जाय? १९३६ में प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक एल्डूअस हक्सले ने लिखा था कि हवेलियाँ बीकानेर का गौरव है, ऐसी हवेलियाँ दुनिया में कही नहीं हैं। आज सवाल यह है कि ये गौरवशाली हवेलियाँ कितने दिन सुरक्षित रहेंगी, अपनी आभा बिखेरेंगी। इन्हें बचाया जाना महत्त्वपूर्ण हैं।
 हवेलियाँ करीब एक हजार हैं। इनके ज्यादातर मालिक सुदूर कोलकाता, मुम्बई, नागपुर, चेन्नई आदि जगहों में रहते हैं। ज्यादातर बन्द पडी हैं। उनके मालिकों ने उन्हें बरसों से आकर देखा ही नही हैं। मालिकों की नई पीढी को पता ही नही है कि वे इतनी कलात्मक हवेलियों के वारिस हैं। कई हवेलियों पर उनकी देखभाल करने लिए नियुक्त लोगों ने कब्जा कर रखा है, कुछ पर किरायेदारों ने कुछ पर मालिकों की अनुपस्थिति पाकर नाजायज कब्जा कर लिया गया हैं। उनके चारों तरफ गन्दगी बिखरी हुई है, नालियों में जगह-जगह पानी बह रहा है, सडकें टूट गई है और शानदार हवेलियाँ अपने हाल पर, अपनी बदकिस्मती पर व्यथित है पर अपनी दुर्दशा व्यक्त नहीं कर सकती।
 उनकी तरफ ध्यान आकर्षित करने तथा उनकी हालत सुधारने के लिए हवेली यात्रााओं का आयोजन पर्यटन लेखक संघ ने किया। बीकानेर के कलाप्रेमियों, साहित्यकारो, पुरातत्वेवत्ताओं और बीकानेर के उत्थान में रूचि रखने वाले अनेक लोगों ने हवेली यात्राा के विचार की सराहना की और अपना योगदान किया। कई स्थानों पर यात्राा का स्वागत किया गया, चाय पिलाई गई, नाश्ता कराया गया। अभी तक तीन यात्रााऐं आयोजित हो चुकी ह। यात्रााओं की तरफ केन्द्र सरकार और राज्य सरकार दोनो की नजर हैं। मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे, ने स्वयं इसमें दिलचस्पी दिखाई है और इसकी रिपोर्ट पर्यटन विभाग से मांगी हैं। पर्यटन लेखक संघ ने कोलकाता में बसे बीकानेर वासियों और हवेली मालिकों से सम्फ साधना प्रारंभ किया है ताकि हवेलियों के प्रति उन्हें जागृत किया जाय, उनका महत्त्व बताया जाय, कुछ हवेलियों को खुलवा कर म्यूजियम के रूप में विकसित किया जाय।
 यह भी प्रयत्न किया जा रहा है कि हवेलियों को टृटना, उन्हें तोडकर उनके कलात्मक भागों को बेचना बन्द करवाया जाय। सरकार ने इस बारे में कानून बनाने के लिए भी कोशिश कर रही ह। हर वर्ष करीब दस से पन्द्रह हवेलियाँ टूट रही है, उनके टुकडे विदेशों में बिक रहे हैं और यह अमूल्य धरोहर खत्म की जा रही हैं।
हवेली कला की हवेलियों, विश्वकर्मा वंशजो की कल्पना, सृजनशीलता और कला-धर्मिता की देन हैं। उनमें लाल पत्थर की कोरनी और लकडी की कारीगरी अपनी चरम सीमा तक विकसित हुई। उसमें चूनगर समाज के कारीगरों ने आला गीला कला का महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उस्ता कलाकारों ने उनमें सोने के रंग भरें। सोने की ऐसी कलात्मक सौन्दर्यकरण इतनी प्रचुर मात्रा में दुनिया में आसानी से नहीं मिलेगा। इनके नष्ट होने का अर्थ है बेजोड विरासत का मिट जाना। सात चरणों में होने वाली हवेली यात्राा इसे बचाने का बस एक पक्के इरादे से किया गया एक उल्लेखनीय कदम हैं।
 इसकी सफलता जनता की जागरूकता, मालिकों में अपनी हवेलियों के प्रति उमडें प्रेम, सरकार का सहयोग और मीडिया के लगातार समर्थन पर निर्भर करती हैं। यह सब भविष्य के गर्भ में हैं। अभी तो शुरूआत ही हुई हैं। हवेलियों में जो स्वर्ग बसा हुआ था उसे पुर्नजीवित करना आसान काम नही है खास-तौर से उस देश में जिसमें अपनी विरासत पर सिर्फ शाब्दिक गर्व हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति प्राचीन है, हमारी विरासत विश्व सभ्यता की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है पर हमने उन्हें बचाने, सजाने और स्थायी बनाने की सम्पन्न नहीं हैं। कई बार लगता है कि इसे बचाने की इच्छा ही नहीं हैं। इन धारणाओं को बदलने तथा विरासत बचाने का एक छोटा सा प्रयास हवेली यात्रा भी हैं।

 

उपध्यान चन्द्र कोचर
एडवोकेट
होटल मरूधर हैरिटेज
गंगाशहर रोड, बीकानेर




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