Sunday, 01 November 2020

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पुरुषोत्तम मास में वागड अंचल में ले श्रद्धा का ज्वार चढ रहा है परवान


- कल्पना डिण्डोर (ए.पी.आर.ओ.)

राजस्थान का वागड अंचल धर्म-अध्यात्म और श्रद्धा की त्रिवेणी बहाने वाला वह पुण्य धाम है जहां देवी-देवताओं से लेकर ऋषि-मुनियों और सिद्धांत-महात्माओं ने अपना विहार करने के साथ ही त्याग-तपस्या और साधनाओं का क्षेत्र बनाया। सदियों से विद्यमान इसी पुण्य परम्परा का उत्कर्ष आज भी विभिन्न अवसरों पर देखा जा सकता है।
वागड अंचल में वर्ष भर तीज-त्योहारों, पर्वों और विभिन्न मेलों-मासों आदि के दौरान् धार्मिक अनुष्ठानों और भक्ति भावना से लेकर श्रद्धा और भक्ति का ज्वार लहराता रहा है। वागड क्षेत्रा में इन दिनों चल रहे पवित्रा अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के अन्तर्गत शहरों तथा गांव-गांव में मन्दिरों-घरों में सत्संग, कथावाचन, घाट-स्नान, जप-तप, व्रत-उपवास कर्मकाण्ड आदि धार्मिक कार्य यौवन पर हैं।
अधिक मास में महिलाओं और पुरुषों प्रत्येक दिन अलग-अलग जलाशय व घाटों पर जाकर स्नान आदि कर गंगा मैया को साक्षी मानकर जलाशय की पूजा-अर्चना कर भजन कीर्तन के दौर में जुटी हुई हैं। जिले के प्रमुख जलाशयों पर प्रातःकाल में महिलाओं एवं पुरुषों की भीड उमड रही है और हर कहीं जलाशयों पर मेले का माहौल बना हुआ है। वागड अंचल की परम्परागत मान्यता के अनुसार अधिक मास में महिलाएं एक माह तक एक ही प्रकार के अन्न को या अपनी श्रद्धा भक्ति से निश्चित खाद्य पदार्थ का ग्रहण करने का* व्रत पालन करते हुए हैं। कई लोग अधिक मास में पूरा उपवास रखे हुए हैं।
श्रद्धालुओं द्वारा पुरुषोत्तम मास में पुरुषोत्तम भगवान की प्रसन्नता के लिए दीपदान किया जा रहा है। इसका पुराणों में विशेष फल बताया गया है।
माना जाता है कि इससे तीव्र दारिद्र्य समूल नष्ट हो जाता है। दीपदान के लिए तिलों के तेल से दीपदान तथा ऐश्वर्य पाने के लिए घी का दीप दान करना विशेष फलदायी माना गया है। वागड क्षेत्रा भर में इन दिनों पुरुषोत्तम मास में किए व्रत के उद्यापन का दौर पूरे शबाब पर है। उद्यापन की कई पुरातन परम्पराएं हैं। व्रत के उद्यापन की तिथियों में कृष्ण पक्ष में अष्टमी, नवमी, चौदस श्रेष्ठ तिथियां मानी गई हैं। इन तिथियों में उद्यापन किया जाना अति उत्तम रहता है।
इस पुण्य पुरुषोत्तम मास के उद्यापन विधान के अनुसार प्रातःकाल उठकर समस्त दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर श्रद्धा-शक्ति अनुसार तीस ब्राह्मणों को न्यौता दिया जाता है। यदि सामर्थ्य न हो तो पाँच या सात ब्राह्मणों को न्यौता देते हैं। घर में दोपहर के समय सुन्दर मण्डप बनाकर चारों दिशाओं में पुरुषोत्तम भगवान की मूर्ति रखकर जल कलश में नारियल रखकर पूजा-अर्चना कर ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा करें।
व्रती द्वारा पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष में ब्राह्मणों तथा अपने पूजनीक परिजनों को यथा योग्य परिधानों के दान की परम्परा भी बरकरार है। जो भी दान दिया जाता है उसमें सुख-सौभाग्य एवं जीवनानन्द के प्रतीक भगवान राधा-कृष्ण के श्रीविग्रह की साक्षी में दान प्रदान करने से व्रती परिवार के जीवन में समृद्धि और उल्लास ताजन्दगी बना रहता है ऐसी मान्यता है।
दान में स्त्री-पुरुष को पहनने योग्य वस्त्र, आठ प्रकार के पद और जूतों का जोडा दिया जाता है। पुराणों में कहा गया है कि इस पृथ्वीतल में पुरुषोत्तम के समान कुछ भी नहीं है हजारों जप-तप करने से भी वह फल नहीं मिलता जो पुरुषोत्तम मास के करने से मिलता है। समूचे वागड अंचल में पुरुषोत्तम मास के व्रत-अनुष्ठान और तपस्या के साथ ही इसके उद्यापन का क्रम अपने पूरे यौवन पर है। बांसवाडा और डूंगरपुर जिलों में बेणेश्वर, गवरेश्वर, मोरन, सुन्दनपुर, नीलकण्ठ, कागदी, माही, वनेश्वर नदी, भीमकुण्ड, रामकुण्ड, निचला घण्टाला, अंकलेश्वर, सिद्धनाथ, खडगदा, गलियाकोट, विट्ठलदेव, त्रिपुरा सुन्दरी, छींच  ब्रह्माजी मन्दिर, सिद्धि विनायक, चौबीसों का पाडला स्थित सत्यनारायण मन्दिर, केदारेश्वर, मंगलेश्वर, पाडी रामेश्वर, नन्दनी माता, घोटिया आम्बा, भगोरेश्वर, वनेश्वर, सर्वेश्वर पारसोलिया, घूडी रण्रछोड, कपालेश्वर, गमरेश्वर, भुवनेश्वर, क्षीरेश्वर, सलाखेश्वर, देव सोमनाथ, अरथुना सहित दोनों जिलों के तमाम जलाशयों, मन्दिरों और धर्मधामों पर इन दिनों पुरुषोत्तम मास करने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है।