एक गांव में एक जमींदार था। आपार धन-दौलत और हजारों एकड भूमि उसके पास थी। उसके तीन पुत्र थे। एक दिन जब सुबह उठकर उसने शीशे में अपना चेहरा देखा, तो सफेद बाल देख कर चिंता में पड गया। उसे चिंता सताने लगी कि उसके बाद वह अपनी दौलत का वारिस किसे बनाए। उसने पत्नी से अपनी बात कही। उसकी पत्नी बहुत चतुर थी।
उसने कहा,’आज से छह महीने बाद वह यह बताएगी कि उसका सच्चा वारिस कौन है ?‘
जमींदार निश्चित होकर व्यापार के लिए शहर चला गया। अगले दिन जमींदार का पत्नी ने अपने तीनों बेटों को बुलाकर कहा-’देखो, मैं कुछ दिन के लिए तुम्हारे नाना के घर जा रही हूं। तुम्हारे पिता व्यापार के लिए शहर गए है। उन्हें भी आने में कुछ दिन लगेगें, तब तक तुम्हें मेरी एक चीज संभालकर रखनी होगी।‘
’कहिए, माताजी ! हमारे लिए क्या आज्ञा है। हमें कौन-सी वस्तु संभालकर रखनी है।‘
उसने हर एक पुत्र को दो-दो सेर बीज संभालकर रखने को देते हुए कहा-’बेटा, ये बीज ह। इन्हें संभालकर रखना।‘
तीनों ने अपनी मां से उन्हें सुरक्षित रखने की बात कही। मां निश्चिंत होकर अपनी मां के घर चली गई।
बडे भाई ने बीजों को बेशकीमती समझकर तिजोरी में रख दिया और आश्वस्त हो गया
मझले ने सोचा यदि बीज अलमारी में रखे, तो सड जाएंगे अतः उसने बाजार में बेच दिए। सोचा मां के आने पर पुनः खरीद कर दे दूंगा।
सबसे छोटा भाई बुद्धिमान था। उसने सोचा छह महीने में तो इन्हें बोकर नई फसल, नए बीज प्राप्त किए जा सकते है अतः उसने हल चलवाया और खेतों में बो दिया।
छह महीने बाद जमींदार की पत्नी लौटी और उसने तीनों से अपने द्वारा दिए बीज वापस मांगे। बडा तुरंत गया और तिजोरी खोली। सडे बीजो की दुर्गध से उसका सिर चकरा गया। वह निराश सिर झुकाए मां के पास आकर बोला- ’मां, मैं बहुत शर्मिदा हूं, वे बीज तो सड गए है।‘
मझला भाई बाजार गया और तीन सेर बीज लेकर आया और बोला ’लीजिए माताजी, आपने दो सेर बीज दिए थे, मैं तीन सेर वापस दे रहा हूं।‘
’और तुम्हें जा बीज दिए थे, वे कहां है ?‘ मां ने तीसरे बेटे से पूछा।
उसने नम्रता भरे स्वर में कहा- ’मां, उसके लिए तो आपको खेतो में चलना होगा। मैंने उन्हें खेतों म बो दिया है। फसल खेत में लहलहा रही है। कुछ ही दिनों बाद पककर अनाज तैयार होगा और में आफ बीज लौटा पांऊगा।‘ मां के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
अगले दिन जमींदार भी काफी धन कमाकर लौट आया। उसकी पत्नी ने उससे कहा, ’आपने मुझसे अपना सच्चा वारिस ढूंढने के लिए कहा था।‘
’तो क्या तुम्हें वारिस मिला।‘
’हां।‘
’कौन है वह?‘
’वह है आपका छोटा बेटा।‘ और उसने पूरी कथा सेना दी। जमींदार बहुत खुश हुआ और बोला, ’परिश्रम, बुद्धि तथा दूरदृष्टि ही सम्पति को बढाती है। अपने पुश्तैनी कारोबार को सच्चा वारिस ही बढाता है।‘ और उसने अपने छोटे बेटे को सारे व्यापार का भार सौंप दिया और स्वयं अपनी पत्नी के साथ पर्यटन पर निकल गया।