Home > Article >> Short Stories | सपने का भोज
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15 Jun 2008 Add comment Mail
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तीनों भाइयों ने उसे गौर से देखा और यकीन होने पर हि चौधरी को नींद आ गई है वे भी बिस्तर लगाकर से गए। उनके सोते ही चौधरी दबे पांव उठा और सारी खीर चट कर गया। फिर वह अपने बिस्तर पर आया और चादर तानकर सो गया। अधिक खाने से उसके अंग-अंग में आलस आ रहा था। पलकें भारी हो रही थी। लेटते ही उसे नींदस आ गई। सुबह तीनों भाई उठे और बातें करने लगे। चौधरी अभी गाढी नींद में सोया था। उठकर वह करता भी क्या। वे एक-दूसरे से पूछने लगे तुम्हें कैसा सपना आया? एक भाई बोला- मुझे सपना आया कि मैं अजमेर में हूं। मै वहां के राजा दरबार में भी गया। दरबार कितना सुंदर थां फिर उसने दूसरे से अपना-अपना सुनाने को कहा। दूसरा भाई कहने लगा- मैं जयपुर के दरबार में गया। वहां मैंने राजा को भी देखा। इस बीच चौधरी जाग गया था और उनकी बातें सुन रहा था। तीसरा भाई बोला- अब मैं क्या कहूं। मैं चलते-चलते दिल्ली पहुंच गया। वहां मैंने बादशाह को देखा। तीनों भाई अपने सपने सुना चुके तो चौधरी कराहने लगा- आह! ऊह! आह! हर आह ऊह के साथ वह कभी इस करवट होता, कभी उस करवट, मानो कोई सपना देख रहा हो। ओ चौधरी, तू उठता है कि नहीं? मुझे परेशान मत करो! डसने कराहते हुए कहा। बता तुमने क्या सपना देखा? भाइयो, कुछ मत पूछो! एक लंबा-तगडा आदमी मेरे पास आया। उसने मुझे बहुत मारा। अभी भी मेरा जोड-जोड दर्द कर रहा है- उसने मुझसे कहा-यह खीर खा! च्ल शुरू हो जा! पीछे कुछ नही बचना चाहिए। मैं पूरी खीर खा गया तो उसने मुझे फिर मारा। मार-मार के भुरता बना दिया। उल्लू,हम तेरे पास ही सो रहे थे, तूने हमें जगाया क्यों नहीं? हम तुझे बचा लेते। तीनों भाइयों ने एक राय होकर कहा। चौधरी ने कहा-भाइयों, मैं तुम्हें कैसे जगाता! एक अजमेर गया हुआ था, दूसरा जयपुर ओर तीसरा बादशाह को देखने ठेठ दिल्ली। मैं बहुत चिल्लाया, बहुत आवाजें दी, पर तुम कैसे सुनते! तुम यहां थे भी तो नही!
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