Friday, 25 September 2020
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व्यंग्य: मिस्ड कॉल


आपको वो बीते दिन तो याद ही होंगे जब मोबाइल फोन का हमारे जीवन का अभिन्न अंग बना था। लैंडलाइन फोन के सहारे गुजर-बसर करनेवाले हम भोले और भाले जीवों के नीरस होते जा रहे रहे जीवन में एक नई अनुभूति का अहसास करवाने आया था मोबाइल फोन और उसके साथ ही साथ आ धमकी थी मिस्ड कॉल। शुरूआती दौर में आउट-गोइंग व इनकमिंग के बहुत अधिक दाम लगते थे। इसलिए शान दिखाने के चक्कर में मोबाइल फोन मध्यवर्गीय भारतीय मानुष की जेब ढीली कर डालता था, लेकिन हम भारतीय  तो ठहरे हर मुश्किल का हल निकालने में सिद्धहस्त। सो इस समस्या को भी दूर करने में हमने अधिक समय नहीं लगाया। अब लोग एक दूसरे से बतियाने के लिए मिस्ड कॉल का प्रयोग करने लगे। उधर से मिस्ड कॉल आती और इधर से सस्ते लैंडलाइन का सदुपयोग होना आरम्भ हो जाता। प्रेमी और प्रेमिकाओं की तो लव लाइफ मिस्ड कॉल से निकल पड़ी। मिस्ड कॉल ने प्रेम के पंछियों और मोबाइल कंपनियों का भाग्य ही बदल डाला। 

A Satire on Miss Call written by Sumit Pratap Singh Tomarहालाँकि मिस्ड कॉल का बाकी समाज को भी बहुत लाभ मिला। सड़कों पर अवैध रूप से विराजमान रेहड़ी-पटरी वाले मिस्ड कॉल मिलते ही अपना सामान-सट्टा लेकर रफू-चक्कर हो जाते और नगर निगम वाले बचे हुए नाममात्र सामान से ही वजू करने को विवश हो जाते। चोरों, सटोरियों और उन जैसे अन्य भले मानुषों के लिए मिस्ड कॉल  वरदान जैसा कार्य करती थी। जैसे ही उनपर पुलिसिया धावे का अंदेशा होता, तभी कहीं से मिस्ड कॉल आ जाती और वे तथाकथित भले मानुष झट से जाने कहाँ अदृश्य हो जाते और बेचारे पुलिसवालों का हाल साँप के गुज़र जाने पर लकीर पीटते रह जानेवाला हो जाता।
समय बदला टेलिकॉम कंपनियों की आपसी प्रतिद्वंदिता ने इनकमिंग कॉल मुफ्त करवा डाली और आउटगोइंग कॉल भी पहले के मुकाबले काफी सस्ती हो गई, लेकिन मिस्ड कॉल का जलवा अभी बरक़रार है। हम पर तो इसकी विशेष तौर से कृपा रहती है। दोस्त, यार और रिश्तेदार सभी मिस्ड कॉल नामक प्रेम हमें अक्सर प्रदान करते रहते हैं और हम उनके मिस्ड कॉल रुपी प्रेम का खामियाजा आउटगोइंग कॉल कर-करके भरते रहते हैं। एक बार किसी काम व्यस्त थे, कि एक दोस्त की मिस्ड कॉल आ गई। जब हमने उसे कॉल किया तो खींसें निपोरते हुए बोला, "यार अब क्या बताएँ असल में महीने का आखिरी दिन है न, इसीलिए मोबाइल रिचार्ज नहीं करवा पाया सो मिस्ड कॉल करनी पड़ी"। मन तो हुआ कि उस दुष्ट से पूछ लें कि यहाँ हमारा क्या महीने का पहला दिन है? इस दिन हमारा भी महीने का आखिरी दिन ही होता है और इस रोज हमारे वेतन का भी लगभग राम नाम सत्य हो चुका होता है। पर आदत से मजबूर जो ठहरे। माँ-बाप ने बचपन से ऐसी आदत डाल रखी है, कि किसी का दिल नहीं दुखाया जाता चाहे बेशक दूसरा हमारे दिल हमारे दिल के हजार टुकड़े करके चला जाए। फिर यह सोचते हैं कि कभी वो भी दिन थे जब मिस्ड कॉल की प्रतीक्षा में हमारे पल कितनी बेचैनी और इंतज़ार में बीता करते थे। इसलिए मन मसोस कर इस मिस्ड कॉल नामक विपदा को झेलते रहते हैं। ये लो जी फिर से ससुरी मिस्ड कॉल आ गई। चलिए लगता है कि किसी गरीब ने इस तथाकथित अमीर को याद फ़रमाया है।