बीकानेर की इस धरती को इसका गर्व है कि यहां क्रान्तिकारी कॉ. शौकत उस्मानी जैसे क्रान्तिकारी पुरूष ने जन्म लिया। मनुष्य की पहचान उसके कर्मों से होती है और इस कसौटी पर शौकत उस्मानी एक असाधरण और साथ ही उद्देश्यपूर्ण व्यक्ति सिद्ध होते हैं। वे अडिग स्वतंत्रता सेनानी, सतत् संघर्षशील, अक्टूबर क्रान्ति को बचाने वालों में अग्रिम पंक्ति के योद्धा, सर्वहारा-चिंतन के दार्शनिक और हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार थे। जिस उपनिवेशवाद में कानून की शह पर ही हर जुल्म पलता था, उसे नेस्तानाबूद करने वालों में थे शौकत उस्मानी।
शौकत उस्मानी का जन्म बीकानेर के उस्ता परिवार में दिनांक २० दिसम्बर सन् १९०१ को हुआ। बचपन में दादी ने १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां सुनाई। उन दर्दनाक घटनाओं पर दादी खास जोर दिया करती थी, जिनमें अंग्रेजी हुकूमत द्वारा हिन्दुस्तानियों पर जालिमाना अत्याचार किए गए थे। यहीं से उस होनहार बच्चे के दिल में देशप्रेम की भावना पैदा हुई, फिर डॉ. संपूर्णानंद ने, जो उस समय दरबार हाई स्कूल के हैडमास्टर थे-उन भावनाओं को ओर गहरा कर दिया। बाद में उनकी पढाई तत्कालीन डूंगर मेमोरियल कॉलेजियट स्कूल में हुई।
छात्र जीवन में ही उस्मानी को सन् १९७१ की महान अक्टूबर क्रान्ति और सन् १९१९ के जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने पूरी तरह उद्वेलित कर दिया था।
दूसरे दशक के अन्तिम चरण में खिलाफत आन्दोलन की लहर ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर भी अपना असर डाला। ३६००० मुसलमान इसमें कूद पडे। अब उसका उपयोग जंग-ए-आजादी के लिए भी किया जाने लगा। चूंकि खिलाफतियों का स्वागत
काबुली अमीर करते थे इसलिए यहां के नौजवान अमीर के आमंत्रण का लाभ उठाने, कुछ बाहरी दुनिया को देखने समझने की लालसा से भी जत्थों में निकल पडे। ऐसे ही एक जत्थे में ७ मई १९२० ई. को उभरता हुआ जवान शौकत उस्मानी वेश बदल कर अपना घर छोड कोटगेट के रास्ते से चल दिया।
अफगानिस्तान पहुंचने पर जत्थेदारों का काफिला वहां से रवाना हुआ और बर्फीले पहाडों के रास्ते की मुसीबतों का और राहजनों के आतंक का मुकाबला करते हुए सोवियत संघ की सरहद में दाखिल होने में कामयाब हुआ। किन्तु ’किलीफ‘ से ’केरकी‘ की ओर रवाना हुए तो रास्ते में तुर्कमानों ने इन लोगों को कैद कर लिया और रात को जानवरों के बाडे में बन्द कर दिया। फिर दूसरे दिन सुबह से शाम के पांच बजे तक भूखे प्यासे पच्चीस मील पैदल दौडाने के बाद जबकि वे खुद खच्चरों पर सवार थे, एक अस्तबल में बंद कर दिया। उसके बाद तुर्कमानी बुजुर्गों की एक बैठक हुई जिसमें पहले तो इन्हे मार डालने का प्रस्ताव हुआ, मगर बाद में इन्हें गुलाम बनाने पर सब सहमत हो गए। उन्हें कैद कर लिया गया। हथकडी और बेडी तो उनके चौबीसों घंटे पडी ही रहती थी। रात को एक बेडी निकाल दी जाती है और दूसरी पहना दी जाती थी जिससे घण्टीदार जंजीर का काम निकलता था। ये लोग जरा भी हिले नहीं कि आवाज पैदा हो जाया करती थी। इन्हें आजादी तब मिली, जब तुर्कमानों के गांव पर रूसी क्रांतिकारियों के हमले का खतरा सिर पर पंडराने लगा।
आजाद होने के बाद शौकत उस्मानी वाला काफिला ’केरकी‘ पहुंचा। वहां इसे फौजी बैरकों में ठहराया गया। ’केरकी‘ पर जब क्रान्ति विरोधियों ने हमला कर दिया तो इस काफिले के ३६ भारतियों ने लाल सेना में भर्ती होकर ’केरकी‘ शहर का अमू दरया की ओर से डिफेन्स किया। शत्रु सेना के ३००० जवानों को ३६ भारतीयों ने पीछे खदेड दिया।
सन् १९२० ई. में ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नींव डालने में कॉ. शौकत उस्मानी का प्रमुख हाथ था। इस इकाई का रजिस्ट्रेशन ७ नवम्बर को अक्टूबर क्रांति दिवस पर हुआ। सोवियत संघ में कॉ. शौकत उस्मानी स्टालिन और बुखारिन के संफ में आए तथा लेनिन से भी उनका संफ हुआ। ताशकंद में उस्मानी को इन्डस्की होम (इंडिया हाउस) में ठहराया गया और यहीं से सोवियत जनता के साथ इनके संपर्को का सिलसिला शुरू हुआ।
उन्होंने सन् १९२१ में मास्को छोडा और ईरान के रास्ते जनवरी १९२२ में भारत पहुंचे। भारत में भूमिगत रहकर मजदूरों, छात्रों और सैनिकों में काम किया। दिनांक ९ मई १९२३ को-’कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र कांड केस‘ में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तब से लेकर दिनांक २६ अगस्त १९२७ तक वे जेल में रहे। इस केस के बचाव पक्ष का संचालन श्री गणेशशंकर विद्यार्थी और श्री मोतीलाल नेहरू ने किया। ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी सहयोग किया। रिहाई के बाद वे फिर कम्युनिस्ट पार्टी के काम में जुट गए। उन्हें सन् १९२७ में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) सम्मेलन की स्वागत समिति का उपाध्यक्ष बनाया गया जबकि गणेशशंकर विद्यार्थी अध्यक्ष थे।
कानपुर में उस्मानी का परिचय हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी संगठन के साथियों से हुआ और इसके बाद ही भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विजय कुमार सिन्हा, बटुकेश्वर दत्त तथा अन्य कई साथियों के साथ संफ हुआ। कुछ समय बाद एच. आर. ए. ने अपने नये नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एच. एस. आ. ए.) से अपना मामला पेश करने के लिए शौकत उस्मानी को सन् १९२८ में कामिन्टर्न की कान्फ्रेस में भाग लेने मास्को भेजा। उन्हें इस कान्फ्रेस में अध्यक्ष मंडल में चुना गया। इस बार वे फिर स्टालिन, बुखरिन, मैनुलस्की, कलारा जेटकिन आदि नेताओं से मिले। वहां से पारसी का रूप धारण कर वे भारत लौटे और कलकत्ता में सन् १९२८ में प्रकट
हुए। वहंा से उन्हें लाहौर भेजा गया, किन्तु कॉ. मजीद को आशंका थी कि का. उस्मानी को गिरफ्तार कर लिया जायेगा। अगर ऐसा हुआ तो एच. एस. आर. ए. और कम्युनिस्टों का संबंध जाहिर हो जायेगा। सन् १९२९ की २० मार्च को ’मेरठ षड्यंत्र केस‘ में उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। इधर कोर्ट में केस चल रहा था उधर ब्रिटिश मजदूरों ने उस्मानी को ब्रिटिश पार्लियामेंट के लिए दो बार अपना उम्मीदवार चुना जिसमें एक बार तो सर जॉन साइमन के खिलाफ उनकी उम्मीदवारी थी।
’मेरठ षड्यंत्र केस‘ में बचाव पक्ष का संचालन मोतीलाल नेहरू और डॉ. अंसारी ने किया। एक जुलाई सन् १९३५ को उस्मानी को रिहा किया गया। आखिरी बार १४ जुलाई सन् १९४० से ७ जनवरी १९४५ तक डिफेन्स ऑफ इंडिया एक्ट जेल में रहे। सन् १९४५ से सन् १९४८ तक बंबई में नेशनल सीफ्रेयर यूनियन और मुस्लिम प्रोनशनल कांग्रेस के जनरल सैक्रेटरी रहे। ८ साल तक वे लंदन में भी रहे और १९६४ से १९७४ तक काहिरा (मिस्र) ’अलफतह‘ (अंग्रेजी पत्र) में काम करते रहें, वहीं पर ’इजिपशियन गजट‘ के संपादक मंडल के सदस्य और फ्री प्रेस जनरल (बंबई) रेडियन्स (दिल्ली कम्प्लैक्स (कलकत्ता) के संवाददाता के रूप में काम किया।
२६ फरवरी १९७८ को ई. की रात को भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सृदृढ सेनानी, सर्वहारा की शोषण-मुक्ति हेतु जूझने वाला महान क्रांतिकारी, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चिंतक और समाजकंटकों पर मर्मातक आघात करने वाला व्यंग्यकार सदा सदा के लिए सो गया।
’’शहीदों की चिताओं पर
लगेगें हर वर्ष मेले
वतन पर मिटने वालों का
बाकी यहीं निशां होगा’’
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