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02 December 2008
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14
Aug
श्री दुर्गा नवरात्र व्रत

विधिः इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई विशेष नियम नही । प्रातः काल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रो  में दुंर्गाजी का ध्यान करके यह कथा पढनी चाहीए । कन्याओ के लिये यह व्रत विशेष फलदायक है । श्री जगदम्बा की कृपा से सब विघ्न दुर होते है कथा के अन्त में बारम्बार ”दुर्गा माता तेरी सदा जय हो “ का उच्चारण करें ।
कथाः बृहस्पति जी बोले- हे ब्रह्या जी! आप अत्यन्त बुद्धिमान, सर्वशास्त्र और चारों वेदो को जानने वालो में श्रेष्ठ हो । हे प्रभु! कृपा कर मेरा वचन सुनो । चैत्र, आश्विन, माघ और आषाढ मास के शुक्लपक्ष मे नवरात्र का व्र्रत और उत्सव क्यो किया जाता है ? हे भगवान्! इस व्रत का फल क्या है? किसी प्रकार करना उचित है? और पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहो । बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्या जी कहने लगे कि हे बृहस्पति जी ! प्राणियो का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया । जो मनोरथपूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सुर्य और नारायण का ध्यान करते है, वे मनुष्य धन्य है यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओ को पूर्ण करने वाला है । इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र, विद्या चाहने वाले को विद्या, धन चाहने वाल को धन, सुख चाहने वाल को सुख मिल सकता है । इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाते है और कारागार पडा हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है मनुष्य की तमाम विपतियाँ दूर हो जाती है और उसके घर में सम्पुर्ण सम्पतियाँ आकर उपस्थित हो जाती है । बन्ध्या और काक बन्ध्या के इस व्रत के करने से पुत्र हो जाता है समस्त पापो को दूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन-सा मनोरथ है जो सिद्ध नही हो सकता है । जो मनुष्य इस अलभ्य मनुष्य देह पाकर भी नवरात्र का व्रत नही करता है वह माता पिता से हीन हो जाता है अर्थात् उसके माता पिता मर जाते है और वह अनेक दुःखो को भोगता है उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंगहीन हो जाता है उसके सन्तानोत्पति नही होती है इस प्रकार वह मुर्ख अनेक दुःख भोगता है । इस व्रत को नही करने वाला निर्दयी मनुष्य धन और धान्य से रहित हो भुख और प्यास के मारे पृथ्वी पर घुमता रहता है । और गूँगा हो जाता है । जो सुहागिन स्त्री भूल से इस व्रत को नही करती है वह पति से हीन होकर नाना प्रकार के दुःखो को भोगती है । यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और उस दिन बान्धवो सहित नवरात्र व्रत की कथा श्रवण करे । हे बृहस्पते! जिसने पहले इस व्रत का महाव्रत का किया उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हे सुनाता हूँ तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्या जी के वचन सुंनकर बृहस्पति जी बोले- हे ब्राह्यण! मनुष्यो को कल्याण करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो, मैं सावधान होकर सुन रहा हूँ। आपकी शरण आए हुए मुझ पर कृपा करो । ब्रह्या जी बोले- पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्यण रहता था । वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सम्पुर्ण सद्गुणो से युक्त मानो ब्रह्या की सबसे पहली रचना हो ऐसी यथार्थ नाम वाली सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर कन्या पैदा हुई । वह कन्या सुमति अपने घर के बालकपन में अपनी सहेलियो के साथ क्रीडा करती हुई इस प्रकार बढने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कला बढती है उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम किया करता है । उस समय वह भी नियम से वहाँ उपस्थित होती थी । एक दिन वह समति अपनी साखियो के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नही हुई । उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देंखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नही किया, इस कारण मै किसी कुष्ठी और दरिद्र मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूँगा इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बडा  दुःख हुआ और पिता से कहने लगी कि हे पिताजी! मैं आपकी कन्या हूँ। मै आफ सब तरह से आधीन हूँ जैसी आप की इच्छा हो वैसा ही करो  । रोगी, कुष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी तुम्हारी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हो । होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है, मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है । मनुष्य न जाने कितने मनोरथो का चिन्तन कर है पर होता है वही है जो भाग्य विधाता नही लिखा है । जो जैसा करता है उसको फल भी उस कर्म के अनुसार ही मिलता है, क्योकि कर्म करना मनुष्य के आधीन है । पर फल देव के आधीन है जैसे अंग्नि में पडे हुए तृणादी उसको अधिक प्रदीप्त कर देते है उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता के कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्यण को अधिक क्रोध आया । तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी कें साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ-जाओ जल्दी जाओ अपने कर्म का फल भोगो । देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकर क्या करती है? इस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनो को सुनकर सुमति अपने मन में विचार करने लगी कि-अहो! मेरा बडा दुर्भाग्य है जिसमें मुझे ऐसा पति मिला । इस तरह अपने विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयानक वन में कुशायुक्त उस स्थान पर उन्होने वह रात बडे कष्ट से व्यतीत की । उस गरीब बालिका कि ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति ने कहले लगे की हे दीन ब्रह्याणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम जो चाहो वरदान माँग सकती हो । मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल  देने वाली हूँ इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्रह्याणी कहने लगी कि आप कौन है जो मुझ पर प्रसन्न हुई हो, यह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीनदासी को कृतार्थ करो । ऐसा ब्राह्याणी का वचन सुनकर देवी कहने लगी की मैं आदि शक्ति हूँ और मैं ही ब्रह्या, विद्या और सरस्वती हूँ । मै प्रसन्न होने पर प्राणियो का दुःख दूर तक उनको सुख प्रदान करती हूँ । हे ब्राह्यणी! मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूँ । तुम्हारी पुर्व जन्म का वृतान्त सुनाती हूँ  सुनो! तु पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और पतिव्रता थी । एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की चोरी करने के कारण तुम दोनो को सिपाहियो ने पकड लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया । उन लोगो ने तेरे और तेरे पति को भोजन भी कुछ नही दिया । इस प्रकार नवरात्र के दिनो में तुमने न तो कुछ खाया और न ही जल पिया इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया । हे ब्रह्याणी! उन दिनो में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हे मनोवांछित वस्तु दे रही हूँ तुम्हारी जो इच्छा हो सा माँगो इस प्रकार दुर्गा के कहे हुए वचन सुनकर ब्राह्यणी बोली की अगर आप मुझ पर प्रसन्न है तो हे दुर्गे! आपको प्रणाम करती हूँ। कृपा करके मेरे पति के कोढ को दूर करो । देवी कहने लगी कि उन दिना में जो तुमने व्रत किया था उस व्रत के एक दिन का पुण्य अपने पति के कोढ को दूर होने के लिए अर्पण करो मेरे प्रभाव से    तेरा कोढ रहीत और सोने के सामान शरीर वाला हो जायेगा । ब्रह्या जी बोले इस प्रकार देवी का वचन सुनकर वह ब्रह्याणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से ठीक है, ऐसे बोली । तब तक उसके पति का शरीर भगवती की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया जिसकी कान्ति के सामने चन्द्रमा की कान्ति भी क्षीण हो जाती  वह ब्राह्याणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति पराक्रमी वाली समझकर स्तुति करने लगी कि हे दुर्गे! आप दुर्गत को दुर करने वाली तीनो जगत् का सन्ताप करने वाली समस्त दुःखो को दूर करने वाली रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली प्रसन्न होने पर मनवांछीत वस्तु को देने वाली और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो तुम ही सारे जगत् की माता और पिता हो । हे अम्बें! मुझ अपराध रहित अबला की मेरे पिता ने कुष्ठा के साथ विवाह कर मुझे घर से निकाल दिया । उसकी निकाली गई पृथ्वी पर घूमने लगी । आपने ही मेरा इस आपति रूपी समुद्र से उद्धार किया है हे देवी! आपको को प्रणाम करती हूँ । इसी प्रकार उस सुमति ने मन से देवी की  बहुत स्तुति की, उससे की हुई स्तुति सुनकर देवी को बहुत सन्तोष हुआ और ब्राह्यणी से कहने लगी कि हे ब्राह्यणी! तुम्हारे उदालय नाम का एक अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्दि्रय पुत्र शीघ्र ही होगा । ऐसे कहकर वह देवी उस ब्राह्यणी से फिर कहने लगी कि हे ब्राह्यणी और जो कुछ तेरी इच्छा हो वही मनवांछित वस्तु माँग सकती है । ऐसा भगवती दुर्गा का वचन सुनकर सुमति बोली कि हे भगवान दुर्गे! अगर आप मेरे ऊपर प्रसन्न है तो कृपा कर मुझे नवरात्रि विधि बताइए। हे दयावती! जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से प्रसन्न होती है । उस विधि और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन करे इस प्रकार ब्राह्यणी के वचन सुनकर दुर्गा कहने लगी कि हे ब्राह्यणी ! मैं तुम्हारी लिए सम्पूर्ण पापो को दूर करने वाली नवरात्र व्रत विधि को बतलाती है जिसको सुनने से तमाम पापो से छुटकर मोक्ष की प्राप्ती हो जाती है आश्विन मास के शुक्लपक्ष कि प्रतिपद्रा से लेकर नौ दिन तक विधि पूर्वक व्रत करे । यदि दिन भर का व्रत न कर सके तो एक समय का भोजन करें । पढे-लिखे ब्राह्यणो से पुछकर घट स्थापना कर और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सीचे । महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती मुर्तियाँ बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पो को अर्ध्य देवें । बिजौरा के फूल से अर्ध्य देने से रूप की प्राप्ती होती है जायफल से कीर्ति, दाख से कार्य कि सिद्धि होती है आँवले से सुख और केले से भूषण की प्राप्ती होती है इस प्रकार फलो से देखकर यथा विधि हवन करें । खांड, घी, गेंहूँ, शहद, जौ, तिल, बिम्ब, नारियल , दाख और कदम्ब, इनसे हवन करे । गेहूँ होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ती होती है । खीर व चम्पा के पुष्पो से धन और पत्तो से तेज और सुख की प्राप्ती होती है । आँवले से  किर्ति और केले से   पुत्र प्राप्त होता है कमल से राज सम्मान और दाखो से सुख सम्पति कि प्राप्ती होती है खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा फलो से होम करने वाले को मनवाछित वस्तु की प्राप्ती होती है व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता से प्रणाम करने वाले और यज्ञ की सिद्धि के लिये उसे दक्षिणा दे । इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते है इसमें तनिक भी संयश नही है । इन नौ दिनो में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोडो गुना मिलता है इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेघ यज्ञा का फल मिलता है । हे ब्रह्याणी! इस सम्पूर्ण कामनाओ को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मन्दिर अथवा घर मे ही विधि के अनुसार करें । ब्रह्या जी बोले कि हे बृहस्पति! इस प्रकार ब्राह्याणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अर्न्तध्यान हो गई । जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्ति पूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में दुलर्भ मोक्ष की प्राप्ती होता है । हे बृहस्पते! यह दुलर्भ व्रत का माहाम्त्य मैने तुम्हारे लिए बतलाया गया ऐसा ब्रह्या जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी आन्नद के कारण रोमांचित हो गए और ब्रह्या जी से कहने लगे- हे ब्रह्या जी! आपने मुझ पर अति कृपा की जो अमृत के समान इस नवरात्रि व्रत का माहाम्त्य सुनाया । ह प्रभो! आफ बिना और कौन इस माहात्म्य सुनाया ? ऐसे बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्या जी बोले कि हे बृहस्पते! तुमने सब प्राणियो का हित करने वाले इस अलौकिक व्रत को पूछा है इसलिए तुम धन्य हो । यह भगवती शक्ति सम्पुर्ण लोगो का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव से कौन जान सकता है ।




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