कहते है कभी पशु-पक्षी भी बोलते थे। मनुष्य की जबान में बातें करते थे। अपने सुख-दुःख भी बांटते थे। उन्हीं दिनों का एक किस्सा है।
एक था किसान। वह बडा मेहनतकश था। परिवार में पत्नी और दो छोटे-छोटे बच्चे थे। किसान-परिवार आराम से अपने दिन बिता रहा था। पशु-पक्षी भी उसके परिवार का हिस्सा थे। इस परिवार के सदस्य थे- कुत्ता, तोता, गाय और दो बैल। शाम को किसान चौपाल पर गांव के अन्य बच्चों के साथ धमाचौकडी मचाते। पत्नी अन्य स्त्रियों के साथ बैठकर गप-शप करती। और किसान के ये पालतू जीव भी बैठकर बतियाते थे। उनकी बातचीत थे। उनकी बातचीत का मुख्य मुद्धा पा्रयः किसान ही रहता। वे सभी उसकी प्रशंसा में ही बातें करते। ’भई, बडा भला है हमारा मालिक।‘ ’हमारा बडा खयाल रखता है। प्यार से रखता है हमें।‘ तोता कहता। गाय कहती। कुत्ता भी मालिक की प्रशंसा में दुम हिलाता। बैल कहते, ’सबको ऐसा ही मालिक देना भोले शंकर !‘
किसान सामाजिक प्राणी भी था। इधर खेत में बहुत काम बाकी था उधर उसे दूसरे गांव में अपने बीमार चाचा को देखने जाना था। सो उसने तय किया दो दिन का काम एक ही दिन में निपट जाए तो अच्छा। सुबह हुई। किसान ने बैल खोले और चल दिया खेत पर, जोत दिया उन्हें। बेल खुशी-खुशी खेत जोतने लगे।
उस दिन दोपहर का सूरज भी पता नहीं किस बात पर गुस्से में था। उसने आग बरसाना शुरू कर दिया। बैलों का हलब सूख गया। एक बैल बोला,’मालिक, प्यास लगी है। दूसरे ने समर्थन किया,’हां मालिक, पानी पिला दो।‘
’बस थोडी देर में। एक हलाई पूरी हो जाए।‘ किसान ने प्यार से जवाब दिया।
बैल मान गए। वे अपने काम में लगे रहे। काफी देर हो गई। उन्होंने फिर अनुनय की, ’मालिक पानी पिला दो। बहुत तेज प्यास लगी है।‘
’हां हां, बस जरा देर की ही बात है। फिर पी लेना।‘ बेल चुप हो गा। थोडा समय और बीता।
एक बैल ने कहा, ’भाई, आज मालिक को भी क्या सूझी है, जो सुबह से हमें जोत रखा है।‘
’मैं भी समझ नहीं पा रहा हूं।‘ दूसरे ने कहा, ’एक बार और कहते है।‘ इस बार दोनों एक साथ बोले, ’मालिक, हमें बहुत तेज प्यास लगी है। पानी पिला दो फिर चाहे देर शाम तक काम में जोते रखना।‘
उस दिन शायद किसान भी जिद ठाने हुए था। बोला, ’देखो, अब जरा देर और रूक जाओ। फिर हम तीनों पानी पिएंगे, भोजन भी करेंगे और आराम भी।‘
बैल फिर चुपचाप काम में लग गए। प्यास की मार और सूरज देवता का क्रोध सहते रहे। और फिर जब उनका प्यास से बुरा हाल हो गया तो बोले। लेकिन इस बार पानी और प्यास का जिक्र तक नहीं किया। बस यही कहा, ’लो मालिक, अब हम खामोश हो जाते है।
हम तुम्हारे सेवक है। हमें तुम्हारी सेवा ही करनी है। और जो सेवक होता है, वह खुद अपनी इच्छा नहीं बता पाता। उसका काम है मालिक की आज्ञा का पालन करना। और वह हम आखिरी सांस तक करते रहेंगे।‘
कहते है, बैल तभी से चुप है। आज भी खामोशी से मेहनत करते है। मालिक की इच्छा हो तेा पानी मिले। मालिक का रहम हो तो भोजन मिले। मालिक की दया-दृष्टि हो तो थोडा विश्राम मिले। वरना जुते रहो। जुटे रहो। जुटे रहो यही उनके जीवन का मूलमंत्र है।