पुराने जमाने की बात है। एक आदमी सब दिशाओं में प्रणाम कर रहा था। साधना की मुद्रा मानी जाती है प्रणामी मुद्रा। उसने छहों दिशाओं केा प्रणाम किया।एक जिज्ञासु साधक ने उससे पूछा-यह क्या कर रहे हो। मैं सब दिशाओं को नमस्कार कर रहा हूं। उसने जवाब दिया। यह हमारे धर्म का विधान है। किसलिए करते हो जिज्ञासु ने पूछा। यह तो मुझे पता नही हैं। जिज्ञासु ने बात को आगे बढाया-तुम अपने पडोसियों के साथ कैंसा व्यवहार करते हो? कुछ लोग अपने नौकरों के साथ बहुत क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते है। तुम उनके साथ कूद व्यवहार तो नही करते? कभी अच्छा व्यवहार करता हूं और कभी क्रूर व्यवहार भी कर लेता हूं। प्रणाम करने वाले आदमी ने कहा। अपने गुरूजनों का सम्मान करते हो? कभी करता हूं और कभी नहीं करता। मित्रों के साथ लडाई करते हो? कभी-कभी लडाई भी कर लेता हूं। कोरा दिशाओं को नमस्कार से क्या होगा? दिशाओं को नमस्कार करने का रहस्य क्या है? पहले इसे समझों जिज्ञासु ने जवाब दिया।
आप कृपाकर मुझे भी इसका रहस्य को जानते है? हां। क्या आप कृपाकर मुझे भी इसका रहस्य बताएंगे? कहा-पूर्व दिशा को नमस्कार करने का अर्थ हैं- अपने पूर्वजों का सम्मान करना। पश्चिम दिशा को नमस्कार करने का अर्थ है- अपने अनुगामियों का सम्मान करना। दक्षिण दिशा को नमस्कार करने का अर्थ है- अपने गुरू के आदेशों की पालन करना। गुरू को दक्षिण बनाना यानी अपने अनुकूल बनाना। उतर दिशा को नमस्कार करने का अर्थ है- अपने मित्रों के साथ सद्व्यवहार करना। उंची दिशा को नमस्कार करने का अर्थ है-अपने धर्मगुरूओं, आचार्यो का सम्मान करनां नीची दिशा को नमस्कार करने का अर्थ है- अपने नौकर-चाकरों का सम्मान करना। जिज्ञासु की बात सुनकर दिशाओं को प्रणाम करने वाले ने कहा-अब मैं इन सभी को दिशाएं मानकर इन सभी का सम्मान करूंगा।