किसी गांव में गरीब पति-पत्नी रहते थे। उनके कोई संतान नहीं थी। उनके पास एक इंच भी जमीन नहीं थी। वे रोज वन में जाते, कंदमूल खाते और अपनी कुटिया में सो जाते। जंगल ही उनके जीने का सहारा था। कुछ दिनों बाद पत्नी के पांव भारी हो गए। जंगल में कंदमूल खोदते हुए उसने बच्चे को जन्म दिया। पत्नी ने पति को आवाज दी, ’सुनते हो बेटा जन्मा है। अब हम क्या करें?‘
गरीब ने कहा, ’घर में एक दाना भी नही है। न कपडे-लते हैं न और कुछ। हम इसे पालेंगे कैसे?‘ पत्नी ने कहा, ’ठीक है, इसे जंगल में छोड देते है। उसके भाग्य में जो लिखा होगा, वही होगा, वे दोनों बच्चे की वही छोडकर घर चले गए। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर एक चीता वहां आया और उसे अपनी मांद में ले गया। वह उसका अपने बच्चे की तरह पालन-पोषण करने लगा।
वह बच्चा बडा हुआ तो चीते को उसके ब्याह की चिंता हुई। एक दिन चीते ने लडके से पूछा, ’तुम्हारे लिए एक लडकी ने आउं?‘ सकुचाते हुए लडके ने कहा, ’जो आपकी मरजी! अगर आप मेरी शादी करना चाहते है, तो कोई लडकी ले आइए पिताजी।‘ चीता किसी लडकी के उधर से गुजरने के इंतजार में था। एक लडकी आई। चीता उसे उठाकर मांद की तरफ चल दिया। रास्ते में वह अपने पर काबू न रख सका और उसका आधा कान खा गया। वह उसे लेकर घर पहुंचा और कहा, ’बेटे, मैं तुम्हारे लिए एक लडकी लाया हूं। जाओ, पसंद कर लो।‘ लडके ने बाहर देखा, ’अरे, इसका तो एक कान आधा गायब है। ’वह वापस चीते के पास गया और कहस-पिताजी! मुझे आधे कान वाली लडकी पसंद नहीं है।‘ एक-एक कर चीता कई लडकियां लाया। पर मांसाहार की आदत के चलने किसी का वह हाथ खा जाता, किसी का नाक तो किसी का कान। आ,ार एक दिन लडके ने कहा, ’पिताजी, मेरे लिए कोई अच्छी लडकी जाइए। पूरे सुंदर शरीर वाली हो जिसे सर्वाग सुंदरी कहते है।‘
इस बार चीता ऐसे घर में गया जहां ब्याह हो रहा था। फेरों के बीच में ही मंडप से दुल्हन को चीता उठा लाया। चीते को देखकर घराती-बराती सब भाग छूटे। इस बार चीते ने पूरी सावचेती बरती। दुल्हन को सही सलामत घर लाया। बेटे से उसका ब्याह कर दिया। चीता और बेटे-बहू बहुत सुख चैन के साथ रह रहे थे। एक रोज सब्ती काटते हुए बहू की अंगुली कट गई। रिसते खून को उसने पतियों से पोंछ दिया। खून की गंध बाकर चीता उन पतियों के पास गया और उन्हें चाटा। उसने सोचा, ’जिसके खून का स्पाद इतना अच्छा है तो उसका मांस कितना अच्छा होगा।‘ चीते की आंखों की रंगत ने बेटे बहू से चुगली खाई। पति-पत्नी समझ गए कि चीते की नीचत में खोट है। वह उन्हें खाएगा।
उसी रात को वे दोनों वहां से रफूचक्कर हो गए। सुबह चीते ने देखा दोनों का कहीं अता-पता नहीं था। उनके पांवो के निशानों के सहारे वह उनके पीछे गया। वे दोनों कहीं नहीं मिले। वे दोनों अब जंगल छोडकर नगर में बस गए। सुख शांति से रहने लगे। चीता अपनी बुरी हिंसक आदत के कारण हमेशा के लिए अपने बहू बेटे से दूर हो गया। अब वह अकेले पडे-पडे पछता रहा था।