महाराज विक्रमादित्य ने एक दरबारी कवि के मुंह से राजा वलाह की प्रशंसा सुनी तो वे चौंक उठे। कवि को राजकक्ष में बुलवाया। विक्रमादित्य ने पूछा- कविराज, आप जिसकी तारीफ कर रहे थे? राजा वलाह कौन है? कवि बोला- महाराज, हमारा तो धंधा है। राजाओं की तारीफें सुनाकर जनता से चार पैसे कमा लेता हूं। मुझे तो आज राजा वलाह से बढकर दानी कोई दूसरा नही दिखाई देता। अब आप ही बतलाइए कि वलाह के गुण न गाऊं? राजा विक्रमादित्य ने उसे तिरछी निगाहों से देखा। हाथ मूंछों पर पहूंच गया। कवि ने मौंका देखकर राजा को उकसाया और हम तो चाहते है कि हुजूर का यश इतना फैले कि लोग वलाह का नाम भी भुल जाएं। विक्रमादित्य ने पूछा- वलाह की खूबिया बताओं?
क्वि कहने लगा- वलाह के महल में रातो-शत सोने का मंदिर तैयार हो जाता है। सवेरे-सवेरे उस मंदिर का सोना याचकों में वितरण कर देते है। कोई याचक कभी भी वलाह के यहां से निराश नहीं लौटता। विस्मय से विक्रमादित्य की भौहें तन गई। राजा ने पूछा- सच में ऐसा होता है। कवि सहज भाव से बोला- ’महाराज, सोलह आने सच कहता हूं। यदि हुजूर को विश्वास न हो तो अपने जासूस भेजकर मालूम कर लें। विक्रमादित्य ने कहा- एक शर्त है। अब तुम्हें मेरे राज में रहना होगा। तुम्हारी बातें सच निकली तो हम तुमकों बहुत धन देकर विदा करेंगे। दरवारियों ने कवि के ठहरने की व्यवस्था कर दी। राजा अंतःपुर में गए, सोचने लगे- यह तो बडी विचित्र बात सुनाई है कवि ने, परन्तु विधाता को इनती बडी सृष्टि में सब कुछ संभव है। अच्छा हो कि यह कौतुक मैं अपनी आंखों से देख आऊं। राजा ने विद्धान कवि से राजा वलाह की राजधानी का रास्ता पूछा और घोड पर बैठकर रवाना हो गया।