Monday, 12 April 2021

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कश्मीर में पल रहे आस्तीन के सांपों को दूध पिलाना बंद हो


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

कश्मीर घाटी में एक बार फिर 1947 में हुए सम्प्रदाय आधारित विभाजन जैसे दुर्भाग्यपूर्ण हालात पैदा करने की कोशिश की जा रही है। यदि कश्मीर के अलगाववादी विचार रखने वाले नेताओं की मानें तो आज के हालात 1947 के हालात से भी खतरनाक हो रहे हैं। अलगाववादी विचारधारा की यह ज्वाला एक दिन जरूर भडकेगी इस बात की पूरी उम्मीद थी। इस उम्मीद का कारण महज यह था कि चाहे वह जम्मू कश्मीर की सरकार रही हो अथवा केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार, पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकारें अथवा उसके पूर्व कांग्रेस की सरकारें क्यों न रही हों, इन सभी सरकारों द्वारा कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बातचीत का सिलसिला जारी रखने के नाम पर गत् 2॰ वर्षों से गोया आस्तीन के सांपों को दूध पिलाने जैसा काम किया गया है। कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड को मामूली सी जमीन का टुकडा दिए जाने के  विवाद को लेकर अलगाववादी नेताओं ने कश्मीर की आजादी तक की बात कर डाली है। कश्मीर घाटी की आर्थिक नाकेबंदी की बात करना तो एक बहाना मात्र है। सेब उत्पादकों का माल तो विमान के द्वारा भी भारत के अन्य क्षेत्रों में भेजा जा सकता था। भारत के गृहमंत्री शिवराज पाटिल भारतीय सेना, जम्मू कश्मीर पुलिस, कश्मीर के स्कूल कॉलेज तथा अन्य संस्थानों से सेब खरीदने का निवेदन भी कर चुके थे। परन्तु जिस प्रकार अलगाववादी नेताओं ने कश्मीरी अवाम को मुजफ्फराबाद की ओर रुख करने हेतु प्रोत्साहित किया है, उससे एक बार फिर यह जाहिर हो गया कि घाटी के अलगाववादी नेता कश्मीर का भारत से केवल और केवल अलगाव चाहते हैं इसके सिवा और कुछ नहीं।
प्रश्न यह है कि कश्मीर घाटी के मुट्ठीभर अलगाववादी नेता क्या कश्मीरी अवाम को धर्म के नाम पर यूं ही गुमराह करते रहेंगे? क्या भविष्य में भी धारा 37॰ के नाम पर भारत सरकार यूं ही ठगी जाती रहेगी। कश्मीरियत का ढोंग रचने वाले तथा कश्मीरी सभ्यता का दम भरने वाले इन चंद गिने-चुने नेताओं को कश्मीरी सभ्यता की रक्षा की बात उस समय नजर नहीं आती जबकि लाखों कश्मीरी हिन्दू कश्मीर घाटी से पलायन कर घर से बेघर हो कर अपने ही देश में शरणार्थियों जैसा जीवन बसर कर रहे हैं? कश्मीर घाटी की जो भीड आज मात्र चंद नेताओं के भडकाने पर सीमा पार करने को उतावली हो रही है, उसे धर्म के आधार पर बन चुके पाकिस्तान व बंगलादेश जैसे पडोसी देशों के भीतरी हालात की ओर गौर से देखना चाहिए। उस पाक अधिकृत कश्मीर के भीतरी व जमीनी हालात की ओर खासतौर पर जिस ओर कि वे मार्च करना चाह रहे थे।
निश्चित रूप से कश्मीर समस्या को लेकर कुछ पेचीदगियां भी हैं। इनमें सबसे बुनियादी पेचीदगी इस समस्या के स्तर को लेकर हैं। और वह यह कि वास्तव में कश्मीर समस्या एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है अथवा इसे एक राष्ट्रीय समस्या मात्र माना जाए। पडोसी देश पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को एक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा मानता है। यही वजह है कि वह इस मुद्दे को बार-बार संयुक्त राष्ट्र संघ सहित अन्य अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश भी करता रहता है। कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन को भी पाकिस्तान द्वारा हमेशा ही हर तरह का समर्थन दिया गया है। यहां तक कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद फैलाने तक में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है। पाक अधिकृत कश्मीर का प्रयोग तो गोया आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों के फलने-फूलने के लिए ही हो रहा है। अतः इसमें तो कोई दो राय है ही नहीं कि चाहे भारत पाकिस्तान संबंधों में सुधार के लाख प्रयास क्यों न किए जाएं परन्तु पाकिस्तानी राजनीतिज्ञ कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को अपना समर्थन देना सम्भवतः भविष्य में भी जारी रखेंगे। हालांकि हमेशा से यह माना जाता रहा है कि पाकिस्तानी राजनीतिज्ञों की इस रणनीति के पीछे की हकीकत यह है कि पाक नेता पाकिस्तान के अंदरूनी बिगडते हालात से पाक अवाम का ध्यान बंटाने के लिए कश्मीर, कश्मीर समस्या तथा कश्मीरी अलगाववादी आंदोलन की माला जपने लग जाते हैं। कश्मीरी अवाम को यह बात भली-भांति समझ लेनी चाहिए कि 1947 से लेकर आज तक भारत सरकार ने इस राज्य को देश के अन्य राज्यों की तुलना में हमेशा सबसे अधिक महत्व दिया है। इसी की बदौलत केंद्र सरकार को प्रायः देश के हिन्दुत्ववादी संगठनों के तुष्टीकरण जैसे आरोपों से भी रूबरू होना पडा है। भारत कश्मीर को न सिर्फ देश का गौरव समझता है बल्कि प्राकृतिक रूप से भी भारत का मानचित्र जम्मू-कश्मीर राज्य को देश के मस्तक के रूप में दर्शाता है। चूंकि भारत; पाकिस्तान की तरह कश्मीर को अन्तर्राष्ट्रीय समस्या मानने के बजाए केवल राष्ट्रीय समस्या के रूप में ही देखता है, इसीलिए केंद्र सरकार के नेता समय-समय पर कश्मीरी नेताओं से दिल्ली व श्रीनगर में द्विपक्षीय बातचीत भी करते रहे हैं। कश्मीर को अतिरिक्त सुविधाएं देने के नाम पर देश का अरबों डॉलर अब तक कश्मीर घाटी के विकास पर खर्च हो चुका है। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर राज्य के शेष दो संभाग लद्दाख व जम्मू संभाग के विकास पर केंद्र सरकार ने उतना ध्यान नहीं दिया जितना कि कश्मीर घाटी के विकास पर दिया जाता रहा है। यदि विधानसभा चुनावों में मतदाताओं की संख्या को लेकर बात की जाए तो भी हम देखते हैं कि कश्मीर घाटी में मतदाताओं की संख्या जम्मु संभाग की तुलना में कम है। परन्तु कश्मीर घाटी की विधानसभा सीटों की तादाद अधिक है और जम्मू संभाग की सीटों की कम। पर्यटन, रेल विकास, व्यापार, सडक, यातायात, उर्जा, रोजगार आदि प्रत्येक क्षेत्र में कश्मीर घाटी को आगे बढाने का काम भारत सरकार द्वारा किया जाता रहा है। पूरे देश में विधानसभाओं का कार्यकाल मात्र पांच वर्ष का होता है जबकि जम्मू-कश्मीर के लिए इसकी समय सीमा 6 वर्ष की निर्धारित की गई है।
शेष भारत का कोई भी नागरिक यदि चाहे तो जम्मू-कश्मीर राज्य से नगरपालिका अथवा जिला परिषद तक का चुनाव नहीं लड सकता। वहां सम्पत्ति नहीं खरीद सकता। नौकरी नहीं कर सकता। व्यापार नहीं कर सकता। परन्तु कश्मीर घाटी अथवा जम्मु-कश्मीर कहीं का भी व्यक्ति इस देश का प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति कुछ भी बन सकता है। शरद ऋतु में कश्मीर घाटी के लाखों गरीब व मध्यम श्रेणी के लोग विशेषकर मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग पूरे उत्तर भारत में मेहनत मजदूरी करते व छोटे-मोटे व्यापार करते दिखाई देते हैं। भारत के लोग उन्हें अपना ही देशवासी समझकर उनको मान सम्मान देते हैं तथा उनके कामकाज में मददगार साबित होते हैं। परन्तु भारतीय नागरिक अपने इस व्यवहार को अपना कर्त्तव्य समझते हैं, कश्मीरियों पर किया जाने वाला एहसान नहीं। परन्तु बडे दुःख के साथ कहना पडता है कि अब इन चंद अलगाववादी नेताओं द्वारा बार-बार अलगाववाद की बातें किए जाने से यह एहसास अब यकीन में बदलने लगा है कि कहीं हमें धोखा तो नहीं हो रहा है?
घाटी में अलगाववाद की नई हवा को जन्म देने का श्रेय उस घराने को जा रहा है जो दुर्भाग्यवश कभी इस देश का गृहमंत्री रह चुका है। अर्थात् मुफ्ती मोहम्मद सईद नामक देश का वह सबसे कमजोर गृहमंत्री जिसने अपनी बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बदले में शातिर आतंकवादी नेता मसूद अजहर को जेल से रिहा कर दिया था। यदि आज उन्हीं की दूसरी बेटी महबूबा मुफ्ती भी अलगाववादी नेताओं की भाषा बोलने लगे तो हमारा यह सोचना क्योंकर गलत हो सकता है कि यह परिवार कल भी अलगाववाद व आतंकवाद का पक्षधर था और आज भी है। लिहाजा केंद्रीय नेताओं देश के समस्त राजनैतिक दलों तथा जम्मू-कश्मीर के राष्ट्रवादी लोगों को इन जैसे नेताओं के अलगाववादी हथकंडों से सचेत रहने की आवश्यकता है। जरूरत इस बात की भी महसूस की जा रही है कि अब आस्तीन के सांपों के मुंह कुचल दिए जाने चाहिए। अब इन्हें और दूध पिलाने की जरूरत कतई नहीं है। यदि घाटी के कुछ लोग इन अलगाववादी नेताओं के बहकावे में आकर पाकिस्तान अथवा पाक अधिकृत कश्मीर में रहना भारत में रहने की तुलना में अधिक सुखद महसूस करते हैं तो उन्हें भी खदेडकर बाहर कर देना चहिए। यथाशीघ्र संभव उन कश्मीरियों को कश्मीर वापस भेजने की व्यवस्था की जानी चाहिए जो अलगाववादी नेताओं की करतूतों के चलते दरबदर भटकते फिर रहे हैं तथा इन सिरफिरे, नमकहराम, अलगाववादी नेताओं की वजह से अपनी सभ्यता व जडों को छोडकर शरणार्थियों जैसा जीवन बसर कर रहे हैं। भारत सरकार को एक बार फिर अपने इस रुख को स्पष्ट कर देना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है तथा इसे तोडने की बात करने वाला प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रद्रोही है और एक राष्ट्रद्रोही के साथ जो बर्ताव भारतीय कानूनों के तहत वांछित है, वही बर्ताव इन कश्मीरी अलगावादियों के साथ तत्काल किए जाने की सख्त जरूरत है।


तनवीर जाफरी - [email protected]