छात्र किसी सभ्यता और संस्कृति की ऊर्जा के अक्षय भंडार हैं। यही ऊर्जा समाज के समग्र विकास के पथ को प्रशस्त करती है । ऐसे में युवाओं संस्कारित करने की आवश्यकता तो है ही साथ एक उत्तरदायी समाज के पहचान की कसौटी भी यही ही है कि वह अपने आने वाले कल को अपनी परम्परा, अनुभव और ज्ञान से इस प्रकार दीक्षित करे कि वे जीवन की जटिल राहों को आसान बना सके ।
हमनें लोकतंत्र का राजमार्ग चुना है । लोकतंत्र में छात्र राजनीति की अनिवार्यता और अधिक गहरी हो जाती हैं। क्योंकि जन का, जन के लिए, जन के द्वारा जो शासन सुनिश्चित होता है । उसमें जन के राजनीतिक प्रशिक्षण की भी महत्ती आवश्यकता हैं।
छात्रों के मध्य चुनाव कराने के पीछे मूल सोच यह रहता है कि वे अपने छात्र जीवन में अपने तंत्र की खामियों, कमियों और विडम्बनाओं से उत्पन्न विचलनों को भलीभाँति समझ सकें। महाविद्यालय जीवन में ही छात्र को जब राजनीति के पथ की व्यवहारिक कमियों व अच्छाइयों का ज्ञान हो जाता हैं तो उसके लिए व्यवस्था से टकरा कर उसमें सुधार लाने की क्षमता का विकास होता हैं। यानी महाविद्यालय जीवन अपने तंत्र को (लोकतंत्र) समझने, अपनाने और बचाने की एक अघोषित पाठशाला है ।
लेकिन दुर्भाग्यवश जेपी के छात्र आंदोलन के बाद से छात्र राजनीति अपने पथ से विचलित है । छात्र राजनीति में मूल्य, अस्मिता और अनेकानेक माननीय संभावनाएं मर चुकी है। छात्र संगठनों का राजनीतकरण हो चुका हैं। छात्र मूल रास्ते से भटक चुके हैं। छात्र राजनीति के गन्दे गलियारों में जाकर अपने ’सत्व‘ को खो चुकी है ।
जरूरत है छात्रों को अपने लक्ष्य दिशाओं और रास्ते के सही ज्ञान की। ऐसे मैं पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह की अगुवाई की बनी कमेटी की आई ताजा सिफारशें उसे अपने सरोकारों से पुनः जोडने का एक उपयुक्त माध्यम हो सकती है । अब यह देखना यह है कि राज और समाज इसे लेता किस तरह है ।
डाँ ब्रजरतन जोशी
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