सुशासन अर्थात "Good Governance" का अर्थ अच्छी नीति का निर्माण और उनका कुशल कार्यान्वियन होता है। सुशासन वर्तमान शब्दावलि है लेकिन यह तबसे चला आ रहा है जबसे मानव समाज का विकास हुआ है। सुशासन को महात्मा गांधी ने रामराज्य के आदर्भ राज्य के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया था। गांधीजी का यह कथन है कि, ’’हम राज्य को रामराज्य तभी कह सकते हैं जब राजा और प्रजा दोनों सरल हो, जब राजा और प्रजा दोनों के हृदय पवित्र हों, जब दोनों त्यागवृत्ति रखते हों, भोगो का सुख उठाते हुए भी संकोच और संयम रखते हो, और जब दोनों के बीच पिता और पुत्र जैसे सम्बंध हों। हम यह बात भूल गये, इसलिए डेमोक्रेशी की बातें करते हैं। आज डेमोक्रेशी का जमाना है। मुझे नहीं मालूम इसका क्या अर्थ है किन्तु जहाँ प्रजा की आवाज सुनी जाती है, जहाँ प्रजा के प्रेम को मान्यता मिलता है, कहा जा सकता है कि वहाँ डेमोक्रेशी है।‘‘ गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरित मानस में लिखा है। दैहिक ’’दैविक भौतिक ताया। राम राज्य कांहू नहीं व्याया।‘‘ अर्थात् राम राज्य में मनुष्य शारीरिक, सांसारिक और दैवी परेशानी से मुक्त होता है। यहीं वर्तमान सुशासन का मूलमंत्र हो सकता है। सुशासन या ’रामराज्य‘ पर वर्तमान चित्तकों के अलावा प्राचीन काल से ही विचार किया गया है। पाश्चात्य और भारतीय चिन्तक इस सन्दर्भ में अपनी बात रखते हैं। पाश्चात्य दार्शनिकों में प्लेटों का आर्दश राज्य महत्त्वपूर्ण है। भारतीय परिवेश में सुशासन के निर्देशक तत्व प्राचीनकाल से अभी तक ज्यादा परिवर्तन नहीं हुए है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सुशासन के दस निर्देशक तत्व प्राप्त होते हैं। कौटिल्य कहता है कि, ’’राज राज्य का सेवक है जिसकी अपनी कोई व्यक्तिगत इच्छा नही होती ।‘‘ यह वर्तमान सुशासन के लिए महत्त्वपूर्ण सुझाव है क्योंकि आज के तृतीय विश्व के देशों में राजसेवक सामान्य जनता के सामने स्वामी के रूप में कार्य करते हैं। कौटिल्य भ्रष्ट अधिकारीयों के विरूद्ध दण्ड की बात करता है। एक कहावत है यथा राजा तथा प्रजा । कौटिल्य भी कहता है कि राजा का दिल ही प्रजा का शील है। राजा या राज्य के अधिकारी जैसें होंगे प्रजा भी वैसी ही होगी । इसी लिए राजकर्मचारीयों को अपने आचार का नैतिक स्तर ऊंचा रखने की बात की जाती है, ताकि वह संभाग जनता के लिए एक आर्दश हो सके। यदि अधिकारी आर्दशवान नही होगा तो शासन भी आर्दशमय नहीं रहेगा अर्थात आचरण की अभुद्धता पूरी व्यवस्था को पटरी से उतार ने वाली होती है। भ्रष्टाचार को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भ्रष्टाचार दो शहरों से मिलकर बना हैं - भ्रष्ट + आचाार अर्थात् आचार का भ्रष्ट होना । इसे शब्दों में कह सकते है कि व्यहवार का गलत होना या हमारे जीवन के कर्त्तव्यों का गलत होना अर्थात् अपनी भूमिका में गलत होना । देखा जाय तो भ्रष्टाचार आज आधुनिक समाज मे अधिक भी व्यापक हो गया हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भ्रष्टाचार अभी उत्पन्न हुआ है। निश्वित् रूप से भ्रष्टाचार शव्द अभी का है, लेकिन यह प्राचिन काल से चला आ रहा है। हां इतना कहा जा सकता है कि प्राचिन काल में इसका स्वरूप इतना व्यापक नही था। प्रारम्भ में आचरण की शुद्धता को एक आवश्यक अंग के रूप में माना जाता था, तभी कौटिल्य कहता है कि राजा का शील ही प्रजा का शील हैं, जैसा राजा होगा प्रजा भी वैसी ही होगी। इसलिए राजा को सर्वयुग सम्पन्न, निजीगिणु और इन्दि्रयजमी होना चाहिए अर्थात प्राचिन काल में भ्रष्टाचार की सामाजिक मान्यता नही थी। मानव आचार या व्यहवार मानव को शुद्ध रखने का प्रयास करता था। और शास्त्रों में उस बात की व्यवस्था जो कि व्यागा का आचरण शुद्ध हो । सत्ता अहिंसा आत्तेय (चोरी नहीं करना) अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह नहीं) और ब्रह्मचर्य आचार के इन पॉच नियमो का उल्लेख लगभग सभी शास्त्रों (गीता, वेदों, जैन ग्रन्थों, बौद्ध ग्रन्थों वैष्णव ग्रन्थों योग आदि में मिल जाता है।) अस्तेय और अपरिग्रह व्यक्ति की आवश्यकताओं को कम करने का प्रयास करते है और सत्य, अहिंसा, और ब्रह्मचर्य नैतिक मूल्यों की सवारनें का प्रयास करते है। इस दृष्टि से नैतिक मूल्यो और सामाजिक मूल्य का श्रेष्ठ हो जाना सद्आचरण का कार्य है। चार पुरूषार्थो में अर्थ की बात कही गयी है लेकिन वहॉ भी अपरिग्रह प्रधान है। इस संदर्भ में मैं चाबीक दर्शनका उल्लेख कर रहा हूँ। जो आज के खाओं, पीओं और मौज करों काफी समानता रखता है, लेकिन वहा ऋणम् कत्वा घृतम् पीवेत्। कि बात है, अर्थात ऋण लेकर की जीने के लिए कहा गया है अय्यासी करने या मौज मस्ती करने के लिए नही । भ्रष्टा चार के विरूद्ध सदाचार को बढाने तथा राजा का अव्यवस्था और कुशासन से बचाने की बातें प्राचीन धर्म ग्रथों मे कही गयी है। वेदों महाकाव्यों और धर्मशास्त्रों में अनेक उल्लेख इस संदर्भ में प्राप्त हो जाते है। महाभारत और धर्मशास्त्रों में अनेक उल्लेख इस संर्दभ में प्राप्त हो जाते है। महाभारत जिसे पंचम वेद कहा जाता है और कहा गया है कि इसमें जो कुछ है वह सब जगह है लेकिन जो इसमें नही है वह कही भी नही है शासन के सदाचार मय बनाने के कई वातो का उल्लेख है कौटिल्य भी अपने अर्थशास्त्र में इस संर्दभ में निरस्त विषेचन किया गया है। उन्ही आधारों पर भ्रष्टाचार से मुक्त शासन के चार चरणों का उल्लेख यहॉ वांछनीय है। शास्त्रों मे वर्जित पहला चरण नियुक्ति का है। जहॉ यह लिखा मिलता है कि राज को सुपात्र की नियुक्ति करनी चाहिए। दुपात्र की नियुक्ति शासन को सुव्यवथीत नहीं करना । कौटिल्य अधिकारीयों की नियुक्ति के चार परिक्षाओं का उल्लेख करता है जो धर्म ने गए हो उसे धर्मस्थ (दिवानी) और कण्टकसाधन (फौजदारी) के कार्य, जो अर्थ की परीक्षा में उर्त्तीण हो उसे समाहर्ता का संग्रहण और सन्निधाता (कोषाध्यक्ष) के फार्म जो अर्थ की परीक्षा को पास कर उसे राजा का अंगरक्षक (पुलिस) के कार्य और जो परिक्षाओं में सफल हो उसे तभी बनाया जाना चाहिए और जो सभी परिक्षाओं मे अनुतीर्ण हो जाय उसे खान और जंगल के शुभ साध्य कार्य सौंपने चाहिए। कौटिल्य एक अन्य स्थाना पर राजकीय अधिकारियों के चालचलन की परीक्षा कर पदों पर नियुक्त की बात करता हैं। राजकीय उच्चाधिकारियों को अमात्य के गुणों से युक्त होना चाहिए। योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर ही उन्हें भिन्न भिन्न पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए। महाभारत के शक्ति पर्व में कुपात्र और सुपात्र की नियुक्ति के सन्दर्भ में ऋषि और कुत्ता की कहानी लिखी गयी है जिसमें ऋषि कुत्ते को चीता से भयभीत होने पर उसे चीता बना देता है, फिर उसे बाघ के भय से बाघ बनाता फिर गजराज शेर और शरम बनाता है लेकिन जब शाम अपने निर्माण ऋषि पर झपटता है तो वह उसे वापस कुत्ता बना देता हैं। यहा यह बताने का प्रयास किया गया है कि कुपात्र से स्वयं का ही खतरा रहता है। अतः हमेशा सुपात्र की नियुक्ति करनी चाहिए। यहॉ आगे (शक्ति पर्व - ११६-११७) सेवकों के योग्यता के गुणों का उल्लेख किया गया है जहॉ लिखा है कि बुद्धिमान राजा को चाहिए कि वह सेवकों की सच्चाई, शुद्धता , सरलता, स्वभाव, शास्त्रज्ञान, सदाचार, कुलीवता, जितेन्दि्रयता, दया, बल, पराकरम प्रभाव विनम्र तथा क्षमा आदि का पता लगाकर जो सेवक जिसकार्य के योग्य जान पडे उन्हे उसी कार्य में लगाने और उनकी दसा का पूरा प्रबन्ध कर दे। इसमें तत्व जिसपर धर्मशास्त्रों और प्राचिन श्रोतों में बल दिया गया है वह प्रबोधन का है। कौटिल्य अधिकारियों की नियुक्ति की जहां चर्चा करता है, वहीं वह समय समय पर उनकी निगरानी की बात दोहराता है क्योंकि वह कहता है कि मनुष्य की चित्रवृतियां हमेशा एक सी नहीं होती । इसी सन्दर्भ में एक उल्लेख सम्राट अशोक के अभिलेखों से मिलता है - अपने धर्म महामायों को संबोधित करता हुआ वह जनता से सम्बधित सूचनाएं उस तक पंहुचाने की बात करता है। उसके छठे शिलालेख में लिखा मिलता है - मै किसी भी परिस्थिति में रहूं चाटें भोजन करता रह, अन्तःपुर में रहूँ या पशुशाला में, पालकी में या उद्यान में कही भी प्रतिपालक राजपुरूष मुझे सूचना देवें और कार्यों का सम्पादन करें क्योकि वह अपने साम्राज्य की जनता ही अपनी सन्तान समझता था और अधिकारियों के द्वारा उन्हें प्रतण्डित न होने देने तथा उनमें विद्वेष न भरने के लिए वह धौली शिलालेख में लिखवाता है कि सब मनुष्य मेरी प्रजा (सन्तान) है जिस परकार मैं अपनी सन्तान के लिए यह चाहता हूँ कि वे सब हित और सुख इहलौकिक और पारलौकिक प्राप्त करें, उसी प्रकार मैं सब मनुष्यों के लिए कामना करता हूं। आगे द्वितिय प्रथक घौली शिलालेख में लिखा है कि - उनकेा (मनुष्यों को) यह आश्वासन देना चाहिए जिससे के जान जाएं कि देवानां प्रिय हमारे लिए पिता के सम्मान है। जैसे देवानां प्रिय अपने प्रति अनुकम्पा करता है वैसे ही हमारे प्रति भी अनुकम्पा करता है जैसी देवनां प्रिय की अपनी सन्ताने हैं। वैसे ही हम भी ह। प्रबोधन का कार्य कॉफी कठिन है। प्राचिन धर्मशास्त्रों में लिखा है कि यदि किसी अधिकारी की आमदनी थोडी और खर्च अधिक दिखायी दे तो समझ लेना चाहिए की वह राज्य के धन का अपहरण कर रहा है। इसी तरह अन्यत्र लिखा है कि यदि आमदनी जितनी है उतना ही व्यय दिखाई दे रहा है तो समझ लेना चाहिए कि वहन तो राजधन का गबन का काम करता है और न रिश्वत लेता है। लेकिन कौटिल्य कहता है कि धन का अपहरण करने वाला भी थोडा खर्च कर सकता है। अतः गुप्तचरों द्वारा इस कार्य का ठीक पता लगाना चाहिए। जो अधिकारी नियमित आय में कभी दिखता है - वह निश्चय ही राजधन में अपहरण करता है यदि उसकी अज्ञानता, प्रमाद एवं आलस्य के कारण - कमी हुयी है तो उसे अपराध के अनुसार दुगुना, तिगुना, दण्ड दिया जाना चाहिए। यदि वह उस दुगुनी आय को राजकोष के लिए भेज देता है तो उतना दण्ड देना चाहिए। और यदि वह उस धन को राजकोष में जाया नहीं करके स्वयं खा जाता है तो उसे कठोर दण्ड देना चाहिए। यदि वह अधिकारी व्यय निश्चित निर्वाचीत राशी को खर्च न कर बचा लेता है तो वह मजदूरों को पेय करता है। एक अन्य स्थान पर कौटिल्य लिखता है कि यदि कोई अधिकारी राजकीय धन का गबन करके उसको अदा करने में असमर्थ हो तो वह धन क्रमशः उसके हिस्सेदार, उसके जामिन, उसके अधिनस्थ कर्मचारी, उसके पुत्र एवं भाई, उसकी स्त्री एवं लडकी अथवा उसके नौकर से वसूलना चाहिए। महाभारत के शांतिपर्व में भी लिखा है कि सोने आदि की खान, नमक अनाज आदि की मण्डी, नाव के घाट तथा हाथियों के पूथ् इन सब स्थानों पर होने वाली आम के निरीक्षण के लिए मंत्रियों को अथवा अपना हित चाहने वाले विस्वसनीय पुरूषों को राजा नियुक्त करें। प्रबोधन का इस आधार अंकेक्षण का है। इस संदर्भ में अर्थशास्त्र में दो उल्लेख महत्त्वपूर्ण हैं। कौटिल्य कार्यालयों के अकेंक्षण का समय देता है - आषाढ के महीने में वर्षा की समाप्ति पर प्रधान कार्यालयों के अध्यक्ष आषाढ के महीने में वर्षा की समाप्ति पर प्रधान कार्यालयों में आकर हिसाब का मिलान करें। उन ओर हुए लोगों को तब तक एक दूसरे से बातचीत न करने दी जाय तथा मिलने न दिया जाय जब तक कि उनके पास राजकीय मोहर लगे रजिस्टर तथा व्यय से बचा हुआ धन मौजूद हैं। सर्वप्रथम आमकय को सुनकर उनके पास जो बचत शेष हो उसे ले लिया जाय । अध्यक्ष के द्वारा बताई हुयी धान राशि से यदि रजिस्टर का हिसाब अधिक निकले और उसी प्रकार बताए हुए व्यय का अपेक्षा रजिस्टर में उससे कम धन निकाले तो अध्यक्ष उसके द्वारा बतायी गयी कम या अधिक रकम का आठ गुणा जुर्माना किया जाय। यदि आमदनी से अधिक या कम से कम रकम रजिस्टर में चढी हो तो ऐसी दशा में अध्यक्ष को दण्ड नहीं दिया जाय बल्कि आजकल की जो बेसी हुयी तो वह उसी को दिया जाय। अकिंसण के सन्दर्भ इसका उल्लेख कौटिल्य अर्थशास्त्र में मिलता है कि जो अध्यक्ष निश्चित समय में अपने रजिस्टर अथवा शेषधन आदि को लेकर प्रधान कार्यालय में उपस्थित नहीं होता है तब उसके हिसाब में जितना बाकी निकले उसका उस पर दस गुणा जुर्माना किया जाना चाहिए। यदि प्रधान अध्यक्ष निर्धारीत समय पर क्षेत्रीय कार्यालयो में पहुँच जाय और वहाँ के विभागीय अधिकारी कार्यालय का हिसाब किताब दिखाने में असर्मथ हो तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए और यदि प्रधान अधिकारी निर्धारीत समय पर निरीक्षण करने नहीं पहुचना है तो उसे दुगुना प्रथम सहित दण्ड देना चाहिए। इस प्रकार प्रबोधन और अंकेक्षण में धर्मशास्त्र दोनों पक्षों निरीक्षण कर्त्ता और निरीक्षण होने वाले अधिकारी के गल्ती पर दण्ड का आदेश देता है। नियुक्ति और प्रबोधन के बाद भ्रष्टाचार जानने और रोकने का तीसरा प्रमुख तत्व धर्मशास्त्रों में कोषक्षय को बताया गया है। कौटिल्य कोषक्षय (राजकोष में कमी) के आठ कारण बताता है और उनके लिए अलग-अलग दण्ड की व्यवस्था का विधान करता है। प्रतिबंध कोषक्षम का पहला कारण है अर्थात राजकर को वसूल करके अपने अधिकार में नहीं रखना या अपने या अपने अधिकार में रखा है तो उसे खजाने में जमा नही कराना, कौटिल्य इस हेतू क्षत राशि से दस गुना दण्ड का विधान करता है। कोषधन का स्वयं लेनदेन कर वृद्धि का प्रयास करना प्रयोग कहलाता है जिसके लिए वह दुगुना जुर्माना की बात करता है। कौटिल्य कोषधन से स्वयं व्यापार करने को व्यापारी कहता है। इस कार्य के लिए दुगुना दण्ड कहताहै अवस्तार को पक्षम का चतुर्थ कारण है। इसका तात्पर्य होता ह कि जब अधिकारी नियत समय पर कर वसूल नहीं करता और रिश्वत लेने की इच्छा से समय बीत जाने का भय देकर जनता को तंग करता है और धन रिश्वत में लेता है कौटिल्य इस हेतु नुकसान राशि का पॉच गुना दण्ड बताता है। राजकोष का स्वयं उपभोग करना या इसको उपयोग करना उपभोग कहलाता हैं यह उपभोग तीन प्रकार का होता है। जिसके लिए दण्ड विधान अलग अलग बताया गया है। यदि रत्न का उ
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