Sunday, 01 November 2020

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अधर में लटकती लखटकिया कार


Writer - Nirmal Rani

 

टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा ने बहुप्रतीक्षित लखटकिया कार, नैनो को लेकर दुःखी हृदय से पत्रकारों के समक्ष जो वक्तव्य दिए, उससे भारत के करोडों नैनो प्रेमियों तथा अपने जीवन में पहली कार का सपना देखने वालों को काफी निराशा हुई है। पश्चिम बंगाल राज्य के सिंगूर नामक क्षेत्र में नैनो कार के उत्पादन हेतु अधिगृहीत की गई भूमि को लेकर उपजे विवाद पर टाटा प्रमुख ने आखिरकार अपनी सहनशक्ति समाप्त होने पर अपना मुंह खोल ही दिया। बडे दुःखी हृदय एवं भारी मन के साथ रतन टाटा ने पत्रकार पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए अपनी व्यथा स्पष्ट की। उनकी बातों से जो तथ्य निकलकर सामने आते हैं, उनमें सबसे मुख्य बात यह थी कि यदि नैनो का उत्पादन सिंगूर में शांतिपूर्ण ढंग से नहीं हो सका तो वे किसी और बडे विवाद में उलझने के बजाए सिंगूर से अपना उपक्रम हटा लेना ही अधिक उचित समझेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि वे इस योजना पर 1500 करोड रुपए खर्च कर चुके हैं।
टाटा समूह भारत का एकमात्र वह औद्योगिक घराना गिना जाता रहा है जिसने कि हमेशा ही अपनी प्रत्येक नई उत्पाद यूनिट की योजना बनाते समय गरीबों, मजदूरों, कामगारों तथा इकाई के आसपास के लोगों के कल्याण के विषय में सोचा है। स्वतंत्रता की लडाई से लेकर स्वतंत्र भारत को आत्मनिर्भर बनाने तक में इस औद्योगिक घराने की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बताया जाता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरु व जे आर डी टाटा में गहरी मित्रता थी। स्वतंत्रता के पश्चात प. नेहरु जे आर डी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर देश का उद्योग मंत्री तक बनाना चाहते थे। परन्तु जे आर डी ने प. नेहरु के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बताया जाता है कि जे आर डी ने पंडित नेहरु से कहा कि वे भी देश की सेवा करना चाहते हैं परन्तु नई-नई औद्योगिक इकाईयों की स्थापना कर न कि केवल मंत्री बनने के रूप में। जे आर डी का मकसद उस समय केवल यही था कि बडे उद्योग स्थापित कर बेरोजगारों को रोजगार दिया जाए, अपने उत्पाद से देश को आत्मनिर्भर बनाया जाए तथा देश की आर्थिक व औद्योगिक स्थिति में सुधार लाया जाए।
जनकल्याण की सोच रखने वाली उसी परम्परा का निर्वहन जे आर डी के उत्तराधिकारी रतन टाटा द्वारा किया जा रहा है। अपनी अतिव्यस्त जिंदगी में जो व्यक्ति विवाहित जीवन गुजारने की इच्छा तक न रखता हो तथा बढती हुई मंहगाई के इस दौर में मात्र एक लाख रुपए की कार आम लोगों के हाथों में देने की तमन्ना रखता हो, उसकी मानवीय सोच के विषय में कल्पना कर पाना भी आसान काम नहीं है। परन्तु दुर्भाग्य है हमारे इस देश का जहां प्रत्येक विकासोन्मुख योजनाओं के पीछे नकारात्मक सोच रखने वाले राजनीतिज्ञ हाथ धोकर पड जाते हैं। वामपंथी विचारधारा हालांकि बडे औद्योगिक घरानों विशेषकर विदेशी पूंजी निवेश की विरोधी मानी जाती रही है परन्तु पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार द्वारा ही सिंगूर में टाटा समूह को नैनो कार बनाने हेतु जमीन उपलब्ध करवाई गई। जमीन संबंधी आंकडों के अनुसार नैनो हेतु अधिगृहीत की गई कुल जमीन का रकबा 997.11 एकड है। इसमें 10852 लोग ऐसे हैं जिनकी 691.14 एकड भूमि का अधिग्रहण किया गया है। इन सभी 10852 किसानों को उनकी जमीन का निर्धारित मुआवजा भी दिया जा चुका है। जबकि इन्हीं किसानों में 2251 किसान ऐसे भी हैं जिनकी 305.97 एकड भूमि का अधिग्रहण तो कर लिया गया है  परन्तु इन किसानों ने अभी तक अपना मुआवजा स्वीकार नहीं किया है। अधिगृहीत की गई कुल जमीन में से 645 एकड क्षेत्र टाटा की मुख्य नैनो कार के उत्पादन तथा नैनो के कलपुर्जों को जोडकर नैनो के संग्रह करने हेतु रखा गया है जबकि इस उद्योग की सहयोगी 55 इकईयों हेतु 290 एकड भूमि अधिगृहित की गई है।
परन्तु समस्त पारदर्शिताओं के बावजूद पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बैनर्जी ने तो मानो इस उद्योग को उजाडना जैसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्ा* ही बना लिया है। उनके द्वारा सिंगूर के किसानों को अनावश्यक रूप से भडकाया जा रहा है। मीडिया को सिंगूर के विषय में अपुष्ट, गुमराह करने वाली तथा झूठी जानकारियों दी जा रही हैं। उदाहरण के तौर पर ममता बैनर्जी द्वारा मीडिया को बताया जा रहा है कि 400 एकड भूमि का मुआवजा बकाया रह गया है जबकि मात्र 305.97 एकड भूमि ही ऐसी है जिसका कि किसानों द्वारा स्वयं मुआवजा स्वीकार नहीं किया गया है। इसी प्रकार की और अनेकों आधारहीन एवं भडकाऊ बातें कर ममता बैनर्जी पश्चिम बंगाल की राजनीति ंमें एक तीर से दो शिकार खेलना चाह रही हैं। सिंगूर प्रकरण को लेकर एक ओर तो वह गरीबों व किसानों के मसीहा के रूप में स्वयं को स्थापित करना चाहती हैं तो दूसरी ओर वामपंथियों के विरोध में मजबूती से खडे रहने के लिए वह सिंगूर को एक हथियार के रूप में अपना रही हैं।
ममता बैनर्जी को अपनी क्षेत्रीय राजनीति को चमकाने के आगे न तो देश के उन कराडों लोगों की परवाह है जोकि यथाशीघ्र लखटकिया कार के बाजार में आने की बाट जोह रहे हैं और न ही उन्हें टाटा समूह के भविष्य, उसकी परेशानियों अथवा उसकी प्रतिष्ठा के विषय में कुछ सोचे जाने की जरूरत महसूस हो रही है। ममता बैनर्जी यह भी नहीं सोच पा रही हैं कि सिंगूर में टाटा समूह का उद्योग स्थापित करने हेतु इस प्रकार से विरोध किया जाना आखिर देश व दुनिया के औद्योगिक घरानों पर क्या प्रभाव छोडेगा? उन्हें राज्य सरकार व टाटा समूह के मध्य हुए समझौते का विरोध करने के पश्चात उत्पन्न होने वाले हालात तथा इस घटनाक्रम से निकलने वाले संदेशों की भी कोई चिंता नहीं। कितना दुःखद है कि रतन टाटा को सिंगूर घटनाक्रम को लेकर यहां तक सोचना पडा है कि वे कभी नहीं चाहेंगे कि उनके प्रबंधन अथवा कर्मचारियों की पिटाई की जाए। उन्होंने कहा कि वे अवांछित व्यक्ति के रूप में कभी भी इस यूनिट को वहां नहीं चलाना चाहेंगे। एक ओर जहां रतन टाटा के वक्तव्य से सिंगूर प्लांट खटाई में पडता नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर इस मौके का फायदा उठाते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने रतन टाटा को नैनो हेतु जमीन उपलब्ध कराने, समस्त सुविधाएं प्रदान करने तथा ससम्मान उद्योग चलाने का न्यौता भी दे डाला है।
चाहे वे निजी औद्योगिक घराने हों अथवा विशेष आर्थिक जोन हेतु अधिग्रहण की जाने वाली जमीनें, निःसन्देह सरकार को सर्वप्रथम इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि खेती योग्य उपजाऊ जमीनों पर किसी प्रकार के उद्योग लगाने की इजाजत प्रारम्भ से ही हरगिज न दी जाए। परन्तु जहां कहीं ऐसे निर्णय हो चुके हैं उनका निपटारा किसानों की मर्जी के अनुरूप तथा उनके व उनके परिवारजनों के उज्जवल भविष्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। सिंगूर व नंदीग्राम तथा देश के अनेक भागों में अधिग्रहण को लेकर उठने वाली तरह-तरह की आवाजों को राजनीतिज्ञों के हथियार या हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किए जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। किसानों की समस्याओं का समाधान सीधे तौर पर उनसे मिलकर किया जाना चाहिए। सरकार की भविष्य में यही कोशिशें होनी चाहिए कि सिंगूर जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए भविष्य में औद्योगिक इकाईयों हेतु बंजर भूमि का अधिग्रहण किया जाए अथवा जंगलात, नदियों व समुद्र के किनारे की भूमि आदि अधिगृहित की जाए। परन्तु अपना उत्पाद शुरु करने की कगार पर बैठे नैनो जैसे उद्योग का विरोध करना न तो जनहित में है न ही राष्ट्रहित में।


Nirmal Rani  [email protected]