टेनिस की दुनिया में जहां एक ओर टेनिस मे पुरूष वर्ग मे रोजर फेडरर का कोई मुकाबला नहीं वहीं महिला टेनिस में उठा पटक का दौर जारी है। साल की पहली ग्राण्ड स्लेम से यह एक बार फिर सिद्ध हो गया है। २००७ की शुरूआत से यह संकेत मिल गया कि वर्तमान में रोजर फेडरर का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है जबकि महिला टेनिस में अस्थिरता का दौर कुछ समय और जारी रहने की संभावना है। २१वी सदी के पहले दशक में टेनिस जहां कलात्मक और सुंदर हुआ है वहीं कडे संघर्ष के मुकाबलो में कमी आई है। फेडरर को बडी आसानी के साथ सफलता मिल रही है जबकि महिला टेनिस मे हर ग्राण्ड स्लेम में नया चैम्पियन नजर आ रहा है। २००६ के बाद से टेनिस प्रेमियो के लिए कडे संघर्ष के मुकाबले यदा-कदा ही नजर आने लगे है। रोजर फेडरर ने तीसरी बार आस्ट्रेलिया ओपन का खिताब जीत कर दिखा दिया कि वह इस समय टेनिस की दुनिया का एकमात्र बादशाह है। इसके साथ ही फेडरर को सर्वकालीक महान खिलाडी का दर्जा देने को लेकर बहस तेज हो गई है। रोजर फेडरर निश्चय ही टेनिस की दुनिया का सबसे कलात्मक खिलाडी है। कोर्ट में उसका शॉट चयन और शॉट्स दर्शनीय होते है। यदि किसी खेलप्रेमी को टेनिस की सुंदरता देखनी है तो उसे फेडरर का खेल देखना चाहिए। उसके शॉटस में नदियों जैसी चंचलता है। वह हर एक प्रतिद्वन्द्वी के विरूद्ध रणनीति बनाकर खेलता है। वह प्रतिद्वन्द्वी का सामना उसके खेल के अनुसार ही करता है। आस्ट्रेलिया ओपन के फाईनल में उसने हास को बुरी तरह छकाया। फेडरर कई अंक बेसलाईन के नजदीक से बनाये और ऐसा एक पांरगत खिलाडी ही कर सकता है। इस प्रतियोगिता में उसका सबसे बडा प्रतिद्वन्द्वी एंडी रौड्रिक को माना गया। परन्तु उसने सेमिफाईनल में रोड्रिक को बडी आसानी के साथ मात दे दी। पूरी प्रतियोगिता में कोई भी खिलाडी फेडरर के आस पास भी नहीं पहुंच पाया। इसके बावजूद फेडरर को सर्वकालीक महान खिलाडी दर्जा अभी नहीं दिया जा सकता क्योंकि फेडरर अभी तक क्ले कोर्ट पर अपने आपको साबित नहीं कर पाया है। क्ले कोर्ट पर उसे अभी तक अपने आपको सिद्ध करना है। क्ले सतह पर वह नडाल को हरा नहीं पाया है। नडाल मिट्टी की सतह का बादशाह है। यदि फेडरर मिट्टी सतह पर भी सफलता हासिल करता है तो उसकी गिनती सर्वकालीक महान खिलाडयों में हो सकती है। इसके अलावा में फेडरर के सामने कोई मजबूत चुन्नौती नहीं है। उसके सामने एक भी ऐसा प्रतिद्वन्द्वी नहीं है जो पीट सैम्प्रास जैसी दनदनाती सर्व कर सके। फेडरर कोर्ट में केवल गेंद को अपने रैकिट से मूवमेंट देकर अंक हासिल करता है। उसके लिए कोर्ट में जीत काफी आसान है। इसलिए कोर्ट में उसकी जीत का रोमांच है बल्कि टेनिस का रोमांच देखने को नहीं मिल रहा है। फिलहाल रोजर के सामने अब रोलां गैरास की चुन्नौत्ती है।उसे अपने आपको रोलां गैरांस पर साबित करना है। आस्ट्रेलिया ओपन में भी महिला वर्ग में अस्थिरता का दौर जारी है। गत विजेता मोरेस्मो अपने खिताब की रक्षा नहीं कर पायी। रूसी सुंदरी मारिया शारपोवा ने एक बार फिर उम्मीदे जगाई परन्तु फाईनल में शानदार वापसी कर सेरेना ने शारपोवा की उम्मीदो पर पानी फेर दिया। सेरेना विलियम्स ने लम्बे समय के बाद वापसी की है। क्लिटजर्स, मोरस्मो और शारपोवा ने महिला टेनिस को नई पहचान दी। ये तीनो महिला टेनिस को पावर युग से निकाल कर कलात्मक दौर में ले आयी। परन्तु सेरेना की वापसी ने एक बार फिर पावर युग की याद ताजा कर दी है। आस्ट्रेलिया ओपन ०७ के फाईनल में सेरेना के जोरदार शॉटस का मुकाबला शारापोवा बिलकुल नहीं कर पाई। सेरेना के क्रास कोर्ट शॉटस भी दर्शनीय तो थे ही साथ में बुद्धिमतापूर्ण भी थे। सेरेना ने प्रतियोगिता में शुरू से ही शानदार प्रदर्शन किया। री बाउण्ड ऐश पर वह अधिकारपूर्वक खेली। फाईनल में सेरेना के सामने शारपोवा नौसखिया शुरू सी नजर आयी। सेरेना की तेज सर्व दर्शको में उत्तेजना पैदा कर रही थी। फाईनल उसके लिए प्रतियोगिता का सबसे आसान मैच रहा। शारपोवा से उम्मीद थी कि फाईनल में वह अच्छा खेल दिखायेगी परन्तु वे फाईनल में बेअसर रही । सेरेना के सामने अब रोलां गैरास और विम्बलडन की चुन्नौती है। इस सफलता के बाद वह पुनः शिखर पर पहुंच सकती है क्योंकि वर्तमान में महिला टेनिस मे शिखर पर पहुंचना मुश्किल कार्य नही है। साल की पहली ग्राण्ड स्लेम में भारतीय खिलाडयों ने निराश किया। सानिया का दूसरे दौर में पहुंचना सुखद रहा और उसकी फार्म को देखते हुए उम्मीद थी कि वह आगे तक जायेगी परन्तु वह आगे बढने में नाकाम्याब रही। युगल में भी सानिया फिर बेअसर रही। युगल में सानिया अभी तक लय नहीं पकड पायी हे। महेश भूपति और लियेडर पेस भी अपने अपने जोडीदारो के साथ कोर्ट में उतरे लेकिन खिताब के आस पास भी नही पहुचं पाये। कुल मिलाकर साल की पहली ग्राण्ड स्लेम का संकेत है कि भारतीय खिलाडयों को अपने खेल की समीक्षा करनी चाहिए और अपेक्षित सुधार करने चाहिए। आस्ट्रेलिया ओपन ०७ के परिणामो से स्पष्ट है कि पुरूष वर्ग में रोजर फेडरर के सामने अभी तक कोई मजबूत प्रतिद्वन्द्वी नहीं है और फेडरर अभी पुरूष टेनिस का सरताज है । महिला टेनिस में स्थिरता का अभाव है। कोई स्थायी चैम्पियन सामने नहीं आ रहा है। सेरेना ने वापसी कर महिला टेनिस को फिर रोमांचक बना दिया है। मनीष कुमार जोधन्यवाद वेगसरकर मनीष कुमार जोशी भारतीय कि्रकेट टीम ने वेस्टइंडीज के विरूद्ध एकदिवसीय श्रंखला में जोरदार प्रदर्शन करते हुए श्रंखला ३-१ से जीतकर वापसी की है और इसके साथ ही विश्वकप के लिए भारतीय टीम की संभावनाऐं भी बढ गई है। पूरी भारतीय कि्रकेट टीम लय में आती नजर आ रही है और इसके लिए अलग अलग व्यक्तियों को श्रेय दिया जा रहा है। परन्तु भारतीय टीम की ताजा सफलता का श्रेय पूरी तरह से मूख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर को है। मुख्य चयनकर्ता का पद संभालने के बाद उन्होने टीम को लय में लाने के लिए दक्षिण अफ्रीका में कमान संभालने के बाद जो रणनीति बनाई, वह रणनीति पूरी तरह काम्याब रही और सभी खिलाडी जोरदार प्रदर्शन करते नजर आये । वेंगसरकर की रणनीति का ही परिणाम है कि आज पूरी भारतीय कि्रकेट लय में नजर आ रही है और विश्वकप के लिए कमजोर समझी जाने वाली भारतीय टीम को अब विश्वकप के दावेदारो में माना जा रहा है। इसके लिए दिलीप वेंगसरकर निश्चित रूप से धन्यवाद के पात्र है। लगभग दो माह पूर्व भारतीय कि्रकेट टीम को विश्व की कमजोर टीम माना जा रहा था जिसमें राहुल द्रविड, सचिन तेदुलकर और महेन्द्रसिंह धोनी जैसे खिलाडी शामिल थे । दक्षिण अफ्रीका में एकदिवसीय श्रंखला बुरी तरह से हारने और पहला टेस्ट हारने के बाद टीम के मुख्य चयनकर्ता दिलीप वेंगसरकर दक्षिण अफ्रीका पहचे और टीम की कमान संभाल ली। अभी तक जो काम ग्रेग चैपल कर रहे थे वह काम दिलीप वेंगसरकर ने संभाल लिया। उन्होने टीम के खिलाडयों, कप्तान और कोच की लगाम कसी। उन्होने टीम में तुरत सौरव गांगुली को शामिल किया और पठान को स्वदेश भेज दिया। यहीं से कर्नल ने अपनी योजना कार्यान्वयन किया। कर्नल जानते थे कि भारतीय टीम के सभी खिलाडी प्रतिभावान है और दुनिया की किसी भी टीम को हराने में सक्षम है परन्तु वे अभी लय में नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखकर कर्नल ने रणनीति बनाई। उन्होन टीम के हर स्थान के लिए रणनीति बनाई। उन्होने सबसे पहले सलामी बल्लेबाज के तौर पर सौरव गांगुली को शामिल किया और दबे स्वरो में उनके लिए यह चेतावनी भी थी उनके लिए अंतिम अवसर है। इसीके चलते गांगुली ने दबाव में बेहतर प्रदर्शन किया। दूसरी और गौतम गंभीर को शामिल कर सेहवाग को भी चेतावनी दे डाली। गंभीर और रोबिन उथप्पा के जोरदार प्रदर्शन से सेहवाग की वापसी की राह मुश्किल हो गई हैं। दूसरी ओर युवा खिलाडयों को यह लगा कि उन्हे विश्वकप में अवसर मिल सकता है । इसके चलते युवा खिलाडयों ने जोरदार प्रदर्शन किया। महेन्द्र सिंह धोनी के खराब प्रदर्शन पर भी अंगुलिया उठ रही थी । इसके लिए वेगंसरकर ने दिनेश कार्तिक को अवसर दिया। दिनेश के जोरदार प्रदर्शन से धेानी को अपनी जगह बनाये रखने के लिए अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव बढ गया। इसी दबाव के चलते धोनी ने जोरदार वापसी की। भारतीय स्पिनरो अनिल कुंबले और हरभजनसिंह का प्रदर्शन भी संतोषजनक नहीं था। इसके लिए वेगंसरकर रमेश पोवार को लाये और पोवार के जोरदार प्रदर्शन के कारण कुंबले और हरभजनसिंह को अपना स्थान असुरक्षित लगने लगा और इसी दबाव में उनका खेल भी सुधरा हुआ नजर आया। इरफान पठान को दक्षिण अफ्रीका के दौर से बीच में ही वापिस भेजने के फैसले के कारण तेज गेंदबाजो पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव बढा और श्रीसंत व जहीर खान ने जोरदार प्रदर्शन किया। दिलीप वेगसरकर ने मुख्य चयनकर्ता का पद संभालते ही कह दिया था कि टीम में चयन का आधार प्रदर्शन होगा और उन्होने अपने इस कथन पर अमल भी किया। इसी दबाव के कारण राहुल और सचिन के मन के किसी कोने में खराब प्रदर्शन के कारण डर था कि उन्हे भी आलोचना का सामना करना पड सकता है और उनका हालिया प्रदर्शन इसी दबाव का परिणाम माना जा सकता है। प्रदर्शन नहीं तो चयन नहीं की नीति का असर हरएक खिलाडी पर नजर आया। इसके अलावा कर्नल की नीति ने घरेलू कि्रकेट का भी महत्व बढा दिया। युवा खिलाडयों के मन में भी विश्वास पैदा हुआ कि यदि वे घरेलू कि्रकेट में अच्छा प्रदर्शन करेंगे तो उन्हे राष्ट्रीय टीम मे स्थान मिल सकता है। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि मुख्य चयनकर्ता को चयन के काम से आगे बढकर कार्य करना पडा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राहुल द्रविड एक कमजोर कप्तान है। इसी कारण पहले भारतीय कि्रकेट टीम की कमान ग्रेग चैपल के हाथ थी। उसके निर्णय सर्वोपरी हआ करते थे। दिलीप वेगसरकर ने दक्षिण अफ्रीका ने पहुंचकर टीम की कमान अपने हाथ में ले ली । अब टीम के सभी प्रमुख निर्णय कर्नल क ही होते है। वे टीम के गैर खिलाडी कप्तान की भूमिका निभा रहे है। उनकी इस भूमिका से टीम को खासा लाभ हो रहा है। इसलिए टीम के हित में उन्हे वेस्टइंडीज में विश्वकप के दौरान भी मौजूद रहना चाहिए।फिलहाल भारतीय टीम को वापिस लय में लाने का पूरा श्रेय दिलीप वेंगसरकर को दिया जाना चाहिए।